18 दिसंबर 2014

एक अजीबोगरीब नोबेल पुरस्कार विजेता ...दारियो फ़ो 
क्या आप यकीन करेंगे कि दुनियां के सबसे महंगे और प्रतिष्ठित पुरस्कार नोबेल पुरस्कार से एक ऐसे विवादास्पद साहित्यकार (मूलतः नाटककार)को नवाज़ा गया था जो अपनी विवादित रचनाओं के कारन न सिर्फ कई बार पिटा ,अपमानित हुआ बल्कि उसे जेल में बंद कर यातनाएं तक दी गईं थीं लेकिन उसने लिखना नहीं छोड़ा |इटली के महान नाटककार और अभिनेता दारियो फ़ो ने राजनीतिज्ञों,शासकों समस्त बुर्जुआ वर्ग,पादरियों ,पुलिस कर्मियों आदि से सम्बंधित विषयों को अपने व्यंगात्मक,तीखे कटाक्ष और माजाकिये नाटकों का प्रमुख विषय बनाया |वे प्रयोगवादी नाटककार और अभिनेता हैं फ़ो का समस्त लेखन सर्वहारा शोषित और उत्पीडित तबके के लिए है |उन्हें अपने सबसे चर्चित नाटक ‘’एक्सीडेंटल डेथ ऑफ एन एनार्किस्ट’’ पर नोबेल पुरस्कार दिया गया | इसके अलावा पुरस्कार भाषण में उनके दुसरे नाटक ‘’वी कांट पे ,वी डोंट पे’’को भी सराहा गया |जब उन्हें नोबेल पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना मिली तब वो कार से कहीं जा रहे थे |एक अन्य कार चालक ने उन्हें रोककर ये सूचना दी तो वो हतप्रभ रह गए |उन्होंने हँसते हुए कहा ‘’मुझे तो लगता था कि मैं ही दुनिया को चकित कर सकता हूँ ‘’|उनके नाटकों की खासियत ये रही कि आम जनता को उनके नाटक बेहद प्रिय थे क्यूँ कि वो उन्हीं के लिए लिखे गए थे लेकिन वैटिकन ,राजनीतिज्ञों,पादरियों आदि को वे भड़काऊ और प्रतिबंधित करने लायक लगते थे तभी तो उनके एक नाटक ‘’मिस्तेरो वुफो ‘’को दिखाया गया तो वैटिकन ने इस नाटक को टेलीविज़न पर दिखाए गए कार्यक्रमों में सर्वाधिक ‘’ब्लेस्फीमल’’ कह कर आलोचना की | मजदूरों के लिए लिखे गए एक नाटक के लिए उन्हें टेलीविजन के कार्यक्रमों से निष्काषित कर दिया गया था ये प्रतिबन्ध पंद्रह वर्षों तक रहा |उल्लेखनीय है कि वो अपने लेखन से नौकरशाहों,शोषकों आदि के ही नहीं बल्कि सर्वहारा और पीड़ित वर्ग के दिलों में भी एक हलचल पैदा करना चाहते थे |कहा जाता है कि फ़ो जो हमेशा आतंकवाद के खिलाफ लिखते रहे लेकिन उनके खिलाफ दुष्प्रचार के तहत उन्हें अमेरिका में आतंकवादी कहकर रोक दिया गया था |ये प्रतिबन्ध उन पर दो वर्षों तक रहा |सुप्रसिद्ध आलोचक /समीक्षक देवेन्द्र इस्सर कहते हैं ‘’ फ़ो के नाटक इब्सन और बनार्ड शा की याद दिलाते हैं |’’उनकी पत्नी फ्रांका रामे स्वयं एक मंजी हुई अभिनेत्री थीं |उन्होंने फ़ो के कई नाटकों में अभिनय किया और पिछले वर्ष यानी २०१३ में उनका देहांत हो गया |रामे ने अपने पति दारियो फ़ो के साथ मिलकर कुछ नाटक लिखे भी थे जिनमे प्रमुख है ‘’इट इज ऑल बैड एंड बोल्ड ‘’इसमें रामे ने अविस्मरनीय अभिनय भी किया था | रामे ने स्वयं नारी मुक्ति को विषय बनाकर कई मोनोलॉग लिखे हैं जिन्हें ‘फेमिनिस्ट क्लासिक’’ कहा जाता है |1973 में फासीवादियों द्वारा रामे का अपहरण कर लिया गया और खून में लथपथ सडक पर फेंक दिया गया था |इसके बावजूद पति पत्नी ने हार नहीं मानी और वे नाटकों को लिखने व मंचित करने में जुटे रहे | न सिर्फ एक सार्थक लेखन करने ,नोबेल पुरस्कार तक पहुँचने के लिए बल्कि एक दुसरे के लिए समर्पित दंपत्ति का एक अप्रतिम उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए भी उन्हें याद किया जाएगा |जब फ़ो को 1997 साहित्य नोबेल पुरस्कार घोषित हुआ तो उन्होंने उसे अपने उन अभिनेताओं को देने की घोषणा की ये कहकर कि ‘’जिन्होंने पैरोडी और व्यंग द्वारा अन्याय के विरुद्ध युद्ध किया जिनमे ये कहने के साहस है कि ‘’सम्राट वस्त्र विहीन है ‘’उन्हें समर्पित ‘’

