27 जनवरी 2011

भीड़



देखा..
मजदूर को  
तेज रफ़्तार के नीचे-
दम तोड़ते तडपते,
बहते खून के अगल - बगल से
बचते बचाते 
निकल गई भीड़ .
देखा....
पीड़ित लडकी पर लांछनों  की 
बौछार करते आरोपी को 
कनखियों से सोखती ख़बरों को,
अन्याय पी गई भीड़ !
देखा,भूख के सीने पे  
 आत्महत्या  करते 
किसान और उसके- 
बिलखते परिवार को ,
अपने २ काम पे 
निकल गई भीड़ !
देखा ,
बेटी की चिता पर इज्ज़त दारों को,
शान से मूंछें मरोड़ते 
लाश को घेरे ,
मूक दर्शक  बन  गई भीड़ 
देखा सफेद पोशों को 
भूख के कन्धों पर चढ़ 
मुट्ठियाँ तानते भुखमरी के खिलाफ 
नारे लगते,.... 
जुलुस बन गई भीड़  
देखा.....
‘’देह’’का उसकी
तमाशा बनते
अलग अलग चेनलो पर
अलग अलग एंगल से
तमाशबीन   बन  गई भीड़ 
 और इस तरह समाज/देश  के प्रति 
अपनी अपनी जिम्मेदारियां निभा 
रात को ,रिश्तों से लिपट   
गहरी नींद में 
सो गई भीड़ 

23 जनवरी 2011

रंगों का पटाक्षेप


तिलस्मी धुंध  की  उस
अँधेरी  कैद  से ,
मुक्ति का ज़श्न मनातीं
स्पंदित संभावनाएं
नमूदार होती  हैं अचानक  
अनजाने  लोक में ! 
चमक उठता है एक और-
अबूझा  संसार ,रोशनी का !  
ज्यूँ उगता है बीज,
धरती की छाती फोडके,
 खूबसूरत बाग ,या सूखे जंगल में ,
क्या फर्क पड़ता है,?
लेकिन नहीं  
पड़ता है फर्क ,.क्यूंकि  
 इसी ‘फर्क’ की धरती पर
उगाए जायेंगे अवसर,
की जायेगी षड्यंत्रों की खेती !
षड्यंत्र जो हथियार बनेंगे,
उन हाथों के ,
जिन्हें आते हैं  गुर  खारिज करने के  ,
मानवीयता,सच और ईमानदार को,
मासूमियत से.!.. ,
तपता रहेगा  सूरज 
पिघलती रहेंगी संभावनाएं !  
सवेरे के स्वप्न से
 सांझ कि उदासी  तक 
एक मुट्ठी धुप ,  ,
 आकार लेती, धरती 
धीरे धीरे ...और   
 पेड़,फूल,पत्ते,झाड,
दीवारें,किले ,हवेलियाँ,खंडहर,और वो 
पांच सितारा होटल ,
जहाँ मुंह छिपाने लगती है 
धुप भी आकर, .क्यूंकि,.
 उसी के   एन सामने
झक्क सफ़ेद इमारतों  की
  झिलमिलाहट में  ,
कीचड के स्याह मनहूस धब्बों सी,या  ,  
सुन्दर - सलोनी देह पर  
ज़ख्म  सी मनहूस  झुग्गियां
जो अँधेरे में उजाले के स्याह  भ्रम,को
पोसती जीती/मरती  रहीं हैं,
सदियों से,पीढ़ियों तक!  
 ,जिन्हें खुद रोशन होना नहीं आया कभी ‘
पर बनती रहीं ‘उनकी’ उजालों की वजहें,  
बल्कि सीखा ही नहीं है उन्होंने रोशन होना
या शायद चाहा ही  नहीं
बस अंधेरों को सोख ,
बिखेरती रहीं उजाले
अब तो पीढियां  हो गईं हैं अभ्यस्त,
,देह को दीपक बना,
पसीने से रोशन करने में,
उनके अँधेरे!  ..
,याद नहीं किस सदी से
अलग हुईं लकीरें
शायद तबसे जबसे ,रंग इतने,
 रंग बिरंगे नहीं हुआ करते थे !
सिर्फ दो ही रंग थे शब्दों की आँखों  में,
काला  या सफ़ेद! ...  
रटा दिया गया था जिन्हें ,
पहाड़ों की तरह,
झूठ की पाठशालाओं में!और ,
रोप दिया गया था  बीज सा
, रक्त के साथ शिराओं में!
बह रहा है वही रक्त खौलता-सा,     
परंपरा से - नसीब तक...!
संस्कार से - जाती तक.....!
सच से - अत्याचार  तक.....!
न्याय से - चीत्कार  तक......!
भूख से - मौत तक.......!
छटपटाते से
आज  भी घूम रहे हैं ,वो छद्म  
धैर्य  के ओरबिट में
शायद करवट बदलने को है युग,
या/शायद होने को हैं ,
 रंगों का पटाक्षेप  

