14 अप्रैल 2016

बंबई न जाने कब चुपचाप एक दिन मुम्बई हो गयी और कलकत्ता कोलकाता पता ही नहीं चला लेकिन ....|एक तरफ जातिवादिता को गरियाया जाता है तो दूसरी और गुर्जर, जाट पटेल जैसे संपन्न, दलित कहलाने को व्याकुल लोग आरक्षण की मांग करते हैं |लाखों की संपत्ति फूंक दी जाती है , लोग मरते हैं  ,बलात्कार होते हैं ... | देश को आजाद हुए , उसका अपना संविधान बने ,उसे लोकतंत्र का दर्जा मिले सात दशक होने को हैं लेकिन आज़ादी की जो अभिव्यक्ति अब देखने को मिल रही है वो अभूतपूर्व है |

7 मार्च 2016

महिला दिवस पर


कल NDTV पर कुछ जानी मानी सामाजिक कार्यकर्ताओं की बातचीत सुनी ..अच्छी लगी |इसमें सुप्रसिद्ध समाजशास्त्री कमला भसीन भी थीं उनके कुछ विचार यहाँ संक्षिप्त में ..

पुरुष सत्तात्मकता का दोष सिर्फ पुरुष के ऊपर मढना गलत है क्यूँ कि इस विचार व् धारणा में स्त्री भी बराबर की भागीदार है वो इस तरह कि वो स्वयं उसे सहर्ष स्वीकार रही है | वो पति के लिए व्रत उपवास/ पूजा पाठ करती है | घर/ ऑफिस दौनों मोर्चो को स्वयं संभालती है |बच्चों के स्कूल में फीस भरने या पेरेंट्स टीचर मीटिंग में खुद जाती है अर्थात घर बाहर की तमाम जिम्मेदारियां वो स्वयं अकेले उठाना अपना कर्तव्य समझती है | कमला भसीन जी की इस दलील से कुछ अंश तक सहमत हुआ जा सकता है क्यूँ कि पहले की अपेक्षा आज की पीढी अपने बच्चों व् परिवार को लेकर ज्यादा सजग है |संभवतः इसका कारण एकल परिवार  व्  पति पत्नी दौनों का नौकरीपेशा होना है |लेकिन अपने अगले ही वाक्य में कमला जी कहती हैं हालाकि इस वर्ग (मध्यवर्ग)की स्त्री बाकयदा मानवता और नैतिकता के आधार पर (दलील दे ) विरोध भी करती है लेकिन उसके विरोध को इस पुरुषवादी समाज में ज्यादा तरजीह नहीं दी जाती वैसे भी विरोध करने वाली स्त्री तो पढी लिखी , जागरूक और आधुनिक महिला है लेकिन