19 अक्टूबर 2014

5 अक्टूबर 2014


ईद के इस मुबारक मौके पर मेरी कहानी ''ईद मुबारक''विविध भारती के उद्घोषक युनुस खान की आवाज़ में सुनिए

http://katha-paath.blogspot.in/2014/10/story-eid-mubaarak-writer-vandana.html 

24 सितंबर 2014

मार्खेज़ ने कहा था लेखन एक तनहा पेशा है | इन चंद शब्दों के पीछे लेखक और लेखन की तमाम उलझनों व् तर्कों का समाधान छिपा है | ज़ाहिर है कि लेखन किसी लेखक के लिए उसका एक निहायत व्यक्तिगत अनुभव और कल्पनाशीलता का माध्यम है लेकिन वो सार्थकता पाठकों के बीच (सामूहिक पक्ष में )ही पाता है |किसी रचना की महत्ता का गणित अंकों पर नहीं बल्कि प्रतिभा की गुणवत्ता पर आश्रित होता है |लेकिन श्रेष्ठता के मायने ये कौन और कैसे निर्धारित करेगा ? इसे ‘’योग्यता’’ के किस बैरोमीटर से नापा जाएगा? कितना यथार्थ ,कितनी कल्पना,कैसी प्रतीकात्मकता और कितने संकेत और ब्योरे इनके अनुपात ,विश्वसनीयता ,सम्मिश्रण ये सब वस्ताविकता की किस कसौटी पर परखा जाए ये एक गंभीर मसला है |ये कौन तय करेगा कि कहानी का आलोचक अपने संज्ञान, अनुभवों ,तटस्थता आदि के स्तर पर आलोचना के मापदंडों हेतु स्वयं कितना सटीक बैठता है ?किसी कहानी की बाकायदा आलोचना करना और किसी कहानी पर अपना ‘’पाठकीय मत’’ देना ये दो बिलकुल अलग बातें हैं |किसी भी रचना को पढने उस पर अपना पक्ष रखने और उसके लेखन की बारीकियों को बताने की कसौटी हर पाठक (आलोचक की भी ) अलग अलग होती है जो उसके स्वयं के लेखिकीय अनुभवों उसकी चारित्रिक विशेषताओं व् उसके साहित्यिक ओहदे पर भी निर्भर करती है |कभी कभी एक सामान्य पाठक एक सिद्धहस्त आलोचक (?) से अधिक सटीक समीक्षा और सूक्षम आकलन कर देता है | किसी रचना विशेष के सन्दर्भ में जब आलोचक सहित सब पाठकों की प्रतिक्रियाएं उनकी रूचि के विषय ,शिल्प आदि से सम्बंधित अलग अलग होती हैं तो फिर किसी एक व्यक्ति द्वारा उस रचना की आलोचना (प्रसंशा या बुराई) को सटीक कैसे माना जा सकता है ?

