10 मई 2011

वक़्त


                एक ‘वक़्त’ रहा करता था वहां
इतिहास-सा | ठहरे पन के साथ
चंद सन्नाटों से घिरा
उम्र कि सिलवटों से बेपरवाह
मुझे पसंद आया इस तरह रहना उसका
अब मेरी रिहाइश है वो
नीम का पेड़ भी रहता है यहीं
उम्र के चिन्हों से अज्ञात
आधुनिकता के शोर से
वक़्त के बहरे होने के पहले तक
किस्से बहा  करते थे, नदियों  में जंगल  के यहाँ
अब सिर्फ हवाएं रहती हैं
पेड़ जंगल हुआ
नदी आँखों में भरे
पेड़ देखा करता हरियाली के ख्वाब
बांटने लगा वो मुझसे मौसम अपने
और मै अपना अकेलापन
अब हम दोस्त थे
हमारी मौन बतियाहट के अंतिम हिस्से में
विदा कहने के पहले फुसफुसाता है पेड़ कान में मेरे
कि ‘’अभी जिंदा हो तुम’’|
और आश्वस्त हो फिर भीड़ हो जाती मै
वक़्त खोजता रहता है अब भी
अशक्त ,हताश –सा
उस एकांत को,
जो लिए जाती हूँ मै अपने साथ |
                                        

8 मई 2011

भीड़


                            
आदमी को अकेलापन नहीं सुहाया
फिर उसने भीड़ बनाई
और फिर कुछ  उसूल जैसे,
शामिल होते ही भुला दिया जाना खुद का चेहरा
न सिर्फ चेहरा बल्कि अपनी आवाज़,अपनी भाषा,
अपने मौन,अपने ‘होने’के अर्थ सब कुछ
मुस्कुराना उन जगहों पर जहा टीसने कि खुरदुराहट हो
होश वहां खोना,जहा विवेक की सर्वाधिक अपेक्षा हो,
भाषा के वो लहजे ,जो परिष्कृति सोचते ही छद्म करार दिए जाते हों
विवशताओं में  नैतिकता के मूल्य तलाशने का हुनर और
"भीड़’’ और ‘’भेड़’’ के गूढ़ अंतर्संबंध को मान्यता,
कृत्रिमता को मौलिकता कहने का साहस
इस विडम्बना को खारिज कर, हे मनुष्य-
ज़न्म से म्रत्यु तक भीड़ का हिस्सा होने से अलग
कुछ खोज सको तो खोजो 

1 मई 2011

इच्छा



बेटा चार साल का था, तब मैं
अच्छी खासी नौकरी में था |
घर चल जाता था पर
तीन पहिये की सायकिल अफ्फोर्ड 
नहीं कर पाया, कुछ महगी थी |
वो दस साल का हुआ तो
बड़ी साइकिल की ज़रूरत बताई उसने |
स्कुल सब बच्चे जाते थे सायकिल से
पर उस वक़्त पत्नी के ऑपरेशन में बचत
खत्म हो गई, वो बोला कोई बात नहीं 
बस से चला जाऊंगा |
फिर कॉलेज में महगाई ने
बढ़ी हुई तनखाह को
पीछे धकेल दिया और  
बाईक नहीं ले पाया, बेटे ने कहा
रहने दीजिए पापा चला जाऊंगा
मेट्रो से और वो चला जाता था |
मै खुश, कि बेटा कितना समझदार है
समझता है घर की परिस्थिति और
आदर्शवादिता के मायने | बेटे की
शादी हो गई, दहेज में मिली कार में
बैठकर, पत्नी से बोला
अच्छा हुआ जो तुम मिल गईं नहीं तो
ये इच्छा भी मन में ही रह जाती |

24 अप्रैल 2011

यथार्थ ...