इसका प्रतिशत अपेक्षाकृत ( औसत रूप से )बहुत कम है इस वर्ग की ज्यादातर महिलाएं सब कुछ सह जाने में ही अधिक विशवास और सुरक्षा महसूस करती हैं | हमारे यहाँ लडकी के मन में शुरू से ये भरा जाता है कि उसे दूसरे घर जाना है , वहां सबकी सेवा करनी हैं ,पति का ख्याल रखना है इन्हें सुसंस्कारों में जोड़ा जाता है लेकिन उसी घर ले लड़के को क्या ये ‘’संस्कार’’ दिए जाते हैं कि तुम्हे खाना बनाना या घर का कामकाज  सीखना है ताकि अपनी नौकरीपेशा पत्नी (जो आजकल ८० प्रतिशत ) है उसे सहयोग कर सको ? कमला भसीन जी ने बताया कि आज निम्न वर्ग की महिलायें अपेक्षाकृत अधिक साहसी महिलायें हैं |वो पति से पिटती भी हैं तो चीख चिल्लाकर उसका विरोध भी करती हैं और सार्वजानिक रूप से उसे गालियाँ देने का माद्दा भी रखती हैं | लेकिन मध्यवर्ग की स्त्री घरेलू हिंसा को चुपचाप सहती है , ‘’गिर गयी थी ‘’ कहकर चोटों को छिपाती हैं |एक तो उस पर ‘समाज क्या कहेगा’’ का संकोच और दुसरे ‘’कहीं निकाल दिया तो कहाँ जायेगी “ की फ़िक्र | वो कहती हैं कि मैं अपने घर की पहली पीढी  हूँ जब घर से बाहर नौकरी के लिए निकली लेकिन उस वक़्त मेरे घर में जो बाई काम कर रही थी उसकी दादी परदादी भी आत्म निर्भर थी घरों में काम करती थी | संघर्ष सभी वर्गों की महिलायें करती हैं लेकिन उन संघर्षों व् पीडाओं को सहती अलग अलग तरीके से हैं | अंत में उन्होंने अपनी ही लिखी एक कविता के कुछ अंश पढ़े जिनका अर्थ कुछ ये था ‘’आज की लडकियां सूरज की तरह चमकती हैं , लहरों की तरह लहराती हैं, फूलों की तरह खिलती हैं क्यूँ कि उन्हें इन सबमे आनंद आता है ...उन्हें खिलने दो...बहने दो...चमकने दो....|
कल NDTV पर कुछ जानी मानी सामाजिक कार्यकर्ताओं की बातचीत सुनी ..अच्छी लगी |इसमें सुप्रसिद्ध समाजशास्त्री कमला भसीन भी थीं उनके कुछ विचार यहाँ संक्षिप्त में ..

