अजनबी शहरों में भी हर यात्री अपने प्रिय कोने खोज लेता है |(निर्मल वर्मा )
10 जुलाई 2016
15 जून 2016
Feeling thoughtful
सिंगापुर में एक नाईट सफारी है जो रात में ही खुलता है |ये प्रमुखतः एक जू है जहाँ हिप्पो , जिराफ , सफ़ेद भालू से लेकर पांडा , सफ़ेद हाथी तक अनोखे जानवर हैं| ये एक विशाल और खूबसूरत जंगल है जहाँ नदी , पुल , बड़े बड़े पेड़ , खूबसूरत बेलें आदि हैं |जानवरों के परिवार दूरी पर एक लट्टू की रोशनी में दिखाई देते हैं बाकी अन्धकार... |बेआवाज़ चलने वाली दर्शकों को ले जारही खुली ट्राम में धीमी आवाज में एक बेहद मधुर स्त्री स्वर में कोमेंट्री चलती रहती है |दर्शक बीचजंगल में कहीं भी उतर कर घूम सकते हैं |ट्राम आपको वहीं छोड़कर अन्धकार में गायब हो जाती है जोकरीब आधा पौन घंटे बाद दुसरे चक्कर पर आपको वापस ले जाती है |प्रकृति और उन जानवरों के परिवार को पास जाकर देख सकते हैं |वहां दर्शकों और उन जानवरों के बीच में लोहे की जाली है और जगह २ कैमरेलगे हैं ताकि कोई इमरजेंसी न हो |वो जंगल अद्भुत हैं | जंगल की अपनी एक ध्वनी होती है जो बस्तियों की भीड़ से अलग अलौकिक होती है | दूर तक बड़े बड़े दरख्त , रात में हवा में झूलती झूमती उनकी शाखाएं , चाँद की उन दरख्तों पर बिखरती रोशनी ,पत्तियों की सरसराहट , कहीं २ घुप्पएकांत के बीच किसी पक्षी का स्वर, किसी छोटे पुल से गुज़रते हुए नीचे बह रहे दरिये की छलछलाहट , दूर कहीं चौकड़ी भरता हिरन का जोड़ा |ये एक अद्भुत अलौकिक अनुभव से गुजरना है जहाँ कुछ देर के लिए सब कुछ भूल जाते हैं | मुझे दो जगहें विरल लगती हैं |एक बहुत उंचाई पर उड़ रहे प्लेन से बादलों के घने गुछे तैरते हुए देखना और उनके बीच से गुजरना दूसरा प्रकृति के बीच एकांत वन में सिर्फ प्रकृति के साथ विचरण करना ....
13 जून 2016
साहित्य समाज की दशा और दिशा बदलने की सामर्थ्य रखता है ..वर्षों पूर्व कहीं पढ़ा था |( शायद द्वितीय विश्वयुद्ध के किसी प्रकरण में )
आज इफरात लिखा जा रहा है |खूब पढ़ा जा रहा है | अपने अपने बुद्धि - मानदंडों के हिसाब से खूब सराहा – नकारा जा रहा है |इनाम इकराम मिल रहे हैं |लेखक लेखिकाएं बेशुमार प्रकाशित और देश -विदेश में पुरस्कृत हो रहे हैं |इतनी बड़ी बड़ी बातें , काव्यात्मक, कसीदेकार भाषा,बला का मार्मिक कारुणिक सब कुछ लिख रहे हैं लेकिन इस लिखे का कहीं असर हो रहा है क्या ? समाज पर, देश पर, बच्चों, पर, युवाओं पर या हम स्वयं पर ही | ब्रिटिश राज में कई ऐसे लेखकों की रचनाएं प्रतिबंधित हुईं जिनका प्रभाव अंगरेजी हुकूमत पर पडा था , कहीं न कहीं उन रचनाओं से समाज में विद्रोह जागने का अंदेशा था भय था इसीलिये उन्हें प्रतिबंधित किया गया |प्रश्न हुकूमत का नहीं सवाल साहित्य के प्रभाव का है | कभी नहीं सुना कि फलां लेखक / लेखिका द्वारा लिखे का सरकार तक पर प्रभाव पड़ा, छात्रों / स्त्रियों, (पाठकों) में एक जागरूकता पैदा हुई और उन्होंने इस अराजकता के प्रति आवाज उठाई |..