19 जनवरी 2011

विद्रोह का ज़श्न

शब्द आजकल
खोने लगे हैं अर्थ अपने   
,मची है अफरा – तफरी
मंतव्यों और विचारों की दुनियां में
अभिव्यक्ति की आज़ादी,
लोकतंत्र  की आड़ में
लहराने लगी है मुट्ठियाँ!
खेमों में तब्दील हो गए हैं यकायक ,
तमाम विचार /संवाद/आक्रोश!
संवादहीन ये सत्तर फी सदी जनता,
आभिजात्य दांव पेचों  से अनभिग्य,
ढूँढ रही है खाली झोलों में,
अपने बच्चों का भरपेट भविष्य!    
वही धरती,जो सोना उगलती रही
 विदेशों तक
और धरती-सुत करते रहे आत्महत्याएं ,
माँ की सूनी छाती पे लोटकर       
आकाश में मदमस्त डोलती  पतंगों कि
पेट भर आलोचना करते ये
ज़मीन से जुड़े कुछ,    
जुझारू –जागरूक पढ़े लिखे लोग ,
रंगते रहे पन्ने किसानों की मौत के,
खाते हुए बर्गर पीजा !
लहराती पतंगों ने
हवाओं का रुख भांप  ,
,फूल बरसाए
किसानो की लाश पर!
और इस तरह एक सभ्य-रीत को निभा
उड़ चलीं भिन्न भिन्न आकृति की पतंगें
और ऊपर आसमान के ,बलखाती हुई,
देखने ,कि बाढ़ की तबाही में 
बिलखते ,बेघरबार परिवार
कैसे  दीखते हैं ‘’ऊपर ‘’से !!
काले चश्मों का पर्दा डाले  
फिकवाते रहे रोटी के पैकेट
लपकते रहे नंगे भूखे बच्चे
कैच करते रहे कैमरे ,
‘’सहानुभूति’’के मर्म- स्पर्शी द्रश्य
 आंख पर पट्टी बांधे वो कुशल राजनेता
करते रहे अगुआई एक राष्ट्र प्रमुख की!
दो घटनाएँ एक साथ जीती रहीं खुद को
एक ही समय में ,अलग अलग मंच पर
एक परिणिति,हत्यारी भूख की ,
और  ,दूसरी,
भव्य कॉमन वेल्थ की शानदार
शान  शौकत और रंगीनियों की..
क्यूँ न हो  ,आखिर 
पूरा विश्व देख रहा है रौनक
देश के विकास और सम्रद्धि की ! 
बेबस,दीन हीन
ज़मीन पे खड़े लोग देखते रहे  
ज़मीन से जुड़े लोगों को
‘खड़े और ‘जुड़े’’होने के फर्क के साथ  
आस भरी नज़रों से!
सुलगते रहे न जाने कितने समुद्र
चमकती बिजलियों  कि आग  में  
ज़मीन से जुड़े लोग
 देते रहे धरने करते रहे आन्दोलन
‘वो’ ‘चीखते करते रहे गुहारें,
‘’लुटेरों से बचाने की  ,
कभी’महगाई डायन की माला जपते ’’
कभी ‘’खेलों के पीछे के सच को
नंगा करने की नाकाम कोशिश करते 
या,किसान की ताजा बेवा हुई औरत को
ट्रक पे अपने पति की लाश के साथ
शहादत का दर्ज़ा दिलाने ,
,चमकते कैमरे  ,गवाह बनते  
एक लाचार मौत के
मौत ,जिसका प्रसारण होना बाकि है  
मुद्दों की उपजाऊ धरती  पर
और जिन्हें एन्जॉय करेंगे दर्शक
डिनर की टेबल पर चिकन खाते
बतियाते,खिलखिलाते,
हो सकता है बोर होकर
राखी सावंत का नाच लगा लें !
टूटने लगी निराश/डूबती  सांस
सिमटती - सिकुड़ती  आंत
अखबार -चेनल रंगे रहे /मनाते
  जश्न सा...
अबोधों की बर्बादी का 
,अकूत खजानों  के वो गुलाबी चेहरे
उड़ाते   रहे मजाक
चिथड़ों का!
ज़मीन से जुड़े लोग  
भींचते रहे दांत,
 लहराती हुई मुट्ठियों के साथ 
एयर कंडीशंड कारों के 'रथ'में  ,
पैदल ,भूखी ,नंगी जनता
घिसटती  रही धोखों को ढोते
नारों की पीठ पे !
सदियों से चल रहा  ये खेल
बस बदले हैं तो
वाहनों  के मॉडल और
अंदर के चेहरे, पर
चीखने की तर्ज़ पर
मिमियाती जनता  
आज भी ,घिसटती हुई,  पीछे पीछे   
 कुछ थक चुकी ज़र्ज़र 
कडकडाती हड्डियां और
बिलबिलाते भूखे अशक्त
ज़मीन पे बिछे लोग
रोटी के साथ
इंतज़ार   रहे हैं
अगली मौत का  !
मौत, जिसे आदत सी हो गई है
सुर्ख़ियों में रहने की ...