5 सितंबर 2014

ये सच है कि मनुष्य गलतियों से ही सीखता है लेकिन गलतियां जब मूर्खता और जल्दबाजी की वजह से हुई हों तो स्थिति एक बार पुनः आत्मविश्लेषण की होना स्वाभाविक है |पिछले कुछ महीनों में फेसबुक ,भिन्न भिन्न पत्रिकाओं और पुरुस्कारों के भुलावे में आकर एकमुश्त सभी ‘प्रसंषित’ किताबें खरीद लीं और उन्हें पढ़ना शुरू किया |ज़ाहिर था कि उनका एक विशेष आकर्षण और छवि मस्तिष्क में थी लेकिन जब पढ़ना शुरू किया तो कुछ तो उनमे से कुछ (बहुत कम ) वाकई अच्छी थीं लेकिन कुछ को पढ़कर लगा कि आखिर इनमे ऐसा क्या था जिसे इतना आभामंडित करके व्याख्यायित किया गया पुरूस्कार दिए गए ?माना कि पाठकों ,आलोचकों व् स्वयं लेखक की द्रष्टि में फर्क हो सकता है लेकिन इतना ?...सच हतप्रभ हूँ |  

7 जुलाई 2014

‘’वॉर एंड पीस’’ और ‘’अन्ना केरेनीना’’ जैसी महान कृतियों के लेखक टोलसटॉय और ‘’द लास्ट सपर ‘’ ,मैडोना ऑफ़ द रोक्स ‘’ और विश्व प्रसिद्द रचना ‘’मोनालिसा’’ के अद्भुत कलाकार लियोनार्दो दा विन्सी यद्यपि एक लेखक है और दूसरा कलाकार लेकिन दोनो में एक अद्भुत समानता है |दौनों ने ही अपनी स्वयं गढ़ी गयी कृतियों से इस क़दर प्रेम किया कि ताजिन्दगी वो उतना प्रेम किसी जीवंत स्त्री को नहीं कर पाए | अन्ना केरेनीना उपन्यास का प्रारम्भ एक प्लेटफोर्म से होता है (और अंत भी प्लेटफोर्म पर ही )| टालस्टॉय इस उपन्यास के दौरान अपनी नायिका अन्ना के प्रेम में डूब गए |एक विवाहित स्त्री के प्रेम से कहानी निर्लिप्त भाव से शुरू होती है लेकिन धीरे धीरे ये महसूस होने लगता है कि अन्ना के प्रति उनके ह्रदय में कोई कोमलता है जो आहिस्ता आहिस्ता विवशता और अवसाद में बदलती जाती है ...सामाजिक ,पारिवारिक ,ममत्व आदि की विसंगतियां व् असुरक्षा का मिला जुला भाव और अंतत वो आत्महत्या कर लेती हैं| वहीं विन्सी के बारे में कहा जाता है कि उनकी अनेकों कृतियाँ यहाँ वहां पडी रहती थीं लेकिन मोनालिसा की कलाकृति को ताजिन्दगी (2 मई 1519 तक )उन्होंने अपने से अलग नहीं किया वो जहाँ गए उसे अपने साथ लेकर गए |विश्व प्रसिद्द लेखक मार्खेज़ के बारे में भी कहा जाता है कि अपने एक उपन्यास की नायिका की म्रत्यु के बाद वो फूट फूट कर रोये |हमारे यहाँ मीरा और कृष्ण के प्रेम को इस द्रष्टि से देखा जा सकता है लेकिन कृष्ण की छवि मीरा के मन में पहले से थी और इन महान रचयिताओं ने अपना प्रेम खुद गढ़ा और जीवन पर्यंत उससे लिप्त रहे |