क्या साहित्य में जो कुछ लिखा- पढ़ा जा रहा है वो वाकई असरकारक है या फिर ये लेखक के लिए सिर्फ एक लेखिकीय चुनौती, प्रकाशक के लिए एक व्यवसाय और पाठक के लिए महज एक पाठकीय दंभ ,मनोरंजन अथवा ज्ञानवर्धन का माध्यम भर है ? हालाकि साहित्य - कलाओं की अपनी सीमाएं हैं बावजूद इसके क्या साहित्य में हैं वो जादू ( असर ) कि वो सड़ी गली राजनीतिक विरूपता से मुठभेड़ कर सके ? न्यायिक व्यवस्था में परिवर्तन की मांग कर सके ? ऐसे राज्यों में जहाँ शिक्षा नीति एक मजाक बन गयी हो और बाकायदा वहां युवाओं को षड्यंत्र पूर्ण ढंग से ‘’अपढ़’’ (अज्ञानी ) रखे जाने का क्रूर खेल चल रहा हो कलम के दम पर उनके प्रति एक आन्दोलन खड़ा कर सकें ? क्या साहित्य समाज , देश में व्याप्त विरूपताओं , विसंगतियों को देख सुनकर लच्छेदार भाषा में , पाठक की सहानुभूति जगाकर ज्यूँ का ज्यूँ सिर्फ व्यक्त कर देने और वाह वाही बटोर लेने का साधन भर है? यदि ऐसा ही है तो काहे का साहित्य और काहे का लेखक ...
आज इफरात लिखा जा रहा है |खूब पढ़ा जा रहा है | अपने अपने बुद्धि - मानदंडों के हिसाब से खूब सराहा – नकारा जा रहा है |इनाम इकराम मिल रहे हैं |लेखक लेखिकाएं बेशुमार प्रकाशित और देश -विदेश में पुरस्कृत हो रहे हैं |इतनी बड़ी बड़ी बातें , काव्यात्मक, कसीदेकार भाषा,बला का मार्मिक कारुणिक सब कुछ लिख रहे हैं लेकिन इस लिखे का कहीं असर हो रहा है क्या ? समाज पर, देश पर, बच्चों, पर, युवाओं पर या हम स्वयं पर ही | ब्रिटिश राज में कई ऐसे लेखकों की रचनाएं प्रतिबंधित हुईं जिनका प्रभाव अंगरेजी हुकूमत पर पडा था , कहीं न कहीं उन रचनाओं से समाज में विद्रोह जागने का अंदेशा था भय था इसीलिये उन्हें प्रतिबंधित किया गया |प्रश्न हुकूमत का नहीं सवाल साहित्य के प्रभाव का है | कभी नहीं सुना कि फलां लेखक / लेखिका द्वारा लिखे का सरकार तक पर प्रभाव पड़ा, छात्रों / स्त्रियों, (पाठकों) में एक जागरूकता पैदा हुई और उन्होंने इस अराजकता के प्रति आवाज उठाई |..क्या साहित्य में जो कुछ लिखा- पढ़ा जा रहा है वो वाकई असरकारक है या फिर ये लेखक के लिए सिर्फ एक लेखिकीय चुनौती, प्रकाशक के लिए एक व्यवसाय और पाठक के लिए महज एक पाठकीय दंभ ,मनोरंजन अथवा ज्ञानवर्धन का माध्यम भर है ? हालाकि साहित्य - कलाओं की अपनी सीमाएं हैं बावजूद इसके क्या साहित्य में हैं वो जादू ( असर ) कि वो सड़ी गली राजनीतिक विरूपता से मुठभेड़ कर सके ? न्यायिक व्यवस्था में परिवर्तन की मांग कर सके ? ऐसे राज्यों में जहाँ शिक्षा नीति एक मजाक बन गयी हो और बाकायदा वहां युवाओं को षड्यंत्र पूर्ण ढंग से ‘’अपढ़’’ (अज्ञानी ) रखे जाने का क्रूर खेल चल रहा हो कलम के दम पर उनके प्रति एक आन्दोलन खड़ा कर सकें ? क्या साहित्य समाज , देश में व्याप्त विरूपताओं , विसंगतियों को देख सुनकर लच्छेदार भाषा में , पाठक की सहानुभूति जगाकर ज्यूँ का ज्यूँ सिर्फ व्यक्त कर देने और वाह वाही बटोर लेने का साधन भर है? यदि ऐसा ही है तो काहे का साहित्य और काहे का लेखक ...
