नईदुनिया में वंदना देव शुक्ला की कहानी- एक धीमी सी याद।
19 अक्टूबर 2014
5 अक्टूबर 2014
ईद के इस मुबारक मौके पर मेरी कहानी ''ईद मुबारक''विविध भारती के उद्घोषक युनुस खान की आवाज़ में सुनिए
http://katha-paath.blogspot.
24 सितंबर 2014
मार्खेज़ ने कहा था लेखन एक
तनहा पेशा है | इन चंद शब्दों के पीछे लेखक और लेखन की तमाम उलझनों व् तर्कों का
समाधान छिपा है | ज़ाहिर है कि लेखन किसी लेखक के लिए उसका एक निहायत व्यक्तिगत
अनुभव और कल्पनाशीलता का माध्यम है लेकिन वो सार्थकता पाठकों के बीच (सामूहिक पक्ष
में )ही पाता है |किसी रचना की महत्ता का गणित अंकों पर नहीं बल्कि प्रतिभा की गुणवत्ता
पर आश्रित होता है |लेकिन श्रेष्ठता के मायने ये कौन और कैसे निर्धारित करेगा ?
इसे ‘’योग्यता’’ के किस बैरोमीटर से नापा जाएगा? कितना यथार्थ ,कितनी कल्पना,कैसी
प्रतीकात्मकता और कितने संकेत और ब्योरे इनके अनुपात ,विश्वसनीयता ,सम्मिश्रण ये
सब वस्ताविकता की किस कसौटी पर परखा जाए ये एक गंभीर मसला है |ये कौन तय करेगा कि
कहानी का आलोचक अपने संज्ञान, अनुभवों ,तटस्थता आदि के स्तर पर आलोचना के मापदंडों
हेतु स्वयं कितना सटीक बैठता है ?किसी कहानी की बाकायदा आलोचना करना और किसी कहानी
पर अपना ‘’पाठकीय मत’’ देना ये दो बिलकुल अलग बातें हैं |किसी भी रचना को पढने उस
पर अपना पक्ष रखने और उसके लेखन की बारीकियों को बताने की कसौटी हर पाठक (आलोचक की
भी ) अलग अलग होती है जो उसके स्वयं के लेखिकीय अनुभवों उसकी चारित्रिक विशेषताओं
व् उसके साहित्यिक ओहदे पर भी निर्भर करती है |कभी कभी एक सामान्य पाठक एक
सिद्धहस्त आलोचक (?) से अधिक सटीक समीक्षा और सूक्षम आकलन कर देता है | किसी रचना
विशेष के सन्दर्भ में जब आलोचक सहित सब पाठकों की प्रतिक्रियाएं उनकी रूचि के विषय
,शिल्प आदि से सम्बंधित अलग अलग होती हैं तो फिर किसी एक व्यक्ति द्वारा उस रचना
की आलोचना (प्रसंशा या बुराई) को सटीक कैसे माना जा सकता है ?