पुरुष सत्तात्मकता का दोष सिर्फ पुरुष के ऊपर मढना गलत है क्यूँ कि इस विचार व् धारणा में स्त्री भी बराबर की भागीदार है वो इस तरह कि वो स्वयं उसे सहर्ष स्वीकार रही है | वो पति के लिए व्रत उपवास/ पूजा पाठ करती है | घर/ ऑफिस दौनों मोर्चो को स्वयं संभालती है |बच्चों के स्कूल में फीस भरने या पेरेंट्स टीचर मीटिंग में खुद जाती है अर्थात घर बाहर की तमाम जिम्मेदारियां वो स्वयं अकेले उठाना अपना कर्तव्य समझती है | कमला भसीन जी की इस दलील से कुछ अंश तक सहमत हुआ जा सकता है क्यूँ कि पहले की अपेक्षा आज की पीढी अपने बच्चों व् परिवार को लेकर ज्यादा सजग है |संभवतः इसका कारण एकल परिवार  व्  पति पत्नी दौनों का नौकरीपेशा होना है |लेकिन अपने अगले ही वाक्य में कमला जी कहती हैं हालाकि इस वर्ग (मध्यवर्ग)की स्त्री बाकयदा मानवता और नैतिकता के आधार पर (दलील दे ) विरोध भी करती है लेकिन उसके विरोध को इस पुरुषवादी समाज में ज्यादा तरजीह नहीं दी जाती वैसे भी विरोध करने वाली स्त्री तो पढी लिखी , जागरूक और आधुनिक महिला है लेकिन इसका प्रतिशत अपेक्षाकृत ( औसत रूप से )बहुत कम है इस वर्ग की ज्यादातर महिलाएं सब कुछ सह जाने में ही अधिक विशवास और सुरक्षा महसूस करती हैं | हमारे यहाँ लडकी के मन में शुरू से ये भरा जाता है कि उसे दूसरे घर जाना है , वहां सबकी सेवा करनी हैं ,पति का ख्याल रखना है इन्हें सुसंस्कारों में जोड़ा जाता है लेकिन उसी घर ले लड़के को क्या ये ‘’संस्कार’’ दिए जाते हैं कि तुम्हे खाना बनाना या घर का कामकाज  सीखना है ताकि अपनी नौकरीपेशा पत्नी (जो आजकल ८० प्रतिशत ) है उसे सहयोग कर सको ? कमला भसीन जी ने बताया कि आज निम्न वर्ग की महिलायें अपेक्षाकृत अधिक साहसी महिलायें हैं |वो पति से पिटती भी हैं तो चीख चिल्लाकर उसका विरोध भी करती हैं और सार्वजानिक रूप से उसे गालियाँ देने का माद्दा भी रखती हैं | लेकिन मध्यवर्ग की स्त्री घरेलू हिंसा को चुपचाप सहती है , ‘’गिर गयी थी ‘’ कहकर चोटों को छिपाती हैं |एक तो उस पर ‘समाज क्या कहेगा’’ का संकोच और दुसरे ‘’कहीं निकाल दिया तो कहाँ जायेगी “ की फ़िक्र | वो कहती हैं कि मैं अपने घर की पहली पीढी  हूँ जब घर से बाहर नौकरी के लिए निकली लेकिन उस वक़्त मेरे घर में जो बाई काम कर रही थी उसकी दादी परदादी भी आत्म निर्भर थी घरों में काम करती थी | संघर्ष सभी वर्गों की महिलायें करती हैं लेकिन उन संघर्षों व् पीडाओं को सहती अलग अलग तरीके से हैं | अंत में उन्होंने अपनी ही लिखी एक कविता के कुछ अंश पढ़े जिनका अर्थ कुछ ये था ‘’आज की लडकियां सूरज की तरह चमकती हैं , लहरों की तरह लहराती हैं, फूलों की तरह खिलती हैं क्यूँ कि उन्हें इन सबमे आनंद आता है ...उन्हें खिलने दो...बहने दो...चमकने दो....|