11 जनवरी 2011

अभिव्यक्ति की आजादी


वर्जनाओं,परम्पराओं ,रिवाजों के
ज़र्ज़र ,दीमक खाए  बाड़ों को
 रौंदता /खारिज करता, अपने ताज़ा विचारों
सोच और तकनीक के
तमाम ताम झाम के साथ
मौलिकता के दंभ से उत्प्रेरिक,
नया युग चलता है हमेशा ही
पिछले युग से,कई कदम आगे
रीतता –सा कुछ ,बीतता व्यतीत
समाता जाता है  अंधेरी सुरंग में जहाँ
पहले से ही दफ़न  हैं सदियाँ ,
तहों में छिपे से, हर परत के बीच-बीच ,
कई चेहरे ,कई नारे, कई उपदेश
हजारों दावे,सैंकडों किंवदंतियाँ,
,चेहरे ,जिनके नाम भी थे कभी,
और जो थे ,समय कि स्याही से लिखे
सहूलियत के रजिस्टर में दर्ज  
अब सिर्फ चेहरे हैं यहाँ बेजान और
नाम ज़िंदा हैं पाठ्यपुस्तकों के पन्नों में
एक विचार,  जो करेगा तुलनात्मक विवेचन
चूल्हे और कुकिंग गैस का,
बैलों और ट्रेक्टर का,
इंसान और आदमी का
नैतिकता और तकनीक का
यथार्थ और ‘ज़रूरत’’का
हर बीता सच  ,करता है  तय हद्दें
भविष्य की नैतिकता की,और
हर प्रगतिशील युग तोडता है सीमाएं
अपने इतिहास की !
कहीं यही मौलिकता तो
‘’अभिव्यक्ति कि आज़ादी ‘’नहीं ?