5 सितंबर 2014
ये सच है कि मनुष्य गलतियों
से ही सीखता है लेकिन गलतियां जब मूर्खता और जल्दबाजी की वजह से हुई हों तो स्थिति
एक बार पुनः आत्मविश्लेषण की होना स्वाभाविक है |पिछले कुछ महीनों में फेसबुक
,भिन्न भिन्न पत्रिकाओं और पुरुस्कारों के भुलावे में आकर एकमुश्त सभी ‘प्रसंषित’
किताबें खरीद लीं और उन्हें पढ़ना शुरू किया |ज़ाहिर था कि उनका एक विशेष आकर्षण और
छवि मस्तिष्क में थी लेकिन जब पढ़ना शुरू किया तो कुछ तो उनमे से कुछ (बहुत कम )
वाकई अच्छी थीं लेकिन कुछ को पढ़कर लगा कि आखिर इनमे ऐसा क्या था जिसे इतना
आभामंडित करके व्याख्यायित किया गया पुरूस्कार दिए गए ?माना कि पाठकों ,आलोचकों व्
स्वयं लेखक की द्रष्टि में फर्क हो सकता है लेकिन इतना ?...सच हतप्रभ हूँ |
7 जुलाई 2014
‘’वॉर एंड पीस’’ और ‘’अन्ना केरेनीना’’ जैसी महान कृतियों के लेखक टोलसटॉय और ‘’द लास्ट सपर ‘’ ,मैडोना ऑफ़ द रोक्स ‘’ और विश्व प्रसिद्द रचना ‘’मोनालिसा’’ के अद्भुत कलाकार लियोनार्दो दा विन्सी यद्यपि एक लेखक है और दूसरा कलाकार लेकिन दोनो में एक अद्भुत समानता है |दौनों ने ही अपनी स्वयं गढ़ी गयी कृतियों से इस क़दर प्रेम किया कि ताजिन्दगी वो उतना प्रेम किसी जीवंत स्त्री को नहीं कर पाए | अन्ना केरेनीना उपन्यास का प्रारम्भ एक प्लेटफोर्म से होता है (और अंत भी प्लेटफोर्म पर ही )| टालस्टॉय इस उपन्यास के दौरान अपनी नायिका अन्ना के प्रेम में डूब गए |एक विवाहित स्त्री के प्रेम से कहानी निर्लिप्त भाव से शुरू होती है लेकिन धीरे धीरे ये महसूस होने लगता है कि अन्ना के प्रति उनके ह्रदय में कोई कोमलता है जो आहिस्ता आहिस्ता विवशता और अवसाद में बदलती जाती है ...सामाजिक ,पारिवारिक ,ममत्व आदि की विसंगतियां व् असुरक्षा का मिला जुला भाव और अंतत वो आत्महत्या कर लेती हैं| वहीं विन्सी के बारे में कहा जाता है कि उनकी अनेकों कृतियाँ यहाँ वहां पडी रहती थीं लेकिन मोनालिसा की कलाकृति को ताजिन्दगी (2 मई 1519 तक )उन्होंने अपने से अलग नहीं किया वो जहाँ गए उसे अपने साथ लेकर गए |विश्व प्रसिद्द लेखक मार्खेज़ के बारे में भी कहा जाता है कि अपने एक उपन्यास की नायिका की म्रत्यु के बाद वो फूट फूट कर रोये |हमारे यहाँ मीरा और कृष्ण के प्रेम को इस द्रष्टि से देखा जा सकता है लेकिन कृष्ण की छवि मीरा के मन में पहले से थी और इन महान रचयिताओं ने अपना प्रेम खुद गढ़ा और जीवन पर्यंत उससे लिप्त रहे |
26 जून 2014
‘’पाश्तीश की संस्कृति और चिंतन पर हाहाकार क्यूँ ?’’