8 जनवरी 2016

दारियो फ़ो

नए साल की पहली सुबह ...एक खुशमिजाज़, बिंदास ,अजीवोगारीब नोबेल पुरस्कार विजेता को याद करते हुए ..
...दारियो फ़ो 
क्या आप यकीन करेंगे कि दुनियां के सबसे महंगे और सम्मानजनक पुरस्कार नोबेल पुरस्कार से एक ऐसे विवादास्पद साहित्यकार (मूलतः नाटककार)को नवाज़ा गया था जो अपनी विवादित रचनाओं के कारन न सिर्फ कई बार पिटा ,अपमानित हुआ बल्कि उसे जेल में बंद कर यातनाएं तक दी गईं थीं लेकिन उसने लिखना नहीं छोड़ा |इटली के महान नाटककार और अभिनेता दारियो फ़ो ने राजनीतिज्ञों,शासकों समस्त बुर्जुआ वर्ग,पादरियों ,पुलिस कर्मियों आदि से सम्बंधित विषयों को अपने व्यंगात्मक,तीखे कटाक्ष और माजाकिये नाटकों का प्रमुख विषय बनाया |वे प्रयोगवादी नाटककार और अभिनेता हैं |फ़ो का समस्त लेखन सर्वहारा शोषित और उत्पीडित तबके के लिए है |उन्हें अपने सबसे चर्चित नाटक ‘’एक्सीडेंटल डेथ ऑफ एन एनार्किस्ट’’ पर नोबेल पुरस्कार दिया गया | इसके अलावा पुरस्कार भाषण में उनके दुसरे नाटक ‘’वी कांट पे ,वी डोंट पे’’को भी सराहा गया |जब उन्हें नोबेल पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना मिली तब वो कार से कहीं जा रहे थे |एक अन्य कार चालक ने उन्हें रोककर ये सूचना दी तो वो हतप्रभ रह गए |उन्होंने हँसते हुए कहा ‘’मुझे तो लगता था कि मैं ही दुनिया को चकित कर सकता हूँ ‘’|उनके नाटकों की खासियत ये थी कि आम जनता को उनके नाटक बेहद प्रिय थे क्यूँ कि वो उन्हीं के लिए लिखे गए थे लेकिन वैटिकन ,राजनीतिज्ञों,पादरियों आदि को वे भड़काऊ और प्रतिबंधित करने लायक लगते थे तभी तो उनके एक नाटक ‘’मिस्तेरो वुफो ‘’को दिखाया गया तो वैटिकन ने इस नाटक को टेलीविज़न पर दिखाए गए कार्यक्रमों में सर्वाधिक ‘’ब्लेस्फीमल’’ कह कर आलोचना की | मजदूरों के लिए लिखे गए एक नाटक के लिए उन्हें टेलीविजन के कार्यक्रमों से निष्काषित कर दिया गया था ये प्रतिबन्ध पंद्रह वर्षों तक रहा |उल्लेखनीय है कि वो अपने लेखन से नौकरशाहों,शोषकों आदि के ही नहीं बल्कि सर्वहारा और पीड़ित वर्ग के दिलों में भी एक हलचल पैदा करना चाहते थे |कहा जाता है कि फ़ो जो हमेशा आतंकवाद के खिलाफ लिखते रहे लेकिन उनके खिलाफ दुष्प्रचार के तहत उन्हें अमेरिका में आतंकवादी कहकर रोक दिया गया था |सुप्रसिद्ध लेखक आलोचक /समीक्षक देवेन्द्र इस्सर कहते हैं ‘’ फ़ो के नाटक इब्सन और बनार्ड शा की याद दिलाते हैं |’’उनकी पत्नी फ्रांका रामे स्वयं एक मांझी हुई अभिनेत्री थीं |उन्होंने फ़ो के कई नाटकों में अभिनय किया और २०१३ में उनका देहांत हो गया |रामे ने अपने पति दारियो फ़ो के साथ मिलकर कुछ नाटक लिखे भी थे जिनमे प्रमुख है ‘’इट इज ऑल बैड एंड बोल्ड ‘’इसमें रामे ने अविस्मरनीय अभिनय भी किया था | उन्होंने स्वयं नारी मुक्ति को विषय बनाकर कई मोनोलॉग लिखे हैं जिन्हें ‘फेमिनिस्ट क्लासिक’’ कहा जाता है |१९७३ में फासीवादियों द्वारा रामे का अपहरण कर लिया गया और खून में लथपथ सडक पर फेंक दिया गया था |इसके बावजूद पति पत्नी ने हार नहीं मानी और वे नाटकों को लिखने व मंचित करने में जुटे रहे |और जब फ़ो को 1997 साहित्य नोबेल पुरस्कार घोषित हुआ तो उन्होंने उसे अपने उन अभिनेताओं को देने की घोषणा की ये कहकर कि ‘’जिन्होंने पैरोडी और व्यंग द्वारा अन्याय के विरुद्ध युद्ध किया जिनमे ये कहने के साहस है कि ‘’सम्राट वस्त्र विहीन है ‘’उन्हें समर्पित ‘’|