14 अप्रैल 2016
बंबई न जाने कब
चुपचाप एक दिन मुम्बई हो गयी और कलकत्ता कोलकाता पता ही नहीं चला लेकिन ....|एक
तरफ जातिवादिता को गरियाया जाता है तो दूसरी और गुर्जर, जाट पटेल जैसे संपन्न, दलित
कहलाने को व्याकुल लोग आरक्षण की मांग करते हैं |लाखों की संपत्ति फूंक दी जाती है
, लोग मरते हैं ,बलात्कार होते हैं ... |
देश को आजाद हुए , उसका अपना संविधान बने ,उसे लोकतंत्र का दर्जा मिले सात दशक
होने को हैं लेकिन आज़ादी की जो अभिव्यक्ति अब देखने को मिल रही है वो अभूतपूर्व है
|
7 मार्च 2016
महिला दिवस पर
कल NDTV पर कुछ जानी मानी सामाजिक कार्यकर्ताओं की बातचीत
सुनी ..अच्छी लगी |इसमें सुप्रसिद्ध समाजशास्त्री कमला भसीन भी थीं उनके कुछ विचार
यहाँ संक्षिप्त में ..
पुरुष सत्तात्मकता
का दोष सिर्फ पुरुष के ऊपर मढना गलत है क्यूँ कि इस विचार व् धारणा में स्त्री भी बराबर
की भागीदार है वो इस तरह कि वो स्वयं उसे सहर्ष स्वीकार रही है | वो पति के लिए
व्रत उपवास/ पूजा पाठ करती है | घर/ ऑफिस दौनों मोर्चो को स्वयं संभालती है |बच्चों
के स्कूल में फीस भरने या पेरेंट्स टीचर मीटिंग में खुद जाती है अर्थात घर बाहर की
तमाम जिम्मेदारियां वो स्वयं अकेले उठाना अपना कर्तव्य समझती है | कमला भसीन जी की
इस दलील से कुछ अंश तक सहमत हुआ जा सकता है क्यूँ कि पहले की अपेक्षा आज की पीढी
अपने बच्चों व् परिवार को लेकर ज्यादा सजग है |संभवतः इसका कारण एकल परिवार व् पति
पत्नी दौनों का नौकरीपेशा होना है |लेकिन अपने अगले ही वाक्य में कमला जी कहती हैं
हालाकि इस वर्ग (मध्यवर्ग)की स्त्री बाकयदा मानवता और नैतिकता के आधार पर (दलील दे
) विरोध भी करती है लेकिन उसके विरोध को इस पुरुषवादी समाज में ज्यादा तरजीह नहीं
दी जाती वैसे भी विरोध करने वाली स्त्री तो पढी लिखी , जागरूक और आधुनिक महिला है
लेकिन इसका प्रतिशत अपेक्षाकृत ( औसत रूप से )बहुत कम है इस वर्ग की ज्यादातर
महिलाएं सब कुछ सह जाने में ही अधिक विशवास और सुरक्षा महसूस करती हैं | हमारे
यहाँ लडकी के मन में शुरू से ये भरा जाता है कि उसे दूसरे घर जाना है , वहां सबकी
सेवा करनी हैं ,पति का ख्याल रखना है इन्हें सुसंस्कारों में जोड़ा जाता है लेकिन
उसी घर ले लड़के को क्या ये ‘’संस्कार’’ दिए जाते हैं कि तुम्हे खाना बनाना या घर
का कामकाज सीखना है ताकि अपनी नौकरीपेशा पत्नी
(जो आजकल ८० प्रतिशत ) है उसे सहयोग कर सको ? कमला भसीन जी ने बताया कि आज निम्न
वर्ग की महिलायें अपेक्षाकृत अधिक साहसी महिलायें हैं |वो पति से पिटती भी हैं तो
चीख चिल्लाकर उसका विरोध भी करती हैं और सार्वजानिक रूप से उसे गालियाँ देने का