1 जनवरी 2011

सर्द-पौष की सुबह



ओस की बूँद,जो टपकी  हैं,अभी ही 
नाज़ुक पंखुड़ी  के  माथे पर,
 सिहर गयी  है  शाख तक
उस  कोमल अहसास से!
अंगडाई ले, उठी  है कलियाँ!
मुस्काती गीली अलकों से,
बूँद खिलखिलाती हुई  
ढुलकती है कोपल पर!
गोद में पत्तों की,छिपती 
खेलती,दुलराती हवा,
हलकी सी गुदगुदाती तपन  
करतीं हैं चुहल मोती से!
मोती,जो बिखर जायेंगे,
खुशबुओं-से , तितली बन ! 
इंतज़ार करेंगी कलियाँ,
उस भीगते अहसास का , 
मुस्कुराते हुए फिर से,
 कल सुबह होने तक ....

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नए वर्ष की शुभकामनायें          
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29 दिसंबर 2010

19 दिसंबर ''रसरंग''भास्कर में प्रकाशित कहानी - विरक्ति

अंधकार का धनधोर सन्नाटा ।वह अविचलित,अनिश्चित  सा चला जा रहा था,अगंतव्य की ओर ।.ब्लैक-आउट.....बाहर भी,और मस्तिष्क के भीतर भी।हवा की सांय.सांय ,जंगल के मुहाने पर और तीव्र और तीखी होने लगी थी । भव्य ड्राइंगरुम के सरसराते एयरकंडीशनरों में स्थित गर्वोन्मत इंसान के खोल को फैंक वह चुपचाप बगैर किसी पूर्वनियोजित कार्यक्रम के निकल पडा था,नितांत अपरिचित और अभूतपूर्व यात्रा की ओर ।सांसारिक झंझटों से पलायन की विकट इच्छा..इतनी घनीभूत हो चुकी थी कि देह की मौन चीख भी उसे विचलित करने में नाकाम हो रही थी ।पर नादान मनुष्य....देह से विद्रोह?...भला कब तक?सांसों की घौंकनी मुंह को आ चली थी ।पैर लडखडा रहे थे....अब वह जंगल के दायरे में दाखिल हो चुका था ।एक घने पेड़ का सहारा ले वह टिककर खडा हो गया ।पानी की मोटी बूंदों ने जंगली वातावरण  की भयावहता में इजाफा कर दिया था ।पशु पक्षी भी अपने अपने ठिकानों की ओर लौटने लगे थे,।ऐसे धटाटोप अंधेरे में एकाध भटकते जुगनू की कमजोर सी रोशनी उसे सहारा दे रही थी  ।उसने चारों ओर नजर धुमाई....सिवाय अंघकार के कुछ भी नहीं था! ।देह ठंड और भय से सिहरने लगी थी ।उसने आंखें बंद कर लीं ।दौनों हाथ छाती से लपेटे वह उकडूं हो तने से सटकर वहीं बैठ गया ,और धुटनों में मुह छिपा लिया ।अचानक एक कर्कश और डरावनी आवाज पूरे जंगल में गूंज उठी ।प्रतिक्रिया में कई घ्वनियां अंधरे में तैरने लगीं ।संभवतः वह किसी पक्षी का कातर स्वर था,जो साथियों से कुछ गुहार कर रहा था ।वह भय से और सिमट गया ।उसने गर्दन उठाकर उपर देखा,करीब पचास फर्लांग पर उसे रोशनी का एक टुकडा तैरता सा दिखाई पडा।...अप्रत्याशित.... ।मिचमिचाती आंखों को उसने और फैलाया....धूरकर देखा...वह रोशनी ही थी ।एक बार तो वह भय से कांप गया ।फिर घीरे घीरे उठा,'किसी' की उपस्थिति का सुखद अंदेशा .....तिनके का सहारा... ।।रोशनी से उपजी संभावनाओं को समेटे वह रोशनी की दिशा में बढ चला ।....लडखडाते कदम....धिसटती देह.... ।चुनौती और विश्वास की विखंडितता थी वह रोशनी,अथवा अस्तित्व को बनाए रखने की शर्त या जरुरत?...किंकर्तव्यविमूढ... ।पैर यंत्रवत उजास के उस नन्हें से टुकडे की ओर बढने लगे,जिसके अचानक और रहस्यमयी प्राकटय से अभी अभी वह सिहर गया था ।निकट जाकर उसके पैर उसी  शून्यता में ठिठक गए ।उजास का स्त्रोत वह लालटेन थी,जो एक पेड के मोटे तने पर झूल रही थी ।पेड के तने को धास फूस और कबेलू से ढंककर एक वारांडे की  शक्ल दे दी गई थी ।जिसके नीचे एक अलाव जल रहा था,और उस अलाव के निकट ही एक बूढा आदमी टूटी सी कुर्सी पर उकडूं बैठा था ।निर्विध्न,निर्विकार।वह बूढे की पीठ थी,अतः उसने बूढे का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के उद्देश्य से धीरे से पुकारा''महोदय मैं यात्री हूं ।धने अंधकार में रास्ता भटक गया हूं ।क्या आप मेरी मदद करेंगे?........गहन चुप्पी.....'श्रीमान,क्या आप मुझे सुन रहे हैं?मै.....''भीतर आ जाओ.....बूढे ने बगैर उसे देखे  कहा ।वह अंदर आ गया ।भीग गए हो ।भीतर जाकर देह पौंछ लो....ठंड खा जाओगे नहीं तो ।बूढे ने उसी अनुत्तेजित भाव से कहा ।बरांडे में से ही एक छोटा सा दरवाजा था,जो एक झोंपडी नुमा छोटे से कमरे में खुलता था ।कमरा छोटा मगर व्यवस्थित था । कोने में एक मेज ,जिस पर एक पत्थर के उपर एक अंगीठी रखी थी ।बाकी कमरे में कुछेक कपडों और रोजमर्रा के सामान के अतिरिक्त पुस्तकें ही पुस्तकें ।