अजीबोगरीब नोबेल मुर्स्कार विजेता ..दारियो फ़ो

दरियों ,पुलिस कर्मियों आदि से सम्बंधित विषयों को अपने व्यंगात्मक,तीखे कटाक्ष और माजाकिये नाटकों का प्रमुख विषय बनाया |वे प्रयोगवादी नाटककार और अभिनेता हैं |फ़ो का समस्त लेखन सर्वहारा शोषित और उत्पीडित तबके के लिए है |उन्हें अपने सबसे चर्चित नाटक ‘’एक्सीडेंटल डेथ ऑफ एन एनार्किस्ट’’ पर नोबेल पुरस्कार दिया गया | इसके अलावा पुरस्कार भाषण में उनके दुसरे नाटक ‘’वी कांट पे ,वी डोंट पे’’को भी सराहा गया |जब उन्हें नोबेल पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना मिली तब वो कार से कहीं जा रहे थे |एक अन्य कार चालक ने उन्हें रोककर ये सूचना दी तो वो हतप्रभ रह गए |उन्होंने हँसते हुए कहा ‘’मुझे तो लगता था कि मैं ही दुनिया को चकित कर सकता हूँ ‘’|उनके नाटकों की खासियत ये थी कि आम जनता को उनके नाटक बेहद प्रिय थे क्यूँ कि वो उन्हीं के लिए लिखे गए थे लेकिन वैटिकन ,राजनीतिज्ञों,पादरियों आदि को वे भड़काऊ और प्रतिबंधित करने लायक लगते थे तभी तो उनके एक नाटक ‘’मिस्तेरो वुफो ‘’को दिखाया गया तो वैटिकन ने इस नाटक को टेलीविज़न पर दिखाए गए कार्यक्रमों में सर्वाधिक ‘’ब्लेस्फीमल’’ कह कर आलोचना की | मजदूरों के लिए लिखे गए एक नाटक के लिए उन्हें टेलीविजन के कार्यक्रमों से निष्काषित कर दिया गया था ये प्रतिबन्ध पंद्रह वर्षों तक रहा |उल्लेखनीय है कि वो अपने लेखन से नौकरशाहों,शोषकों आदि के ही नहीं बल्कि सर्वहारा और पीड़ित वर्ग के दिलों में भी एक हलचल पैदा करना चाहते थे |कहा जाता है कि फ़ो जो हमेशा आतंकवाद के खिलाफ लिखते रहे लेकिन उनके खिलाफ दुष्प्रचार के तहत उन्हें अमेरिका में आतंकवादी कहकर रोक दिया गया था |सुप्रसिद्ध लेखक आलोचक /समीक्षक देवेन्द्र इस्सर कहते हैं ‘’ फ़ो के नाटक इब्सन और बनार्ड शा की याद दिलाते हैं |’’उनकी पत्नी फ्रांका रामे स्वयं एक मांझी हुई अभिनेत्री थीं |उन्होंने फ़ो के कई नाटकों में अभिनय किया और २०१३ में उनका देहांत हो गया |रामे ने अपने पति दारियो फ़ो के साथ मिलकर कुछ नाटक लिखे भी थे जिनमे प्रमुख है ‘’इट इज ऑल बैड एंड बोल्ड ‘’इसमें रामे ने अविस्मरनीय अभिनय भी किया था | उन्होंने स्वयं नारी मुक्ति को विषय बनाकर कई मोनोलॉग लिखे हैं जिन्हें ‘फेमिनिस्ट क्लासिक’’ कहा जाता है |१९७३ में फासीवादियों द्वारा रामे का अपहरण कर लिया गया और खून में लथपथ सडक पर फेंक दिया गया था |इसके बावजूद पति पत्नी ने हार नहीं मानी और वे नाटकों को लिखने व मंचित करने में जुटे रहे |और जब फ़ो को 1997 साहित्य नोबेल पुरस्कार घोषित हुआ तो उन्होंने उसे अपने उन अभिनेताओं को देने की घोषणा की ये कहकर कि ‘’जिन्होंने पैरोडी और व्यंग द्वारा अन्याय के विरुद्ध युद्ध किया जिनमे ये कहने के साहस है कि ‘’सम्राट वस्त्र विहीन है ‘’उन्हें समर्पित ‘’|