                        छिपाकर रात से , चंद टुकड़े सुबह के                       
रख छोड़े थे मन के उस अज्ञात कोने में ,
सुलगते सूरज की तपिश में ,
ओढ़ लिया जायेगा जिन्हें  छांह बना जीवन की |
जैसे सुखा दिया करती थीं माँ हरी सब्जियां ,
बेमौसम की खुशी  , थाली में सजाने को  |
रात से निचोड़ चांदनी के कुछ  बिम्ब 
भींच लिए थे हथेली में ,उलीचने को देह पर
जैसे ,काली दीवार पर सूर्योदय का चित्र  |
जैसे, थकान  भरे सप्ताह के बाद 
 किसी शीतल झरने के मौन-गीत में भीगते ,
एकांत के सुर | और सिगरेट के नरम छल्लों से
खेलता आसमान |
हाँ मगर इससे पहले ,
किसी पुराने संग्रहालय में
विचरते नए अंधेरों को, डराते रहे जो
 इतिहास में देह बन ......
 सुला दिया था रात की कोठरी में उन्हें 
बंद कर दिए थे द्वार हमेशा के लिए |    
खुल गई  है कोई आंख किसी रंध की शायद
कि भरी रौशनी में ,
झिरने लगी है अँधेरे की वो पतली सी किरण ,
उस खिडकी से ,जो खुलती हैं नरम रूह तक मेरी |
बूँद बूँद टपकती है रात

17 अप्रैल 2011

देवदासी




स्याह वक़्त की दरारों  से फूटती नीली रौशनी   
जो देह नहीं थी.....या शायद
देह के अलावा और कुछ भी नहीं |
पत्थरों में सांस फूंकते खुद पत्थर हो जाना पेशा था जिनका |
पौराणिक छद्मों को, मौजूदा लम्हों के जंगल में दफनाते चले जाना
परंपरागत जुनून का एक तयशुदा हिस्सा था |
लिहाज़ा डूबना होता था उन्हें ,जिस्मों की उन अतल गहराइयों तक
जहा मौन को चीखने की इजाजत नहीं थी |
चेहरे विहीन देह और उसमे डूबती उतराती
संवेदन- शून्य उस भाषा को.... इतिहास के पन्नों में
दर्ज करानी होती थीअपनी मौन उपस्थिति |
हर अदा ,जो अश्रु के गर्भ में पली 
सौंदर्य की गवाही देनी थीभविष्य को उसके |
इतिहास ने निचोडकर कुछ पत्थर
उगा दिए थे हरियाली के बीज   
मौजूदा आँखों की नमी  के लिए !
हवाएं भटकती हैं अब भी थापों के किस्से
लादे सर पर, खोज़ती फिरती हैं ध्वनियों के द्वार
सारंगी का एकांत रुदन
तैरता है रंग महल में अब भी खोजता सा
खनकती पायलों के बिम्ब |
वो भित्ति-चित्र, जिनमे थरथराती हैं,
सिसकियाँ, रात की धीमी लौ में |
जिंदा थी घुंघरुओं की झंकार
वो साजो श्रृंगार, जिनके अह्सांसों में     
वो उन्हें आँखों में भरे, सो गए हैं |
लंबी नीद .....  
यौवन को झरते देखा है उनने   
समय की हथेली पर |
उस देव ने भी जिनके कारन लहू लुहान हुआ
दासित्व उनका | 