जमीन पर बिछे बिस्तर पर एक किताब अधखुली और उल्टी रखी थी ।''एक बात सुनो बरखुरदार....अचानक बूढे की कमजोर सी आवाज से वह चौंककर पलटा....''उधर रस्सी पर मेरा गमछा पडा है,कपया उसका इस्तेमाल ना करें......क्या फर्क पडता है?पर...बस मुझे ये पसंद नहीं ।''बेफिक्र रहें.....नहीं करूँगा।‘’अनमना सा ज़वाब !तर बतर ना सही पर बदन में फुरफुरी पैदा करने लायक गीले कपडों को बदलने का कोई  इंतजाम तो था नहीं,अलबत्ता सिवाय अलाव के अन्य कोई उपाय नहीं था उसके पास ।वह चुपचाप आकर अलाव के पास बिछे एक पत्थर पर बैठ गया ।


''तो भागकर आये हो धर से''....बूढे ने उंगली में फंसी अधजली सिगरेट को जमीन पर धिसकर बुझाते हुए कहा ।
 ''जी नहीं....प्रश्न अप्रत्याशित था ।अतः वह थेाडा झिझकते हुए बोला ।''राह भटक गया था ,रात और खराब मौसम के कारण....!

 बूढा मुस्कुराया बोला '' निश्चिंत रहो तुम्हे मुझसे डरने या कुछ छिपाने की जरुरत नहीं ।मुझे तुमसे कुछ लेना देना नहीं ।...मैं भी संसार को छोडकर ही आया हूं यहां,सारे आडंबरों और विडंबनाओं का परित्याग करके ।फर्क सिर्फ इतना है,कि तुम संसार से भागकर आये हो यहां और मैं बाकायदा सब कुछ छोडकर आया  हूं मोह पाश के व्यर्थ बंधनों से मुक्त होकर । 

.....कुछ देर बूढा शून्य में ताकता रहा ,फिर बोला...''तुम्हे नींद आ रही होगी ।सो लो .!वो उस कमरे में जो जमीन पर बिछा है,उसे बिस्तर मान सकते हो!मै देर से सोता हूँ!’’और फिर विचारलीन हो गया ।वह बूढे कहे अनुसार कमरे में चला गया ।सचमुच कब नींद ने उसे आगोश में ले लिया ,पता ही नहीं चला ।सुबह सोकर उठा तो तरोताजा था बिलकुल!

