10 अक्टूबर 2010

कड़ियाँ




वो ऐसी ही एक 
खामोश शाम थी,जब,
लौट रहे थे पक्षी,घोंसलों तक,
पशु,चारागाहों
से,
रौनक वापिस लौट रही थी 
पेड़ों, और पत्तों  की,
घर लौटते पक्षियों के
कलरव से
जल गईं थीं बत्तियां घरों की,
सूरज की रौशनी की परियां

बतियाती,खिलखिलाती
वापस घर लौटने लगीं थीं,
सभी  लौट रहे थे
 अपने अपने ठिकानों पर
नहीं थे तो 
सिर्फ तुम!
हाँ मगर,तुम्हारी जगह,
तुम्हारी  याद लौट आई थी
उस दिन भी बैठ गई थी
बगल में मेरे
देहरी पर ही,
और 
बतियाती  रही थी  देर तक
और फिर,हौले से
मेरा हाथ थाम,
 लिवा लाइ थी 
कमरे तक
थपकियाँ दे सुला दिया था
उसने मुझे,
और फिर 
 जुडती गईं इसमें
सिलसिलेवार कड़ियाँ 
बस वही
मै .....देहरी......और याद.....
शुक्रिया तुम्हे .........!

9 अक्टूबर 2010

वक़्त


जिंदगी से अब कोई 
शिकवा नहीं हैं 
सिवा इस दर्द  के कि 
वक़्त का बेवक्त आना
और गुज़र जाना 
किसी तूफान सा और 
कुछ पलों तक
यादों  की कश्ती का                      
फिर से  
डगमगाना 
ज़िन्दगी के
अनखुले प्रष्टों को 
जो मै देख पाती
बहुत मुमकिन था
कि तब,
ख्वाबों को कुछ
बेहतर सजाती 
अब तो सच और
ख्वाब में अंतर नहीं
कुछ भी रहा  है !
नींद में सच देखती और,
दिन में  सपने पालती हूँ
बस सुकून देने खुद को
सैंकड़ों करती जतन हूँ
वक़्त की हर चाल  वर्ना,
किंचित सही
पहचानती हूँ!

7 अक्टूबर 2010

रास्ते


मेरे बचपन की वो पगडंडी
.बारिश की सोंधी 
महक  से गुलज़ार,
खुशबूदार खुबसूरत
फूलों से लदी डालियों से
घिरी,और
झरे हुए पतों और फूलों पर
दौड़ता मेरा बिंदास
बचपन
आदि और अंत से 
बेखबर
और  एक दिन अचानक 
पगडण्डी,मेरी उंगली थामे
दुलारती  ,पुचकारती
मुझे छोड़ आई थी
उम्र के अगले पड़ाव तक 
यानि 
एक भीड़ भरी
सुनसान सड़क,
जहाँ सिर्फ शोर था
और अकेली  मैं
जैसे,माँ की उंगली से छूट,
कोई बच्चा  मेले में अचानक 
गुम हो जाये 
भरी भीड़ में
अकेला रह जाये!
भीड़ 
अकेलेपन की कसक को
मिटा नहीं सकती,
बल्कि और बैचेन कर देती है,
एकांत के एक अदद  पल के लिए!
उस भीड़ का हिस्सा न बनने के
एवज में 
अवसाद,कुंठा और 
निराशा से मित्रता भी हुई
पर ये मित्र
भीड़ से बेहतर थे शायद
तभी तो 
ये दौर मेरे जीवन का
सबसे अहम दौर था
जिसने मुझे
खुद अपने से बाहर आने को 
प्रेरित  किया और
यही वो हिस्सा था
मेरे जीवन का
जब मैं सबसे मज़बूत हुई
हालाकि,
बहुत दूर छुट गई है पगडण्डी
शायद अस्तित्वहीन हो गई हो
पर 
आज भी इंतजार है मुझे
उस सोंधी मिटटी की
खुशबू का
आज भी दौड़ना चाहता है मन
फूलों भरे  रास्तों पर

6 अक्टूबर 2010

ख़ामोशी ?