माद्दा भी रखती हैं | लेकिन मध्यवर्ग की स्त्री घरेलू हिंसा को चुपचाप सहती है , ‘’गिर
गयी थी ‘’ कहकर चोटों को छिपाती हैं |एक तो उस पर ‘समाज क्या कहेगा’’ का संकोच और
दुसरे ‘’कहीं निकाल दिया तो कहाँ जायेगी “ की फ़िक्र | वो कहती हैं कि मैं अपने घर
की पहली पीढी हूँ जब घर से बाहर नौकरी के
लिए निकली लेकिन उस वक़्त मेरे घर में जो बाई काम कर रही थी उसकी दादी परदादी भी
आत्म निर्भर थी घरों में काम करती थी | संघर्ष सभी वर्गों की महिलायें करती हैं
लेकिन उन संघर्षों व् पीडाओं को सहती अलग अलग तरीके से हैं | अंत में उन्होंने
अपनी ही लिखी एक कविता के कुछ अंश पढ़े जिनका अर्थ कुछ ये था ‘’आज की लडकियां सूरज
की तरह चमकती हैं , लहरों की तरह लहराती हैं, फूलों की तरह खिलती हैं क्यूँ कि
उन्हें इन सबमे आनंद आता है ...उन्हें खिलने दो...बहने दो...चमकने दो....|
कल NDTV पर कुछ जानी मानी सामाजिक कार्यकर्ताओं की बातचीत
सुनी ..अच्छी लगी |इसमें सुप्रसिद्ध समाजशास्त्री कमला भसीन भी थीं उनके कुछ विचार
यहाँ संक्षिप्त में ..
पुरुष सत्तात्मकता
का दोष सिर्फ पुरुष के ऊपर मढना गलत है क्यूँ कि इस विचार व् धारणा में स्त्री भी बराबर
की भागीदार है वो इस तरह कि वो स्वयं उसे सहर्ष स्वीकार रही है | वो पति के लिए
व्रत उपवास/ पूजा पाठ करती है | घर/ ऑफिस दौनों मोर्चो को स्वयं संभालती है |बच्चों
के स्कूल में फीस भरने या पेरेंट्स टीचर मीटिंग में खुद जाती है अर्थात घर बाहर की
तमाम जिम्मेदारियां वो स्वयं अकेले उठाना अपना कर्तव्य समझती है | कमला भसीन जी की
इस दलील से कुछ अंश तक सहमत हुआ जा सकता है क्यूँ कि पहले की अपेक्षा आज की पीढी
अपने बच्चों व् परिवार को लेकर ज्यादा सजग है |संभवतः इसका कारण एकल परिवार व् पति
पत्नी दौनों का नौकरीपेशा होना है |लेकिन अपने अगले ही वाक्य में कमला जी कहती हैं
हालाकि इस वर्ग (मध्यवर्ग)की स्त्री बाकयदा मानवता और नैतिकता के आधार पर (दलील दे
) विरोध भी करती है लेकिन उसके विरोध को इस पुरुषवादी समाज में ज्यादा तरजीह नहीं
दी जाती वैसे भी विरोध करने वाली स्त्री तो पढी लिखी , जागरूक और आधुनिक महिला है
लेकिन इसका प्रतिशत अपेक्षाकृत ( औसत रूप से )बहुत कम है इस वर्ग की ज्यादातर
महिलाएं सब कुछ सह जाने में ही अधिक विशवास और सुरक्षा महसूस करती हैं | हमारे
यहाँ लडकी के मन में शुरू से ये भरा जाता है कि उसे दूसरे घर जाना है , वहां सबकी
सेवा करनी हैं ,पति का ख्याल रखना है इन्हें सुसंस्कारों में जोड़ा जाता है लेकिन
उसी घर ले लड़के को क्या ये ‘’संस्कार’’ दिए जाते हैं कि तुम्हे खाना बनाना या घर
का कामकाज सीखना है ताकि अपनी नौकरीपेशा पत्नी