 .''इतनी गहरी और सुकून भरी नींद.?.अदभुत..... ।उसे याद ही नहीं कि कब वह इतनी गाढी नींद सोया था,।अंधेरा हमे अपने स्व से साक्षात्कार कराता है, पर उजाला होते ही हमारा संपूर्ण व्यक्तिपरक अनुभव और महसूसियत उजाले के साथ पूरे वातावरण में बिखर जाती है ।हर रोशन वस्तु के साथ चिपक कर उससे ऐसे धुलमिल जाती है,मानो हम स्वयं के साथ कभी थे ही नहीं ।वह अनमना सा मिचमिचाती आंखेां के साथ बाहर बरामदे में आ गया ।वातावरण की रंगत ही बदल चुकी थी।आसमान बरसाती नमी समेट चुका था,और सूर्य भगवान ने अपनी महीन किरनों के जाल से समूची धरती को आच्छादित कर दिया था ।अलाव की गर्माहट अलबत्ता अभी बाकी थी ।''लो ये नीम की दतौन है,कर लो तब तक मैं चाय खौला कर लाता हूं ।''कहकर बूढा वापिस कमरे में चला गया!''वह चुपचाप अलाव के नजदीक पडे पत्थर पर बैठ गया  ।उसे सम्पूर्ण ब्रम्हांड ही बदला हुआ लग रहा था ।''लो मित्र चाय पियो''...बूढे के हाथ में चाय के दो प्याले थे ।रात की उदासी और किंचित क्षुब्धता अब विलीन हो चुकी थी,और अब वो तरोताजा लग रहा था ।सामने पडे बैंचनुमा पत्थर पर बैठते हुए बूढा बोला''तुम्हारे मन में संभवतः ये प्रश्न उठ रहा होगा,कि अकर्मण्यता के बावजूद जीविकोपार्जन का जुगाड किस प्रकार हो पाता है?...वो सामने देख रहे हो सौ.पचास धर उन्हीं के परोपकार का नतीजा है  । ...वो किंचित व्यंग में मुस्कुराया ।...ये संसार बडा विचित्र है बंधु.. ।धरवालों को लगता था,कि मेरे उपस्थित रहते जायदाद उन्हें प्राप्त नहीं हो पायेगी,अतः वे मेरे पलायन के इच्छुक थेो ।वहीं दूसरी ओर ये गांववाले मुझ जैसे असहाय बुजुर्गेा की सेवा सुश्रूषा कर अपना परलोक सुघारना चाहते हैं ।...दौंनों के अपने अपने स्वार्थ है।...अंतर मात्र इतना था,कि वो मेरी अनुपस्थिति से अपना लोक सुघारना चाहते थे,और ये लोग मेरी उपस्थिति से अपना परलोक ।....अच्छा बरखुरदार..अब तुम आराम करो मैं अभी आता हॅं...कुछ  भेोजन का भी इंतजाम करना है....बूढा जंगल की ओर चला गया  ।वह किंकर्तव्यविमूढ सा बैठा रहा ।आत्मग्लानि का अंगारा भीतर कहीं सुलग उठा । देह की उपस्थिति को नजरअंदाज कर मन कुलांचे मारता हुआ धर पहुंच गया... ।पत्नी नियति की स्म्रति उभरने लगी दश्य पटल पर ।क्या दोष था उस बेचारी का?क्या यही कि नियति भी आम स्त्रियों की भांति एक भरा पूरा धर सुख और समद्धि चाहती थी?अभी अभी तो पदोन्नति हुई थी उसकी?

