3 मार्च 2013

साहित्य में जीवन की धड़कन होनी चाहिए


‘’हिन्दी साहित्य की पहली चुनौती है पढ़ना ‘’...किसी ने सही कहा है |गूढार्थ यही कि आज हिन्दी लेखकों में लिखने और उनके ‘’पढ़े जाने ‘’ की जो आतुरता है वो उनके द्वारा अन्य को पढ़े जाने की नहीं ...लिहाजा आज पाठकों से अधिक लेखक ,और उनसे भी ज्यादा अवसर (पुरूस्कार, फेसबुक,विभिन्न आयोजन इत्यादि )उपलब्ध हैं |
(आपके कहेनुसार)''कुछ साहित्यकार भ्रष्टाचार (?) में डूबे नहीं हैं क्यूँ की उन्हें अमर होने की चिंता या हडबडी नहीं है ...(पर कुछ )मठाधीशों की पूंछ पकड़कर साहित्य के भवसागर को पार करने का उपक्रम कर रहे हैं ,राजधानी की हष्ट पुष्ट पत्रिकाएं व् सामर्थ्यवान संपादकों की ‘’फेक्ट्री’’....वगेरह ...विचारणीय होने के बावजूद ये त्रासदी चिंतनीय नहीं कही जा सकती |इस मनोवृत्ति का सम्बन्ध कालगत भी है ..कुछ प्रश्न-
क्या दशकों पूर्व पैदा हुए और साहित्य जगत के उत्कृष्टतम रचनाकारों यथा प्रेमचंद,टेगोर,महादेवी वर्मा,अज्ञेय ,रेणु,शरत चंद ,जयशंकर प्रसाद आदि के काल में तथाकथित जिज्ञासु ,योग्यता से अधिक महत्वा कांक्षी और प्रसिद्धिप्रिय रचनाकार नहीं हुए होंगे ?साहित्य जगत के नक़्शे में कहाँ हैं अब वो?
बावजूद इस सत्य के कि तकनीकी सुविधाएं और बाजारवादी मनोवृत्ति ने पूरे समाज को एक बाज़ार में तब्दील कर दिया है ,लिहाजा कम समय में जल्दी और अधिकाधिक प्राप्त करने की लालसा दोगुनी हो गई है लेकिन एक सत्य ये भी तो है कि इन ‘’महत्वाकांक्षी’’ लेखक /लेखिकाओं में कालांतर में कितनों को प्रेमचंद या महादेवी वर्मा जैसे शताब्दियों तक याद रखा जाएगा?
 दरअसल वास्तविक लेखक चर्चा में आने के लिए किसी के कन्धों पर चढ़कर प्रसिद्धि पाने पर यकीन नहीं करता ये ज़रुरत तो उन लोगों को पड़ती है जिन्हें अपने काबीलियत पर भरोसा नहीं लेकिन प्रसिद्धि की चकाचौंध में रहना चाहते हैं ’’अमर ‘’बने रहने की चाहत एक बचकानी सोच और कोशिश है वस्तुतः साहित्य में जो ‘’अमरता’’ की पदवी पा चुके हैं उन्होंने इस अमरता के लिए कभी कोशिश नहीं की थी |
वास्तविक लेखक किसी भी स्थिति में लेखन करता है इतना ही नहीं उसके लेखन को वैश्विक रूप से उत्क्रश्तता की कोटि में स्वीकृत और सराहा जाता है |उद्देश्यपूर्ण और उत्कृष्ट लेखन किसी भी ‘’जोड़ तोड़ ‘’ की नीतियों का मोहताज़ नहीं होता |गौर तलब है कि लैटिन अमेरिकी देश कोलंबिया में ज़न्मे महान लेखक गेब्रियल गार्सिया मार्खेज़ का विश्व प्रसिद्द उपन्यास ‘’वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सौलीच्युड’’जो  १९६७ में लिखा गया तब उस पर किसी का ध्यान नहीं गया |बाद में इसी उपन्यास को नोबेल पुरूस्कार से नवाज़ा गया | मार्खेज़ जो पत्रकार भी थे ,उन्हें वामपंथी विचारों के कारण अमेरिका और कोलंबिया की सरकारों ने अपने देश में आने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था |ऐसी विपरीत और विकट परिस्थितियों में लेखन करने वाले तमाम लेखक हैं |इतिहास गवाह है कि किसी भी देशी विदेशी कालजयी लेखक का लेखन इस उद्देश्य की पूर्ती (मकसद)नहीं रहा कि उसे लोग सदियों तक जाने ...