वो ऐसी ही एक
खामोश शाम थी,जब,
लौट रहे थे पक्षी,घोंसलों तक,
पशु,चारागाहों
से,
रौनक वापिस लौट रही थी
पेड़ों, और पत्तों की,
घर लौटते पक्षियों के
कलरव से
जल गईं थीं बत्तियां घरों की,
सूरज की रौशनी की परियां
बतियाती,खिलखिलाती
वापस घर लौटने लगीं थीं,
सभी लौट रहे थे
अपने अपने ठिकानों पर
नहीं थे तो
सिर्फ तुम!
हाँ मगर,तुम्हारी जगह,
तुम्हारी याद लौट आई थी
उस दिन भी बैठ गई थी
बगल में मेरे
देहरी पर ही,
और
बतियाती रही थी देर तक
और फिर,हौले से
मेरा हाथ थाम,
लिवा लाइ थी
कमरे तक
थपकियाँ दे सुला दिया था
उसने मुझे,
और फिर
जुडती गईं इसमें
सिलसिलेवार कड़ियाँ
बस वही
मै .....देहरी......और याद.....
शुक्रिया तुम्हे .........!