31 दिसंबर 2015

स्म्रतियों के अपभ्रंश
ये वर्ष यात्राओं के नाम रहा |माउंट आबू,अजमेर,पुष्कर से लेकर सिंगापुर  .मलेशिया ,इंडोनेशिया तक |ज़ाहिर है सिर्फ घूमना फिरना मौज मस्ती ही नहीं बल्कि अनुभवों व् जानकारियों के खजाने भी हाथ लगे |इसी वर्ष ’’आहा ज़िंदगी’’ ने नवम्बर माह में सिंगापूर यात्रा वृत्तांत प्रकाशित भी किया |इस बीच फोटोग्राफी में भी आजमाइश हुई |पारिवारिक उत्तरदायित्वों,नौकरी ,यात्राओं की अधिकता (व्यस्तता) के बीच लिखना पढ़ना भी चलता रहा |lलेखन में खुशी- अवसाद के पल धूप छाँव की तरह आते जाते रहे |लिखना पढना जारी-स्थगित करने के निर्णय लिए जाते रहे |इन्हीं सब अनुभूतियों के साथवागर्थ,हंस,कथादेश,लमही,पाखी,बया,परिकथा,वर्तमान साहित्य,पूर्व कथन,आउट लुक ,जनसत्ता,कथाक्रम,निकट,नई दुनियां में कहानियाँ प्रकाशित हुईं |तो कुछ कहानियों के अनुवाद अंगरेजी,उर्दू,उडिया,पंजाबी ,तमिल और गुजराती में प्रकाशित हुए |इस बीच कविताओं के शौक को भी स-संकोच पूरा किया | मंतव्य, साहित्य अमृत में कवितायेँ प्रकाशित हुईं तथा गाथांतर,यात्रा और बोधि प्रकाशन से प्रकाशित चयनित कविताओं के संकलन में कविताओं को स्थान मिला |आकाशवाणी पर भी कविताओं का प्रसारण हुआ | तीन कवितायेँ (चौराहे भाग एक,दो,तीन ) क्रोशिया विश्वविद्यालय के इन्डोलॉजी विभाग के पाठ्यक्रम में शामिल की गईं |निस्संदेह ये मेरे लिए इस वर्ष का एक महत्वपूर्ण एचीवमेंट था |दो एक पुरस्कार भी मिले जिनमे से कथादेश व् सर्नुनाह (सिंगापुर) के तत्वावधान में रहस्य रोमांच प्रतियोगिता के अंतर्गत मेरी कहानी ‘’अपने होने के विरुद्ध’’को चयनित किया गया |प्राप्त राशि के अतिरिक्त कहानी को पुरस्कृत अन्य छः कहानियों के साथ फ्रेंच, अंगरेजी व् स्पेनिश भाषा में अनुवादित व् प्रकाशित करने की योजना भी थी (हालाकि इस सम्बन्ध में उसके बाद कोई सूचना नहीं )| नए वर्ष में पहल, लमही समेत कुछ पत्रिकाओं में कहानी स्वीकृत हुई हैं |वहीं कुछ विशेषांकों (पुस्तक रूप के लिए ) चयनित कहानियों में संबोधन (श्रेष्ठ प्रेम कथाएं ),’’मध्य प्रदेश के रचनाकार ( भोपाल ) व् आधुनिक हिन्दी साहित्य की उत्कृष्ट कहानियाँ (शब्द निष्ठां प्रतियोगिता में पुरस्कृत कहानी ) है | पूरा वर्ष छोटी मोटी उपलब्धियों के साथ उतर चढ़ाव मय बीता |साहित्य जगत से सम्बंधित कई भ्रम टूटे |हर भ्रम ने एक नयी सोच और सीख दी |खुद में परिवर्तन लाने के अवसर दिए | जिन संपादकों ,लेखकों, पाठकों,आलोचकों ने लेखन जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया ,प्रेरणा दी उनके प्रति हार्दिक आभार |नया वर्ष आप सभी के लिए सुखमय आनंदमय हो....शुभकामनायें |