(जो आजकल ८० प्रतिशत ) है उसे सहयोग कर सको ? कमला भसीन जी ने बताया कि आज निम्न
वर्ग की महिलायें अपेक्षाकृत अधिक साहसी महिलायें हैं |वो पति से पिटती भी हैं तो
चीख चिल्लाकर उसका विरोध भी करती हैं और सार्वजानिक रूप से उसे गालियाँ देने का
माद्दा भी रखती हैं | लेकिन मध्यवर्ग की स्त्री घरेलू हिंसा को चुपचाप सहती है , ‘’गिर
गयी थी ‘’ कहकर चोटों को छिपाती हैं |एक तो उस पर ‘समाज क्या कहेगा’’ का संकोच और
दुसरे ‘’कहीं निकाल दिया तो कहाँ जायेगी “ की फ़िक्र | वो कहती हैं कि मैं अपने घर
की पहली पीढी हूँ जब घर से बाहर नौकरी के
लिए निकली लेकिन उस वक़्त मेरे घर में जो बाई काम कर रही थी उसकी दादी परदादी भी
आत्म निर्भर थी घरों में काम करती थी | संघर्ष सभी वर्गों की महिलायें करती हैं
लेकिन उन संघर्षों व् पीडाओं को सहती अलग अलग तरीके से हैं | अंत में उन्होंने
अपनी ही लिखी एक कविता के कुछ अंश पढ़े जिनका अर्थ कुछ ये था ‘’आज की लडकियां सूरज
की तरह चमकती हैं , लहरों की तरह लहराती हैं, फूलों की तरह खिलती हैं क्यूँ कि
उन्हें इन सबमे आनंद आता है ...उन्हें खिलने दो...बहने दो...चमकने दो....|
8 जनवरी 2016
दारियो फ़ो
नए साल की पहली सुबह ...एक खुशमिजाज़, बिंदास ,अजीवोगारीब नोबेल पुरस्कार विजेता को याद करते हुए ..
...दारियो फ़ो
क्या आप यकीन करेंगे कि दुनियां के सबसे महंगे और सम्मानजनक पुरस्कार नोबेल पुरस्कार से एक ऐसे विवादास्पद साहित्यकार (मूलतः नाटककार)को नवाज़ा गया था जो अपनी विवादित रचनाओं के कारन न सिर्फ कई बार पिटा ,अपमानित हुआ बल्कि उसे जेल में बंद कर यातनाएं तक दी गईं थीं लेकिन उसने लिखना नहीं छोड़ा |इटली के महान नाटककार और अभिनेता दारियो फ़ो ने राजनीतिज्ञों,शासकों समस्त बुर्जुआ वर्ग,पादरियों ,पुलिस कर्मियों आदि से सम्बंधित विषयों को अपने व्यंगात्मक,तीखे कटाक्ष और माजाकिये नाटकों का प्रमुख विषय बनाया |वे प्रयोगवादी नाटककार और अभिनेता हैं |फ़ो का समस्त लेखन सर्वहारा शोषित और उत्पीडित तबके के लिए है |उन्हें अपने सबसे चर्चित नाटक ‘’एक्सीडेंटल डेथ ऑफ एन एनार्किस्ट’’ पर नोबेल पुरस्कार दिया गया | इसके अलावा पुरस्कार भाषण में उनके दुसरे नाटक ‘’वी कांट पे ,वी डोंट पे’’को भी सराहा गया |जब उन्हें नोबेल पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना मिली तब वो कार से कहीं जा रहे थे |एक अन्य कार चालक ने उन्हें रोककर ये सूचना दी तो वो हतप्रभ रह गए |उन्होंने हँसते हुए कहा ‘’मुझे तो लगता था कि मैं ही दुनिया को चकित कर सकता हूँ ‘’|उनके नाटकों की खासियत ये थी कि आम जनता को उनके नाटक बेहद प्रिय थे क्यूँ कि वो उन्हीं के लिए लिखे गए थे लेकिन वैटिकन ,राजनीतिज्ञों,पादरियों