9 अप्रैल 2011

वो


वो करीब करीब भाग रही थी !
पति के हकों और खुद की विवशताओं  को
पल्लू में बाँध, कमर में खोंसे !
सदा की तरह ....!
अंगों की खरोंचों को छिपाती ! 
घाव, जो उगे हैं कल ही
पुराने सूखने से पहले!
पोर पोर दरद से दहकता
पर जाना ही है उसे काम पर! पता है कि ‘’मेम साब’’
भला बुरा कहेगी देर से आने पर!
आज झाड़ू फटका नहीं करेगी कह देगी मेम साब से कि  ,
बिटवा को ताप है!दवा के पैसे चाहिए ! 
पर, जानती है वो 
इसे बहाना मानते हुए, धमकाया जायेगा
भूखों मरने की बद्दुआ दी जायेगी
पर इसमें नया क्या,तो डरना भी क्या?
खा लेगी वो डाट भी,
बेटे की तपती देह के लिए !
आज एक तारीख  है ,वो भी तो आयेगा भाड़ा लेने खोली का !
फिर जिरह करेगा, गंदी गलियां बकेगा !
पूरी स्त्री जाती को कलंकित करती  !
.दूर से दिख रहे हैं कुछ लोग झंडे लिए, हाथ लहराते हवा में
नारों से फटा जा रहा आसमा, जैसे उसका दिल
बेटे के ताप को रूह तक भिगोता  !
नारे आ  रहे थे करीब और करीब ,जोशीले ,भडकते
उसने देखी, नारों के पीछे दुबकी सी सुनहले भविष्य की रौशनी  
जो शायद नारेबाजों की सुलगती आँखों से फूट रही थी !
वो ठहर गई, भीड़ और उखड़ी सांसों  को रास्ता दे !
सड़क गुजर रही थी उसकी अगल बगल से और,
वो खड़ी थी भीड़ में  घिरी  अकेली ..
उसने पूछा ....साब,कब खत्म होगी ये भीड़?
जब तक जगेगी नहीं सरकार ....
सरकार कब जगेगी?
जब क्रांति आयेगी .......
उससे क्या होगा ?
 भ्रष्टाचार मिटेगा !....
ये  भ्रष्टाचार क्या होता है?
जिसके लिए हम वेद्रोह कर रहे हैं .....
विद्रोह क्या होता है ?
जिससे सरकार की नींद उडती है!
नींद तो बिटवा को भी नहीं आई दो रोज से!
तुझे बेटे कि पडी है ,यहाँ देश अनशन कर रहा है चार दिनों से
रोटी तो हमने  भी नहीं खाई साब,  कई दिनों से.......
देश करवट ले रहा  है नहीं जानती क्या?
अच्छा?उसकी ऑंखें चमक उठीं
तब से सो रहा था पता ही नहीं चला ?
तो क्या अब भरपेट खाना मिलेगा हमें ?
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सरकार ईमानदार हो जायेगी?
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ये भीड़ छंट जायेगी?
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मरद को रुजगार मिल जायेगा?
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बिटवा के स्कुल कि फीस ?
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मै काम पर चली जाउंगी?
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बेटे को दवा मिल जायेगी?
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वो बडबडा रही थी खुशी में बौराई!
देश न जाने कबका
आगे निकल चुका  था !
वो वहीं खड़ी थी सड़क के बीचों बीच ! ......!

5 अप्रैल 2011

उलझन



बेटे से निराश रहती हूँ ..
उसके हमउम्र
दुकानों पर मोल भाव करते हैं
एकाध साल में ‘’घर’’ भी आ जाते हैं
महगाई का रोना रोकर भी
महगाई की कद्र करना जानते हैं ,
रिश्वत देकर काम निकालना और
कहाँ कैसा व्यवहार करना
खूब समझते हैं
और मेरा बेटा !
जिसकी नौकरी छूटने के कगार पर है
आ जाता है चाहे जब कहता है
तुम मेरे लिए नौकरी से ज्यादा ज़रूरी हो
ऐसा होता है क्या(होना चाहिए?)
 कि बचपन में जो शिक्षा दें
उतार ली जाय  जीवन में ज्यूँ की  त्यूं
अपने हर दुःख तकलीफ, मेरी न हो जाये इसलिए
छिपाता रहता है मुझसे, हँसते हुए
नहीं जानता कि मै उसकी माँ हूँ
मेरे  जिस्म का हिस्सा है वो,पर  
मै भी छिपाती रहती हूँ उससे
उसके दुःख ,उसकी तकलीफें 

हम दोनों हँसते हैं खूब
चुटकुलों पर,नकलों पर ,फिल्मों पर
पर भीतर सुलगता  रहता है कुछ
भविष्य सा.