30 अक्टूबर 2015

दुःख और पीड़ा ऐसे शब्द हैं जो भौगोलिक सीमाओं में यकीन नहीं करते |संवेदनाएं और वेदनाएं सार्वभौमिक सत्य हैं | दुःख /पीड़ा पूरे संसार में एक सी होती है |कोई मुल्क ये दावा नहीं कर सकता कि हमारे यहाँ दुःख और पीडाएं फलां देश से कम हैं क्यूँ कि हम आधुनिक और विकसित राष्ट्र हैं |गौरतलब है कि चीन में कुछ महीनों पहले तक एक संतान का नियम था |दो संतान होने पर कड़ी सज़ा का प्रावधान था| इस संवैधानिक क़ानून ने वहां के सामाजिक जीवन को अस्त व्यस्त कर दिया था |कई पारिवारिक विडम्बनाओं/विसंगतियों ने लोगों को जीने /मरने की स्थिति तक ला दिया | पुलिस की बर्बरता की इंतिहा हो गयी |कई नागरिक दो बच्चे होने पर भय से सिंगापूर मलेशिया जैसे देशों में पलायन कर गए |  एक औरत जिसके पति ने अपने इकलौते तीन वर्षीय बेटे को धन के लालच में चीन में ही किसी को बेच दिया और भाग गया था |औरत अच्छी खासी नौकरी छोड़कर पुत्र की तलाश में जुट गयी |शहरों,पुलिस दफ्तरों के चक्कर,शरणार्थी शिविरों, अनाथालयों में मारी मारी फिरी और दाने दाने को मोहताज़ हो गयी |अंततः जब ग्यारह वर्षों बाद उसका बेटा पुलिस द्वारा खोज लिया गया और उसे सौंपा  गया तब उस नौजवान हो चुके बेटे ने माँ के साथ रहने से इनकार कर दिया क्यूँ कि उसे जहाँ बेचा गया था वो एक रईस परिवार था सर्व सुविधाओं सुविधाओं संपन्न |अतः अपनी भिखारिन माँ के साथ रहना बेटे ने खारिज कर दिया | इस घटना का  अंत ज्यादा त्रासद लगा जब उस माँ ने बेटे की इच्छा को सर्वोपरि रखते हुए खुशी २ बेटे को अपने घर से विदा किया और अब वो पूर्णतः संतुष्ट थी |वापस अपनी पुरानी नौकरी के लिए उसने आवेदन किया | (मेरी ये कहानी ‘’माँ’’ चीन के एक परिवार की इसी घटना पर आधारित है जो कुछ महीनों पहले ‘’पाखी’’ में प्रकाशित हुई थी )कल खबर देखी कि चीन से अंतत ये क़ानून हटा लिए गया है | खुशी हुई ... 

21 अक्टूबर 2015

इंसानों की दुनिया में ‘’भूलना’’ एक स्वाभाविक और सतत क्रिया है जिसे मनोवैज्ञानिक लाभप्रद और अति आवशयक मानते हैं |यदि भूलेंगे नहीं तो स्म्रतियों की परतें दिमाग में जमती जायेंगी और आदमी विक्षिप्त हो जाएगा | ग्रेगर सेम्सा बन जाएगा |लेकिन कुछ मामलों में लगता है दुनिया में जितनी अराजकता ,हिंसा ,क्रूरता ,त्रासदियाँ हैं , वो सब ‘’भूलते जाने’’ के ही कुपरिणाम हैं | पिछली सदी का सर्वाधिक जघन्य हत्याकांड निठारी ,भोपाल गैस त्रासदी ,उसके बाद निर्भया, फिर दो बहनों को मारकर पेड़ पर लटकाना, आरुशी और शीना (इन्द्रानी मुखर्जी ) काण्ड ,अख़लाक़ की हत्या,पत्रकारों, वामपंथियों की ह्त्या , आज मासूमोको जलाकर मार देने की घटना ...| क्या हमने पिछली इन घटनाओं में जो रोष दिखाया था , विरोध में तमाम आन्दोलन किये,मोमबत्तियां लेकर जुलूस निकाला ,उन हत्यारों ,दरिंदों का क्या हुआ जानने की कोशिश की ? कहीं कोट करने के लिए या किसी आलेख में विषय आ जाने पर उदाहरण स्वरुप भले ही उन त्रासदियों को स्मरण कर लिया जाए लेकिन घटना के वक्त हम जो उद्वेलित और क्रोधित हुए थे क्या उन घटनाओं के प्रति अब भी वो तीव्रता बाकी है ?ध्यातत्व है कि हमारी लचर क़ानून व्यवस्था, पुलिस व् नेतागणों सहित उन गुनाहगारों ने हमारी इस सायास भूल जाने की आदत का भरपूर लाभ उठाया है |