इस भूमंडलीकरण और नवउदारवादी संस्कृति ने न सिर्फ बाज़ार और सभ्यता के मापदंड बदल दिए बल्कि जीवन के अर्थ और गुणवत्ता पर भी इस नव-विकास और विचारशील संस्कृति का ज़बरदस्त प्रभाव पड़ा है इसे हम बीस पचास बरस पूर्व से अब तक के तुलनात्मक अध्ययन से भली प्रकार देख और जान सकते हैं |शिक्षा ,समाज ,साहित्य, फ़िल्में ,राजनीति,दर्शन ,लोक ,बाज़ार ,विपणन आदि के अर्थ और औचित्य बदल चुके हैं |यदि हम इनमे से सिर्फ एक को लें साहित्य जो न तो पुराने खरे सोने से मुक्त हो पा रहा है और ना नए की उथली सोच और स्वरुप से संतुष्ट इसके कुछ गंभीर कारन अवश्य होंगे |क्या वजह है की आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ,हजारी प्रसाद द्विवेदी से लेकर महादेवी वर्मा और अज्ञेय तक ने अपना सम्पूर्ण जीवन और ज्ञान साहित्य को समर्पित करते हुए नई पीढी के हाथ में मशाल सौंपी थी लेकिन उस मशाल की रोशनी अब फीकी क्यूँ हो रही है?संभवतः कुछ ज्ञानी /विद्वान् ऐसा ना मानते हों और वो साहित्य के सार्थक भविष्य से आश्वस्त हों लेकिन यदि ऐसा है तो फिर साहित्य जो लेखक ,पाठक ,आलोचक,चिन्तक,संपादक,प्रकाशक, आदि से मिलकर अपना अस्तित्व गढ़ता है इनमे से कोई एक भी संतुष्ट नज़र क्यूँ नहीं आता ? ये असंतुष्टि उस लेखिकीय असंतुष्टि से अलग है जो हिन्दी साहित्य के कालजयी की श्रेणी में रखे गए रचनाकारों की असहमति बनी |प्रेमचंद ,रेनू,शरतचंद से लेकर मन्नू भंडारी ,चित्रा मुद्गल,मृदुला गर्ग .कृष्ण सोबती आदि तक|उनकी असंतुष्टि या असहमति साहित्य के भविष्य,उसके स्वरुप और उसकी शास्त्रीयता के पक्ष में थी | कहानी कहानी होती थी कविता कविता और आलोचना एक पूर्ण आलोचना निष्पक्ष और संतुलित |यद्यपि अपवाद मनुष्य के साथ उसके अस्तित्व की आख़िरी सांस तक रहेंगे और तब भी थे लेकिन आज इन अपवादों ने निहायत व्यक्तिगत रूप गढ़ लिया है साहित्य और साहित्यिक सरोकार न रहकर साहित्य और वैयक्तिक आक्षेप के स्तर तक आलोचना उतर आई है |व्यंग का मतलब व्यक्तिगत आक्षेप और कुंठाओं का निष्कासन भा कहीं कहीं दिखाई देता है रह
साहित्य हो या कलाएं हर युग में सहमती –असहमति .तर्क-वितर्क उनके साथ उंगली पकडे चली है |
हर सदी के अपनी समस्याएं होती हैं ,उनका प्रतिकार और उन्हें दूर करने की कोशिशें भी |राजनैतिक अस्थिरता समाजिक मूल्य ,आर्थिक सोच और कई समस्याओं की जनक होती है और दुर्भाग्यवश भारत ने इस अस्थिरता के परिवेश और दैत्य को बहुत झेला है आज भी झेल रहा है |एक और तथ्य है जिसने हिन्दी साहित्य को अत्यधिक प्रभावित किया है वो है बहुसंस्कृति की परम्परा |
और इसी बहुसांस्क्रतिकता (मल्टीकल्चर्लिज्म) का भी यहाँ के साहित्यिक संस्कृति में एक बड़ा योगदान है तो दूसरी और एक विघटनकारी मानसिकता का भी यही उपक्रम माना जा सकता है |