बल्कि उनका लेखन जीवन के किसी गंभीर दर्शन अथवा किन्ही सामाजिक राजनैतिक त्रासदियों को उजागर करना था | इमरे कर्तेज़ के उपन्यास .’’कैदिश फॉर अ चाइल्ड नौट बौर्न ) में नायक उस अजन्मे बच्चे का पिता बनने से इनकार कर देता है जिसे पैदा होने के बाद नाजियों के अत्याचारों को झेलना पड़े | मानव जीवन की वास्तविकता का ऐसा वर्णन और ये विषय शायद ही किसी पश्चिमी लेखक ने उठाया हो जिसकी तुलना बुद्ध से की जाती है |यदि आपके दुसरे पक्ष पर विचार किया जाये (लेखकीय महत्वाकांक्षाओं और उनकी जोड़ तोड़ की )तो कर्तेज़ का ही उदाहरण फिर देना होगा |उलेखनीय है की विश्व प्रसिद्द उनके उपन्यास ‘’फेटलैस ‘’१९६५ में लिख दिए जाने के बावजूद छपने के लिए उन्हें १० वर्ष का इंतज़ार करना पडा |नोबेल पुरूस्कार विजेता विश्वावा जिम बोर्सका जिन्होंने कहा था ‘’ज़िंदगी राजनीति से अलग होकर नहीं रह सकती फिर भी मै अपनी कविताओं में राजनीति से दूर रहती हूँ ‘’उनकी आरंभिक रचनाएँ पूंजीवादी सभ्यता की विरोधी और मजदूरों के समर्थन की रही हैं |जहाँ तक आलोचना का प्रशन है विश्व का कोई साहित्यकार ऐसा नहीं रहा जिसकी आलोचना न हुई हो |तोलस्ताय को ‘’बहुत नसीहतें देने वाला लेखक ‘’कहा गया तो विश्व प्रसिद्ध लेखक ,नाटककार आयर लेंड के सेम्युअल बेकेट के विश्व प्रसिद्द नाटक ‘’वेटिंग फॉर गोदोत’’के दो नायकों को आलोचकों ने फ़िज़ूल या आवारा कहा जबकि बेकेट के अनुसार वे दौनों उस अनजान ‘’गोदोत’’ की प्रतीक्षा कर रहे हैं जिसके बारे में उन्हें कुछ भी नहीं मालूम ...मूल में यही कि मनुष्य किस प्रकार एक उद्देश्यहीन तरीके से जीवन की यात्रा कर रहा है’’|ऐसे तमाम उदाहरण हैं |
टॉलस्टॉय ने अंतिम दिनों में गोर्की से कहा था ‘’इतना लिखा गया मगर कुछ नहीं हुआ दुनियां पहले की अपेक्षा खराब ही हुई है ....फिर भी ....’’
शोर्ट कट अथवा सांख्य के उद्देश्य से लिखे साहित्य को सफल नहीं कहा जा सकता कुछ समय बाद उसका धूमिल हो जाना निश्चित है..इसके साक्षात उदाहरण आज सामने हैं हमारे ...|
लेखन एक गंभीर और धैर्यशील कर्म है यह कालातीत है |आधुनिक फेंटेसी के जनक फ्रांत्स काफ्का की विख्यात कहानी ‘’मेटामार्फोसिस’’हिटलर के गेस्टापो युग से बहुत पहले लिखी गई थी जिसे आज भी अद्वितीय की श्रेणी में रखा जाता है |इन्हीं के उपन्यास ‘’द कासल’’एक आम आदमी के आत्म संघर्ष की लाज़वाब दास्ताँ ...|साहित्य केवल वर्तमान नहीं है बल्कि अतीत से होते हुए भविष्य तक के द्वार खोलता है ये धैर्य कहाँ है आजके ‘’त्वरित प्राप्त आकांक्षी ‘’ लेखकों में ?