आदि को वे भड़काऊ और प्रतिबंधित करने लायक लगते थे तभी तो उनके एक नाटक ‘’मिस्तेरो वुफो ‘’को दिखाया गया तो वैटिकन ने इस नाटक को टेलीविज़न पर दिखाए गए कार्यक्रमों में सर्वाधिक ‘’ब्लेस्फीमल’’ कह कर आलोचना की | मजदूरों के लिए लिखे गए एक नाटक के लिए उन्हें टेलीविजन के कार्यक्रमों से निष्काषित कर दिया गया था ये प्रतिबन्ध पंद्रह वर्षों तक रहा |उल्लेखनीय है कि वो अपने लेखन से नौकरशाहों,शोषकों आदि के ही नहीं बल्कि सर्वहारा और पीड़ित वर्ग के दिलों में भी एक हलचल पैदा करना चाहते थे |कहा जाता है कि फ़ो जो हमेशा आतंकवाद के खिलाफ लिखते रहे लेकिन उनके खिलाफ दुष्प्रचार के तहत उन्हें अमेरिका में आतंकवादी कहकर रोक दिया गया था |सुप्रसिद्ध लेखक आलोचक /समीक्षक देवेन्द्र इस्सर कहते हैं ‘’ फ़ो के नाटक इब्सन और बनार्ड शा की याद दिलाते हैं |’’उनकी पत्नी फ्रांका रामे स्वयं एक मांझी हुई अभिनेत्री थीं |उन्होंने फ़ो के कई नाटकों में अभिनय किया और २०१३ में उनका देहांत हो गया |रामे ने अपने पति दारियो फ़ो के साथ मिलकर कुछ नाटक लिखे भी थे जिनमे प्रमुख है ‘’इट इज ऑल बैड एंड बोल्ड ‘’इसमें रामे ने अविस्मरनीय अभिनय भी किया था | उन्होंने स्वयं नारी मुक्ति को विषय बनाकर कई मोनोलॉग लिखे हैं जिन्हें ‘फेमिनिस्ट क्लासिक’’ कहा जाता है |१९७३ में फासीवादियों द्वारा रामे का अपहरण कर लिया गया और खून में लथपथ सडक पर फेंक दिया गया था |इसके बावजूद पति पत्नी ने हार नहीं मानी और वे नाटकों को लिखने व मंचित करने में जुटे रहे |और जब फ़ो को 1997 साहित्य नोबेल पुरस्कार घोषित हुआ तो उन्होंने उसे अपने उन अभिनेताओं को देने की घोषणा की ये कहकर कि ‘’जिन्होंने पैरोडी और व्यंग द्वारा अन्याय के विरुद्ध युद्ध किया जिनमे ये कहने के साहस है कि ‘’सम्राट वस्त्र विहीन है ‘’उन्हें समर्पित ‘’|
...दारियो फ़ो
क्या आप यकीन करेंगे कि दुनियां के सबसे महंगे और सम्मानजनक पुरस्कार नोबेल पुरस्कार से एक ऐसे विवादास्पद साहित्यकार (मूलतः नाटककार)को नवाज़ा गया था जो अपनी विवादित रचनाओं के कारन न सिर्फ कई बार पिटा ,अपमानित हुआ बल्कि उसे जेल में बंद कर यातनाएं तक दी गईं थीं लेकिन उसने लिखना नहीं छोड़ा |इटली के महान नाटककार और अभिनेता दारियो फ़ो ने राजनीतिज्ञों,शासकों समस्त बुर्जुआ वर्ग,पादरियों ,पुलिस कर्मियों आदि से सम्बंधित विषयों को अपने व्यंगात्मक,तीखे कटाक्ष और माजाकिये नाटकों का प्रमुख विषय बनाया |वे प्रयोगवादी नाटककार और अभिनेता हैं |फ़ो का समस्त लेखन सर्वहारा शोषित और उत्पीडित तबके के लिए है |उन्हें अपने सबसे चर्चित नाटक ‘’एक्सीडेंटल डेथ ऑफ एन एनार्किस्ट’’ पर नोबेल पुरस्कार