शमशेर चाँद का मुहं टेड़ा है की भूमिका में कहते हैं ‘’मुक्तिबोध युग के उस चेहरे की तलाश करते हैं जो आज के इतिहास के मलबे के नीचे दब गया है ,मगर मर नहीं गया है (शमशेर-चाँद का मुहं टेढ़ा है’’भूमिका )|आजकल हिन्दी साहित्य में पश्चिम के प्रभाव की चर्चा है |यद्यपि ये प्रभाव कोई नया नहीं है |यदि परिवेश के स्तर पर पाश्चात्य प्रभाव देखा जाये तो निर्मल वर्मा का नाम सबसे पहले आयेगा |उनकी कहानी ‘’लन्दन की एक रात ‘’और जलती झाडी इसका साक्षात् उदाहरन हैं इसके अलावा उषा प्रियंवदा की ‘’मछलियाँ’’टूटे हुए ,कृष्ण बलदेव वैद की कहानी ‘’शेडोज़’’आदि हैं |
पाश्चात्य प्रभाव का विरोध करने से पूर्व ‘’साहित्य क्यूँ और किसके लिए ‘’ इस प्रश्न पर हमें गंभीरता से विचार करना होगा |क्या साहित्य मनोरंजन है?क्या साहित्य का औचित्य मनुष्य में मनुष्यता की भावना का संचार करना या उसे समाज ,देश,मनुष्य मात्र के प्रति जागरूक करना है?क्या साहित्य एक जाती विशेष ,एक समूह विशेष,एक भाषा विशेष एक देश विशेष ,अथवा भूमंडलीय स्तर तक मनुष्य को प्रभावित करने का एक माध्यम है? स्वाभाविक है की यदि साहित्य इतने स्तरों तक मनुष्य के जीवन को प्रभावित करने की क्षमता रखता है तो उतने ही स्तरों पर उससे सहमत असहमत होने वाले लोग भी होंगे और उतने ही विचार? यदि साहित्य वैश्विक स्तर पर समाज को आंदोलित,प्रभावित करने का माद्दा रखता है तो फिर परिवेश के स्तर पर उसका विरोध क्यूँ ?पूरे विश्व में विदेशी साहित्य अनुवादित रूप में पढ़ा जाना और पसंद किया जाना क्या इसका प्रबल साक्ष्य नहीं ?यदि हम किसी कहानी ,उपन्यास या कविता के माध्यम से किसी दुसरे देश की संस्कृति,रीत रिवाज या मानसिकता को जान पायें तो इसमें क्या बुरा है?यदि किसी रचना पर पाश्चात्य प्रभाव रचना के शिल्प,संवेदना या चिंतन के स्तर प् होता है तो भी मनुष्य और सामाजिक प्राणी होने के नाते ये भी उतना ही महत्वपूर्ण क्यूँ नहीं है तब जबकि भौगोलिक अवस्थाएं ,भाषा, रीति रिवाज,कायदे क़ानून अलग हो तो भी दुःख ,पीढा,खुशी का रूप पूरे विश्व में अनुभूति के लिहाज से एक होता है? लेकिन साहित्य में उल्टा हो रहा है हम इन सबका विरोध तो कर रहे हैं लेकिन पाश्चात्य फैशन ,खुलापन (जो कुछ देशों में मान्य है पर यहाँ नहीं )का साहित्य में खुलकर स्तेमाल कर रहे हैं ,|देश-देश के बीच जो संस्कृतिक ,वैचारिक या नैतिक बुनावट के फर्क की लकीर को हम अपनी कहानियों उपन्यासों में मिटा रहे हैं वो भी स्त्री दशा या विमर्श के नाम पर पाश्चात्य प्रभाव तो इसे मानना चाहिए ,जिसे नज़रंदाज़ किया जा रहा है |हिन्दुस्तान की संस्कृति में तो कभी इतना खुलापन और आज़ादी नहीं रही विशेषतौर पर स्त्री लेखन में ? चाहे कला हो या साहित्य ये प्रयोगधर्मिता का युग है और नए नए प्रयोग होना निस्संदेह किसी भी विधा के लिए शुभ संकेत है |कई बार कहानियों के शिल्प पर पाश्चात्य प्रभाव का दोष भी लगाया जाता है |आज जब दुनियां सिमट रही है लोग,समस्याएं,ख़बरें वैशिक धरातल पर नज़दीक आ रहे हैं और हम बाकायदा उन्हें कुछ अर्थों में अपना भी रहे हैं तो यदि कहानी के शिल्प में पाश्चात्य प्रभाव दिखाई देता है तो उसे प्रयोग की द्रष्टि से क्यूँ नहीं स्वीकार किया जाता ?