18 अक्टूबर 2011

In Singapore

In dinon Singapore me hun .bahut achha aur alag anubhav.yahan ke logon me koi hadbadahat koi excitment nahin dikhta .chehre par ek shanti aur sfurti hai.metro yatayat ka sabse bada maadhyam hai.ek house wife se lekar working men-women, students,others sabhee logon ke chehre par ek santusht muskurahat khili rahti hai.lekin ek baat azeeb hai yahan .khali vaqt me chahe Metro,ho  park ya Hotel koi bhi vyakti khali nahin baithta sabhi ke hathon me Smart phones rahte hain jin  par games,chat ityadi karte rahte hain :)

16 अक्टूबर 2011

जीवन



बोझिल आँखों में जागती रात सा ,
 बीतता रहता है कुछ ,रीतता सा
 हर रोज ....!
जैसे आदमी हर सुबह
खोल लेता है अपना अतीत अखबार की तरह
अपने सामने या
भविष्य की ज़मीन पर
बिखेर लेता है अनुमानों की चंद लकीरें  
शेष सांसों के इर्द गिर्द
 उलट-पुलट  
गढता उन्हें किन्हीं आड़ी-टेडी लकीरों ,कोण
 तिकोनों ,वृत्त ,कुछ चौकोर मे
रचता है कुछ आकृतियाँ
और विशवास को ओढ़  कर  
सो जाता है एक गहरी नींद
उस लंबी दोपहरी में ..

12 अक्टूबर 2011

प्यार


कैसे बताऊँ तुम्हे,
कि प्यार प्यार होता है
व्यापार नहीं |
कोई शर्त,कोई गारंटी, ‘’बिका माल वापस नहीं ‘’टाईप,
बड़े ज़हाजों में लदकर भी नहीं आता ये ,
बंदरगाहों पर विशाल खोखों में उठाकर 
पटका भी नहीं जाता इसे 
कोई बहीखाता भी नहीं होता इसका
फायदे नुक्सान के जोड़ तोड़ का
इसके लिए गोष्ठियां भी नहीं होतीं
जैसे होती हैं बुद्धिजीवियों के खेमों में,
प्यार उतना भी ज़रुरी नहीं,
कि धरने दीये जाएँ इसके लिए  ,जैसे
दिए जाते हैं किसी न्याय को पाने ,  
आँखें तक नहीं होतीं इसकी तो देखने को,
पहले ज़रूरत नहीं थी उनकी 
और अब मोहलत....
आँखें तो सिर्फ नफरत की होती हैं
जिनका धर्म सिर्फ तरेरना है ,
ऑंखें सिर्फ खुद को फेर लिए जाने के लिए होती हैं
इतराती हुई कि शुक्र है वो पीठ पर नहीं 
जो देख सकें आँखों का पानी, 
मोबाईल,कंप्यूटर ,लेंड लाइन के बाज़ार में, 
आज भी बचाए  रखी है एक ही  स्त्री ने 
अपने भीतर माँ ,बहन ,बीवी ,प्रेमिका,
और एक निखालिस औरत की आत्मा
 प्रेम में होती है
सिर्फ एक ऊष्मा जो बहती है भीतर ही भीतर
बाहर को स्थगित करती हुई
तुमने कहा ,अब प्यार नहीं .क्यूंकि
तुमने की मेरे क्रोध की मीमांसा...
मेरी मनमानी की व्याख्या...
मेरे वक्त में सेंध लगाईं 
 मेरे वुजूद पे हक जमाया
और ना जाने क्या....
तुम कह रहे थे जब ये सब
अतीत  लगभग बहरा हो चुका  था
तुम जब निचोड़ कर सूखने डाल रहे थे किसी के सपने   
प्यार प्रथ्वी के किसी अँधेरे से एक कोने में सिमट
मुस्कुरा रहा था /शायद तुम पर ?
शायद मुझ पर ?या हो सकता है खुद पर ?
अविश्वास सा कुछ पहना था उसने
सोच रहा था मन ही मन ,
कहीं नीले बादल यकायक सिंदूरी होने लगते,
कोई कली चुपचाप मुस्कुराती चटखने लगती,  
कोई ओस की बूंद हौले से पत्ते पर गिरती,
इतना ही मौन होना था निखालिस प्यार
जहाँ तर्क को थक थकाकर हांफता हुआ ढह जाना था .... 


6 अक्टूबर 2011

रेत का घर

किसी कहानी की पटकथा के, 
उबड खाबड रास्तों के बीच
कहीं अपनी पगडंडी तलाशने जैसा  ,
ख्वाब लगता है अब     
पहुँच पाना उस हिमालय तक
जिसकी चोटी पर खड़े हो,
वादा था अपने एकांत से 
मुट्ठी खोल देने का 
सपनों से भरी ,
रंग देना नीले आसमान को तितलियों से,
उड़ा देना हाथों से यादों के कुछ खूबसूरत कबूतर
और हो जाना मुक्त पिंजरों से
समुद्र के बाजू      
गीली रेत का वो ढेर , जिसमे पैर घुसा 
बना आये थे एक घर
नहीं जानते थे तब कि 
हर लौटने की तासीर होती है 
पथरीले पहाड़ों में बदल जाना 
तकलीफ देह होता है नियति की तलहटी से देखना
आस्मां को छेदते हुए उन हौसलों को
एंठी गर्दन को सहलाते
फिर फिर उछाल दिया जाना
आसमान में बार बार ...
डाल से गिरे सेब सा ,सेब की  
गुरुत्वाकर्षण शक्ति को
परखने की कुटिल मंशा लिये | ,
इससे तो बेहतर था 
किसी ऊब की तरह   
बिखर जाना ज़मीन पर  
गीली रेत पर पाँव रखते हुए ....|