कितना तकलीफदेह होता है
अधूरे सपनों को
फिर सी पलकों में
भींच लेना?
या कि,खुबसूरत यादों को
ज़हन से बेदखल कर पाना
या ,
अविस्मरनीय पलों की
कसमसाहट से
खुद को समेट सकना
और कितना आसान होता है
किसी को सपने दिखा
खामोश हो जाना

5 अक्टूबर 2010

एक रात की सुबह

वो एक सर्द
कोहरे भरी रात थी,
तिस पर लगातार होती
हलकी बूंदा बांदी ने
वातावरण को और धूमिल
बना दिया था ,
इतना ,कि सामने के घर की
अमूमन देर तक
,रोशन रहने वाली
खिड़की जो ,
अक्सर मेरे रात काटने का
हौसला हो जाया करती थी,
कुहरे में गायब हो
उसी का एक हिस्सा बन
गई थी!
शाम के धुंधलके में
मेरे साथ सैर पर
जाने वाले,
खूंटी पर टंगे उदास कपडे
मुझे अपलक घूर रहे थे!
छत के नीचे वाले आले में,
रात को कलरव से
आबाद रहने वाला
चिड़िया का घोंसला
जो अपनी चाहचहातों से
मेरे मन और नींद में
खलल पैदा करता था,
उसका खालीपन
आज मुझे काटने को
आ रहा था!
सिरहाने रखी
उलटी किताब के उड़ते
पन्नों
का शोर मुझे
बैचेन कर रहा था!
ये एक बैचेन रात थी,
ज़िन्दगी की तरह!
आज भी बारिश आते ही
बत्ती रूठकर चली गई थी
हमेशा की तरह!
हवा से चीत्कार करते
खुले दरवाज़े और
खिड़कियाँ मेरे बचे खुचे
धैर्य की परीक्षा ले रहे थे
और मुझे उठने को
उकसा रहे थे,
पर जिद्दी मन को भला कोई
धमका सका है?
अचंभित करने वाला सपना था वो,
जिसने मुझे नींद का अहसास कराया था,
और जब आंख खुली तो
रोशन खिड़की का अस्तित्व
ख़त्म हो चुका था,
आले का घोंसला आबाद था,
धूप की चमक
पूरी कायनात को
रोशन कर चुकी थी,
खिड़की के बाहर गुलाब की
ओस भरी पत्तियां
अपनी खूबसूरती पर
इठलाती मुस्कुरा रही थीं!
मैं हैरान था ,
रात सपना थी
या जो अब देख रहा हूँ
वो सपना है?

3 अक्टूबर 2010

सुबह

धीमी पड़ी है जबसे
रौशनी सितारों की,
,तरस गई हैं चांदनी
करने को धरती का आलिंगन
भीमकाय इमारतों के
बेतरतीब फैले
सायों के पहरों में
ठिठकी आती है रोजाना
रात के घनघोर सन्नाटे में
और लौट जाती है उदास
सवेरा होते ही
क्यूंकि जाना ही होता है उसको
फिर वापस आने के लिए
यूँ इस तरह अट जाना धरती का
पेड़ों की जगह
मनुष्यों से,
हवा की जगह
भय से
यकीन की जगह
नाइंसाफी से,
सुकून की जगह
अँधेरे भय के प्रेत से
फ़ैल चुका हैं जो
चेहरों से असमान तक,
आस्था से आत्मा तक,
चोटों से विशवास तक,
सच से झूठ तक
सत्ता के लिए सत्ता को
विस्मृत कर देना
वास्तव में,
खारिज कर देना है खुद को
या शायद,
एक निकट है किसी अंत का
ये सच है
उतना ही जितना कि
किसी बुरे अंत को
किसी शुरुवात का माना जाना
एक शुभारम्भ
और आरंभ कोई या किसी का हो
होता है हमेशा ही
हरा भरा
प्रथ्वी की तरह
या किसी नवजात शिशु की
उनींदी मुस्कराहट सा
या फिर ताज़े कोमल फूलों की
खुबसूरत सुगंध सा
इंतजार है अब तो बस
उसी एक सुगन्धित
अहसास का
जीवन जीने के लिए
ये उम्मीद क्या काफी नहीं?

2 अक्टूबर 2010

चेहरे

कितने चेहरे हैं
आदमी के पास
वक़्त के इस दौर में?
शायद उसे खुद नहीं पता!
बस बदलता रहता है ,
चेहरे पे चेहरा
मुखौटों की शक्ल में!
संबंधों,वक़्त या ओहदे के हिसाब से
या फिर किसी निरीह की
संवेदनाओं व् विवशताओं को
भुनाते '
ताजिंदगी ये खेल
बदस्तूर जारी रहता है!
कितनी महारत हासिल कर ली है उसने
चेहरों की इस अदला बदली में,
कि असली चेहरा खो ही गया है उसका
हैरानी होती है कभी कभी
कि इस
बेवुजूद और अदना सी ज़िन्दगी
के लिए
कितने फितूर
इस क़दर ज़द्दोज़हद?
क्या लगता है उसे
की वुजूद है उसका तब तक!
जब तक नष्ट नहीं हो जाते
धरती पर से
हवा पानी
और चेहरे?