आज लेखक दो प्रकार के हैं एक वो जिन्हें अपनी स्वीकृति का भय हमेशा बना रहता है अतः वो साहित्य  जगत में अपनी उपस्थिति निरंतर किसी ना किसी माध्यम से दर्ज करते (करवाते)रहते हैं| दुसरे किस्म के लेखक अपने लेखन पर तो विशवास करते हैं ,लेकिन ‘’उपस्थिति’’दर्ज करने में संकोच और एक आत्मसंघर्ष से जूझते रहते हैं ...एक स्वयं की प्रतिभा का दिग्दर्शन कर पाने का संघर्ष और दुसरे साहित्य की समकालीन दिखावटी मनोवृत्ति के लेखकों से पिछड़ जाने का भय|’’हिन्दी साहित्य के एक विख्यात लेखक का कहना है ‘’लेखक होने के नाते किसी विशेष सुविधा की मांग नहीं करता ......शायद बोल्ड नहीं हूँ अगर होता तो लिखने की बजाय कुछ और कर रहा होता ‘’
आज साहित्यकार ‘’हार जाने के डर’’से ग्रसित है ,और उसके द्वारा की गई ये तमाम चेष्टाएँ इसी डर का एक नकारात्मक नतीज़ा हैं ...खारिज कर दिए जाने का डर ...|प्रसिद्द साहित्यकार बद्रीनारायण कहते हैं ‘’आज कवी तो बहुत हैं ,लेकिन अच्छा कवी बना रहना एक आत्म संघर्ष है |’’प्रवासी भारतीय साहित्यकार नायपाल कहते हैं कि वे भारतीय अन्धकार से बाहर आकर ही सभ्य हुए हैं |’’कहीं उनकी ‘’असभ्यता’’ का तात्पर्य समकालीन हिन्दुस्तानी साहित्य की इन्हीं मनोवृत्तियों की और इंगित तो नहीं करता ?..क्या वजह है कि वैश्वीकरण के फैलाव और आधुनिकतम संसाधनों के बढ़ने ,सभ्यता और शिक्षा के विकसित होने के बावजूद नवीनता और विचारगत रूप से हम वैसा साहित्य नहीं रच पा रहे हैं जिसकी अपेक्षा की जाती है जहां तक विचारधारा का प्रश्न है विचारधारा ,जीवन द्रष्टि और अनुभवों का विकल्प कभी नहीं हो सकती बावजूद इस सत्य के प्रत्यक्षतः अथवा परोक्ष रूप से हर रचना के मूल में कोई न कोई विचारधारा तो होगी ये हमारे ऊपर है कि ‘’अंधों के हाथी की तर्ज़ पर हम उस लेखक विशेष अथवा रचना विशेष को किस भी विचारधारा से जोड़ दें !लेखकों व् लेखन के संदर्भ में एक और विचारणीय तथ्य यह है जैसा कि सुप्रसिद्ध कवियत्री कात्यायनी कहती हैं कि नवें दशक में और उसके बाद कवियों की एक नई पीढी उभरी जो बहुत संभावनाशील थी लेकिन उसके बाद क्रमशः उनकी रचनाओं में एकरसता ,दुहराव,चौंक चमत्कार,नकली विद्रोही तेवर आदि समाविष्ट हो गए |उनका तात्पर्य शायद अलग अलग विचारधारों और खेमों में बट जाने का लोभ संवरण न कर पाना भी संभावित है |
समय परिवर्तन शील है....इसी के मद्दे नज़र सोच भी सकारात्मक होनी चाहिए |
किसी भी वास्तविक लेखक /कलाकार के लिए साहित्यिक अमरता के बरक्स दैहिक म्रत्यु एक ऐसी घटना है जो अपने अधूरेपन को सम्पूर्ण आस्था और विशवास के साथ नई पीढी के उस सम्पूर्ण बौद्धिक जगत के हवाले करके जाती है जो इसकी वास्तविक उत्तराधिकारी है ...पूछना सिर्फ ये हैं हमें स्वयं से कि क्या हम उन कालजयी लेखकों की इस विरासत का सचमुच और वास्तविक उपियोग कर पा रहे हैं ?