दिया गया | इसके अलावा पुरस्कार भाषण में उनके दुसरे नाटक ‘’वी कांट पे ,वी डोंट पे’’को भी सराहा गया |जब उन्हें नोबेल पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना मिली तब वो कार से कहीं जा रहे थे |एक अन्य कार चालक ने उन्हें रोककर ये सूचना दी तो वो हतप्रभ रह गए |उन्होंने हँसते हुए कहा ‘’मुझे तो लगता था कि मैं ही दुनिया को चकित कर सकता हूँ ‘’|उनके नाटकों की खासियत ये थी कि आम जनता को उनके नाटक बेहद प्रिय थे क्यूँ कि वो उन्हीं के लिए लिखे गए थे लेकिन वैटिकन ,राजनीतिज्ञों,पादरियों आदि को वे भड़काऊ और प्रतिबंधित करने लायक लगते थे तभी तो उनके एक नाटक ‘’मिस्तेरो वुफो ‘’को दिखाया गया तो वैटिकन ने इस नाटक को टेलीविज़न पर दिखाए गए कार्यक्रमों में सर्वाधिक ‘’ब्लेस्फीमल’’ कह कर आलोचना की | मजदूरों के लिए लिखे गए एक नाटक के लिए उन्हें टेलीविजन के कार्यक्रमों से निष्काषित कर दिया गया था ये प्रतिबन्ध पंद्रह वर्षों तक रहा |उल्लेखनीय है कि वो अपने लेखन से नौकरशाहों,शोषकों आदि के ही नहीं बल्कि सर्वहारा और पीड़ित वर्ग के दिलों में भी एक हलचल पैदा करना चाहते थे |कहा जाता है कि फ़ो जो हमेशा आतंकवाद के खिलाफ लिखते रहे लेकिन उनके खिलाफ दुष्प्रचार के तहत उन्हें अमेरिका में आतंकवादी कहकर रोक दिया गया था |सुप्रसिद्ध लेखक आलोचक /समीक्षक देवेन्द्र इस्सर कहते हैं ‘’ फ़ो के नाटक इब्सन और बनार्ड शा की याद दिलाते हैं |’’उनकी पत्नी फ्रांका रामे स्वयं एक मांझी हुई अभिनेत्री थीं |उन्होंने फ़ो के कई नाटकों में अभिनय किया और २०१३ में उनका देहांत हो गया |रामे ने अपने पति दारियो फ़ो के साथ मिलकर कुछ नाटक लिखे भी थे जिनमे प्रमुख है ‘’इट इज ऑल बैड एंड बोल्ड ‘’इसमें रामे ने अविस्मरनीय अभिनय भी किया था | उन्होंने स्वयं नारी मुक्ति को विषय बनाकर कई मोनोलॉग लिखे हैं जिन्हें ‘फेमिनिस्ट क्लासिक’’ कहा जाता है |१९७३ में फासीवादियों द्वारा रामे का अपहरण कर लिया गया और खून में लथपथ सडक पर फेंक दिया गया था |इसके बावजूद पति पत्नी ने हार नहीं मानी और वे नाटकों को लिखने व मंचित करने में जुटे रहे |और जब फ़ो को 1997 साहित्य नोबेल पुरस्कार घोषित हुआ तो उन्होंने उसे अपने उन अभिनेताओं को देने की घोषणा की ये कहकर कि ‘’जिन्होंने पैरोडी और व्यंग द्वारा अन्याय के विरुद्ध युद्ध किया जिनमे ये कहने के साहस है कि ‘’सम्राट वस्त्र विहीन है ‘’उन्हें समर्पित ‘’|
अजीबोगरीब नोबेल मुर्स्कार विजेता ..दारियो फ़ो