कहानी उपन्यास के कुछ विषय सार्वभौमिक होते हैं जैसे भूख,अन्याय या म्रत्यु का विषय |म्रत्यु को भारत सहित पूरी दुनिया के तमाम लेखकों ने विषय बनाया ..हेमिंग्वे ,कामू,मार्खेज़ या फिर हिन्दी के लेखक भीष्म साहनी ,निर्मल वर्मा,श्रीकांत वर्मा ऐसे और भी उत्क्रष्ट कोटि के लेखक हैं |म्रत्यु एक अवस्था है एक स्थिति इसको शिल्प या चिन्तन की द्रष्टि से भले ही अलग कर लें लेकिन संवेदना के स्तर पर आखिर कितना फासला रख सकते हैं ?(प्रथम भाग)
साहित्य हो या कलाएं हर युग में सहमती –असहमति .तर्क-वितर्क उनके साथ उंगली पकडे चली है |
हर सदी के अपनी समस्याएं होती हैं ,उनका प्रतिकार और उन्हें दूर करने की कोशिशें भी |राजनैतिक अस्थिरता समाजिक मूल्य ,आर्थिक सोच और कई समस्याओं की जनक होती है और दुर्भाग्यवश भारत ने इस अस्थिरता के परिवेश और दैत्य को बहुत झेला है आज भी झेल रहा है |एक और तथ्य है जिसने हिन्दी साहित्य को अत्यधिक प्रभावित किया है वो है बहुसंस्कृति की परम्परा |
और इसी बहुसांस्क्रतिकता (मल्टीकल्चर्लिज्म) का भी यहाँ के साहित्यिक संस्कृति में एक बड़ा योगदान है तो दूसरी और एक विघटनकारी मानसिकता का भी यही उपक्रम माना जा सकता है |
शमशेर चाँद का मुहं टेड़ा है की भूमिका में कहते हैं ‘’मुक्तिबोध युग के उस चेहरे की तलाश करते हैं जो आज के इतिहास के मलबे के नीचे दब गया है ,मगर मर नहीं गया है (शमशेर-चाँद का मुहं टेढ़ा है’’भूमिका )|आजकल हिन्दी साहित्य में पश्चिम के प्रभाव की चर्चा है |यद्यपि ये प्रभाव कोई नया नहीं है |यदि परिवेश के स्तर पर पाश्चात्य प्रभाव देखा जाये तो निर्मल वर्मा का नाम सबसे पहले आयेगा |उनकी कहानी ‘’लन्दन की एक रात ‘’और जलती झाडी इसका साक्षात् उदाहरन हैं इसके अलावा उषा प्रियंवदा की ‘’मछलियाँ’’टूटे हुए ,कृष्ण बलदेव वैद की कहानी ‘’शेडोज़’’आदि हैं |
पाश्चात्य प्रभाव का विरोध करने से पूर्व ‘’साहित्य क्यूँ और किसके लिए ‘’ इस प्रश्न पर हमें गंभीरता से विचार करना होगा |क्या साहित्य मनोरंजन है?क्या साहित्य का औचित्य मनुष्य में मनुष्यता की भावना का संचार करना या उसे समाज ,देश,मनुष्य मात्र के प्रति जागरूक करना है?क्या साहित्य एक जाती विशेष ,एक समूह विशेष,एक भाषा विशेष एक देश विशेष ,अथवा भूमंडलीय स्तर तक मनुष्य को प्रभावित करने का एक माध्यम है? स्वाभाविक है की यदि साहित्य इतने स्तरों तक मनुष्य के जीवन को प्रभावित करने की क्षमता रखता है तो उतने ही स्तरों पर उससे सहमत असहमत होने वाले लोग भी होंगे और उतने ही विचार? यदि साहित्य वैश्विक स्तर पर समाज को आंदोलित,प्रभावित करने का माद्दा रखता है तो फिर परिवेश के स्तर पर उसका विरोध क्यूँ ?