......कितनी प्रसन्न थी नियति?...उसके सपनों का पति.? मन और उसके भीतर खैालते उबलते नितांत व्यर्थ और अनचाहे विचारों को कैसे देह से अलग करुं? वह उत्तेजित हो गया ।''अभी तो बेटे ने जवानी में कदम ही रखा था,कितना चाहता है वो मुझे....पर अब,जबकि मेरे पास उस भ्रष्टाचार से पूर्णतः लिप्त ऑफिस  में जहां पहली  शर्त थी अपने स्वाभिमान और वुजूद को दर किनार रखकर  बाकायदा बौस के उन चमचों को स्वयं को कुचलने का हक दिया जाये...जिनकी हैसियत निकट खडे होने देने तक की नहीं है,.बस  अपने आप को कीडा बना देना और कुचलते चले जाना बर्दाश्त नहीं हुआ मुझसे । जब भी अपनी  शर्तों पर जीने की जिद मन ने की,कोई ना कोई विवशता आंकर दयनीय स्त्री की भांति सामने रस्ता रोककर प्रकट हो गई ,और हर बार उसे ही रास्ता बदल देना पडा! ।कार्यालय ने कहा''प्रेक्टीकल बनो,ईमानदारी और चापलूसी का आवरण ओढे धाध और बेईमान बनो तभी यहां सर्वाइव कर सकते हो तब विवेक ने कहा''नहीं ये गलत है.....अन्याय है...धोखा है,तब सर्व सुविधा जीवी उसके परिवार ने नसीहत दी''क्या बुराई है,थोडी बहुत बेईमानी और भ्रष्ट बनने में?तुम्हे क्या लगता है, तुम्हारे ईमानदार बनने से समाज बदल जाएगा?सब कुछ ढर्रे पर आ जाएगा?।तो तुम निरे मूरख और सिरफिरे ही हो ।''

प्रायश्चित से उसका बदन सिहरने और कांपने सा लगा ।अचानक उसे लगने लगा कि वह ठीक उसी तरह भावशून्य और देहवश में होता जा रहा है जैसे धर से भागने का निर्णय लेते वक्त हुआ था ।अब मस्तिष्क की कमान शरीर ने संभाल ली थी....वह उठा..नितांत चेतना शून्य सा. घर की और जाने के लिए!

कुछ दूर ही चला था,कि सामने से बूढा हाथ में कुछ सूखी हुई लकडियों का गटठर लिये आता दिखाई दिया ।उसने बगैर किसी कौतुहूल के युवक की ओर देखा' निर्भाव बोला ;;'मोह पाश का अंघा मनुष्य जीवन पर्यन्त अपने क्रत्यों और उसूलों के बीच झूलता सही और गलत का निर्णय ही नहीं ले पाता ।खैर...तुम भी तो उसी दुनियां के हिस्से ही  ।पर अनुरोघ ही मान लो इसे मेरा कि जंगल से निकलते तुम्हें रात हो जायेगी ।बस अडडा भी दूर है वहां से,अतः रात्रि विश्राम कर के सुबह चले जाना ।''जी नहीं महोदय....अपराध बोध से मैं दबा जा रहा हू ।अतिशीध्र वापस धर पहुचना चाहता हू।''और वह चल पडा ।ठीक है ।अभी तपन बाकी है...और प्रारब्ध भी । बूढा बुदबुदाया....पीछे मुडते हुए बोला...अलविदा मित्र ।और ठौर की ओर चल दिया ।