दरियों ,पुलिस कर्मियों आदि से सम्बंधित विषयों को अपने व्यंगात्मक,तीखे कटाक्ष और माजाकिये नाटकों का प्रमुख विषय बनाया |वे प्रयोगवादी नाटककार और अभिनेता हैं |फ़ो का समस्त लेखन सर्वहारा शोषित और उत्पीडित तबके के लिए है |उन्हें अपने सबसे चर्चित नाटक ‘’एक्सीडेंटल डेथ ऑफ एन एनार्किस्ट’’ पर नोबेल पुरस्कार दिया गया | इसके अलावा पुरस्कार भाषण में उनके दुसरे नाटक ‘’वी कांट पे ,वी डोंट पे’’को भी सराहा गया |जब उन्हें नोबेल पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना मिली तब वो कार से कहीं जा रहे थे |एक अन्य कार चालक ने उन्हें रोककर ये सूचना दी तो वो हतप्रभ रह गए |उन्होंने हँसते हुए कहा ‘’मुझे तो लगता था कि मैं ही दुनिया को चकित कर सकता हूँ ‘’|उनके नाटकों की खासियत ये थी कि आम जनता को उनके नाटक बेहद प्रिय थे क्यूँ कि वो उन्हीं के लिए लिखे गए थे लेकिन वैटिकन ,राजनीतिज्ञों,पादरियों आदि को वे भड़काऊ और प्रतिबंधित करने लायक लगते थे तभी तो उनके एक नाटक ‘’मिस्तेरो वुफो ‘’को दिखाया गया तो वैटिकन ने इस नाटक को टेलीविज़न पर दिखाए गए कार्यक्रमों में सर्वाधिक ‘’ब्लेस्फीमल’’ कह कर आलोचना की | मजदूरों के लिए लिखे गए एक नाटक के लिए उन्हें टेलीविजन के कार्यक्रमों से निष्काषित कर दिया गया था ये प्रतिबन्ध पंद्रह वर्षों तक रहा |उल्लेखनीय है कि वो अपने लेखन से नौकरशाहों,शोषकों आदि के ही नहीं बल्कि सर्वहारा और पीड़ित वर्ग के दिलों में भी एक हलचल पैदा करना चाहते थे |कहा जाता है कि फ़ो जो हमेशा आतंकवाद के खिलाफ लिखते रहे लेकिन उनके खिलाफ दुष्प्रचार के तहत उन्हें अमेरिका में आतंकवादी कहकर रोक दिया गया था |सुप्रसिद्ध लेखक आलोचक /समीक्षक देवेन्द्र इस्सर कहते हैं ‘’ फ़ो के नाटक इब्सन और बनार्ड शा की याद दिलाते हैं |’’उनकी पत्नी फ्रांका रामे स्वयं एक मांझी हुई अभिनेत्री थीं |उन्होंने फ़ो के कई नाटकों में अभिनय किया और २०१३ में उनका देहांत हो गया |रामे ने अपने पति दारियो फ़ो के साथ मिलकर कुछ नाटक लिखे भी थे जिनमे प्रमुख है ‘’इट इज ऑल बैड एंड बोल्ड ‘’इसमें रामे ने अविस्मरनीय अभिनय भी किया था | उन्होंने स्वयं नारी मुक्ति को विषय बनाकर कई मोनोलॉग लिखे हैं जिन्हें ‘फेमिनिस्ट क्लासिक’’ कहा जाता है |१९७३ में फासीवादियों द्वारा रामे का अपहरण कर लिया गया और खून में लथपथ सडक पर फेंक दिया गया था |इसके बावजूद पति पत्नी ने हार नहीं मानी और वे नाटकों को लिखने व मंचित करने में जुटे रहे |और जब फ़ो को 1997 साहित्य नोबेल पुरस्कार घोषित हुआ तो उन्होंने उसे अपने उन अभिनेताओं को देने की घोषणा की ये कहकर कि ‘’जिन्होंने पैरोडी और व्यंग द्वारा अन्याय के विरुद्ध युद्ध किया जिनमे ये कहने के साहस है कि ‘’सम्राट वस्त्र विहीन है ‘’उन्हें समर्पित ‘’|
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