पूरे विश्व में विदेशी साहित्य अनुवादित रूप में पढ़ा जाना और पसंद किया जाना क्या इसका प्रबल साक्ष्य नहीं ?यदि हम किसी कहानी ,उपन्यास या कविता के माध्यम से किसी दुसरे देश की संस्कृति,रीत रिवाज या मानसिकता को जान पायें तो इसमें क्या बुरा है?यदि किसी रचना पर पाश्चात्य प्रभाव रचना के शिल्प,संवेदना या चिंतन के स्तर प् होता है तो भी मनुष्य और सामाजिक प्राणी होने के नाते ये भी उतना ही महत्वपूर्ण क्यूँ नहीं है तब जबकि भौगोलिक अवस्थाएं ,भाषा, रीति रिवाज,कायदे क़ानून अलग हो तो भी दुःख ,पीढा,खुशी का रूप पूरे विश्व में अनुभूति के लिहाज से एक होता है? लेकिन साहित्य में उल्टा हो रहा है हम इन सबका विरोध तो कर रहे हैं लेकिन पाश्चात्य फैशन ,खुलापन (जो कुछ देशों में मान्य है पर यहाँ नहीं )का साहित्य में खुलकर स्तेमाल कर रहे हैं ,|देश-देश के बीच जो संस्कृतिक ,वैचारिक या नैतिक बुनावट के फर्क की लकीर को हम अपनी कहानियों उपन्यासों में मिटा रहे हैं वो भी स्त्री दशा या विमर्श के नाम पर पाश्चात्य प्रभाव तो इसे मानना चाहिए ,जिसे नज़रंदाज़ किया जा रहा है |हिन्दुस्तान की संस्कृति में तो कभी इतना खुलापन और आज़ादी नहीं रही विशेषतौर पर स्त्री लेखन में ? चाहे कला हो या साहित्य ये प्रयोगधर्मिता का युग है और नए नए प्रयोग होना निस्संदेह किसी भी विधा के लिए शुभ संकेत है |कई बार कहानियों के शिल्प पर पाश्चात्य प्रभाव का दोष भी लगाया जाता है |आज जब दुनियां सिमट रही है लोग,समस्याएं,ख़बरें वैशिक धरातल पर नज़दीक आ रहे हैं और हम बाकायदा उन्हें कुछ अर्थों में अपना भी रहे हैं तो यदि कहानी के शिल्प में पाश्चात्य प्रभाव दिखाई देता है तो उसे प्रयोग की द्रष्टि से क्यूँ नहीं स्वीकार किया जाता ?कहानी उपन्यास के कुछ विषय सार्वभौमिक होते हैं जैसे भूख,अन्याय या म्रत्यु का विषय |म्रत्यु को भारत सहित पूरी दुनिया के तमाम लेखकों ने विषय बनाया ..हेमिंग्वे ,कामू,मार्खेज़ या फिर हिन्दी के लेखक भीष्म साहनी ,निर्मल वर्मा,श्रीकांत वर्मा ऐसे और भी उत्क्रष्ट कोटि के लेखक हैं |म्रत्यु एक अवस्था है एक स्थिति इसको शिल्प या चिन्तन की द्रष्टि से भले ही अलग कर लें लेकिन संवेदना के स्तर पर आखिर कितना फासला रख सकते हैं ?(प्रथम भाग)
20 जून 2014
सुपरिचित कथाकार-कवि Vandana Shukla (वंदना शुक्ल) इस बार अनुनाद के लिए संगीत का अनुपम उपहार लायीं तो लगा किसी अमर प्रतीक्षा का सुफल मिला। कविता के कार्यकर्ता हमेशा ही संगीत की ओर झुकते हैं। दोनों कलाओं का अन्तर्सम्बन्ध अपने आपमें एक पुराकथा है। वंदना जी ख़ुद कुशल ध्रुपद गायिका हैं और हम इन कविताओं के लिए उनका हार्दिक आभार व्यक्त करते हैं।
***
http://anunaad.blogspot.in/2014/06/blog-post_21.html
***
http://anunaad.blogspot.in/2014/06/blog-post_21.html
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