 मौसम लुभावना था ।चांदनी प्रक्रति के साथ किलोल कर रही थी!कुछ क्षण बूढा प्रक्रति के उस अनुपम सौंदर्य को अपलक निहारता रहा,।''आले में रखी बीडी को बंडल में से निकाला और सुलगाकर उंगली में फंसा लिया ।तन भी किस कदर दोगला होता है..''हदद है कमीनेपन की.....जिन मनुष्यों से भागकर यहां आया था,अब उन्हीं के ना होने का अहसास और कमी आज क्यूँ  खल रही है?युवक का चेहरा न चाहकर भी दिपदिपाने  लगा ।वह विचलित हो उठा!पत्नी सत्यवती का मुरझाया चेहरा बूढ़े कि आँखों में कौंधने लगा!।कितनी रोई थी जब उसने ग्रहत्यागने का निर्णय था ?पत्नी के  दुःख का जिम्मेदार और कोई नहीं वो स्वयं है ! क्या कसूर था उस बेचारी का?..क्या हालत की होगी  संबंधियों की  शक्ल में उन आतिताइयों ने?.....भावावेश में उसकी देह पीपल के पत्ते की तरह कांपने लगी बेऔलाद,बेसहारा वो औरत जिसे उसके परिवार ने उसे सौंपा था ।...क्या और किसने उसे अधिकार दिया इस अन्याय का?.एक कंपकंपाहट सी होने लगी देह में!..

.....रात गहरा गई थी.....आसमान साफ और निर्मल था ।...युवक ,लौट रहा था,निश्चिन्तता  और संकल्प के साथ वापस जंगल की और  ।झोंपडी के बरामदे में खडा हो वह बोला...''लो बरखुरदार मैं आ गया...आपके जाने के बाद मुझे अहसास हुआ कि वाकई में मैं मोहजाल में फंस गया था ।...सचमुच धना अंधकार है ।..दोबारा  फिर उसी जंजाल में जाकर मैं सचमुच बहुत नादानी कर रहा था ।अब मै वापस आ गया हूं  ।इस स्वार्गिक आनंद का अवसर देने और आँखें  खोलने के लिये धन्यवाद... ।काफी देर तक भीतर से कोई आहट न पाकर युवक कमरे में गया ।कमरा खाली और अव्यवस्थित था ।वहां कोई नहीं था ।

बूढा जा चुका था । 

23 दिसंबर 2010

वंशवृक्ष


पिता
लिखा करते थे, अक्सर
न जाने क्या?
झुके–झुके ,
झुकने से पहले भी
लिखा करते थे बकायदा
मेज़ –कुर्सी पर रौब से तनकर !
आँखों में गर्व का समंदर लहराता था उनके
लिखते वक़्त!, दमकती पेशानी ...!
पर उम्र और उपियोगिता के हिसाब से
लिखने के ठिकाने और साधन सिकुड़ते रहे
देह के सिकुड़ने के एवज में !
और फिर....
फेंके जाने की मंशा लिए ,या इसी तरह की
तमाम अनुपियोगी वस्तुओं की भीड़ के बीच
उस सीलन भरी धुंधली सी कोठरी में
खुद को समेट वो 
चले आये अपने एकमात्र रहनुमा 
उस टूटे बक्से समेत 
जिस पर लगी जंग का इतिहास
करीब-करीब उनकी झुर्रियों की उम्र का
रहा होगा ...
बक्से की दरारें भी कांपती
लिखते हाथ के साथ साथ !
भोजन, द्रष्टि, उर्जा, श्रवण सब ऊबने लगे 
सिवाय लिखने के !
झुकी पीठ किये बैठे रहते वो उलाहनों व्
कटु वचनों से! वही पीठ
जिस से चढ़कर उनके वंशज ,कंधे पे बैठ
उनसे ऊँचे होने की होड किया करते थे
और पिता , हमेशा ही हारते रहे  
उन्हें जिताने को ! !
खींचते रहे वो शाखाएं वंश वृक्ष की
वटवृक्ष हो जाने तक ..
हर ज़न्मने  वाला पुरुष अपनी शाख लेकर उगता
जाते जाते लिखते गए
‘’वंश वृक्ष को आगे बढ़ाने की बात !
वंश वृक्ष के उन पीले,उदास 
सिकुड़े पन्नों को बटोर तो लाइ हूँ
गेर-ज़रूरी सामान की पोटली में से
रख भी दिए हैं संभालकर
पिता के चित्र के निकट ,
बस यही पूछना चाहती हूँ पिता से की  
अनब्याही बेटी की शाख कहाँ होती है ?