24 फ़रवरी 2013


समुद्र ,अपने समुद्र होने से पहले
रहा होगा एक बहुत विशाल खाई
अँधेरा उकता कर बन गया होगा एक समुद्र
किसी अनजान नदी के साथ
बह आई होंगी कुछ मछलियाँ
मछलियों को देख आ गए होंगे
कुछ मगरमच्छ ,बड़ी मछलियाँ और
बड़े बड़े जलपोत जहाज़
माल असबाब व मनुष्यों को भरे
अक्सर आती है सपने में वो खाई
समुद्र के ....

15 जनवरी 2013

प्रेम

प्रेम को नहीं चाहिए 
अपने होने के बीच 
कोई कविता ,शब्द 
 रंग , गीत या द्रश्य
 मौन प्रतीक्षा की
 प्रेम एक अद्रश्य ज़रूरत है
 एक नीली पारदर्शी नदी 
बहती रहती है जो चुपचाप 
कोमल विरलता में
आत्मा से आत्मा तक

14 दिसंबर 2012

धोबीघाट

घर के
पिछवाड़े एक नदी है छोटी,उथली सी  
जिसके पाट पर बिछी हैं तमाम पटिया
रोज तडके आतीं हैं आवाजें वहाँ से
कुछ सपनों के पछीटे जाने की
और कुछ गैर सपने
जो बंधे रखे होते हैं गठरियों में अभी 
रंग बिरंगे गुमडे हुए ,
किन्ही में महक बसी कुछ कमसिन जिस्मों की
और कुछ गाढ़े पसीने से लिथड़े हुए
कुछ पर सिलवटें हैं प्यार की  
अब तक
सबको डुबो दिया है उसने बेदर्दी से
नदी की धारा में
और निचोड़ दिया है उन्हें  
उन जंगली घांसों के चेहरे पर  
बेवजह बेज़रूरत उग आई हैं जो
पटियों के बीच उनके इर्द गिर्द
ज़रूरी था ये दुनिया में
कुछ ताज़ी उम्मीदें बची रहने लिए  
पसीनों से लथपथ अपनी देह और
गंधाते कपड़ों में उन्हें अक्सर
आने लगती हैं सहसा गठरियों की गंध
 ,वो और ज़ोर से पछीटने लगते हैं
अपनी साँसें ,
जैसे बहा देंगे आज ही वो अपने सपनों की पूरी नदी    
और अपनी इच्छाओं को निचोड़ डाल देंगे सूखने किसी
उम्मीद की डोरी पर फिर से

14 नवंबर 2012

औरत और प्रथ्वी


प्रथ्वी के गोल होने के साक्ष्य  
और भी बहुतेरे  हैं
जुगराफिया सबूतों के अलावा  
 बाइबल के सत्य (?)और
गेलीलियो /कोपर्निकस के विवादों  
और वैचारिक टकराहटों से परे भी 
असत्य सत्य पर शास्वत सत्य के वुजूद से इतर
अतीत के धुंधले अंधेरों में
कुछ प्रश्न-चिन्ह आज भी खड़े हैं  
सलीबों की मानिंद 
ठुकी हुई हैं कीलें  
हर काल की हथेली पर
अपने तमाम ज्ञानों, आदर्शों ,और
उपलब्धियों को झोली में भरे
औरत
प्रथ्वी के चक्र के साथ  
अंततः  
 उसी बिंदु पर आकर मिलती हैं
दुनिया की सबसे पहली औरत से
शिकायत करती है हर युग की  
 विकास और आधुनिकता के
हज़ारों दम्भों के बावजूद  
जो अंतत छलता रहा है
उसके वुजूद को  ही
पूछती हैं वो उससे
 फिर 
क्यूँ दुनियां के नक़्शे में
छाई हुई है औरत ही
और ,
क्यूँ वैश्विक कलाएं ,साहित्य ,त्रासदियाँ
घूम फिरकर
 टिका लेते हैं सिर औरत के कंधे पर ही  ?


10 नवंबर 2012


‘’आलोचना करने का अधिकार प्राप्त करने के लिए ज़रूरी है कि आदमी स्वयं किसी निश्चित सत्य में विश्वास करे ‘’...गोर्की
पिछले दिनों वी एस नायपाल प्रकरण अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि गिरीश कारनाड ने एक और विवादास्पद टिप्पणी कर दी गुरुवर रवीन्द्र नाथ टैगोर को ‘’दोयम दर्जे का नाटककार ‘’कहकर |ख़बरों से लेकर फेसबुक तक पर खलबली कि ये कैसे हो सकता है |कुछ पाठकों ने सहमते हुए गिरीश जी की बात को ओथेंटिक मानने की हिम्मत दिखाई लेकिन ‘’आस्थावानों ‘’ने बकायदा उन्हें (बगैर किसी पुख्ता दलील के )हडका दिया |आइये अब इस प्रकरण पर भी बात की जाये |गुरुवार रवीन्द्रनाथ टैगोर निस्संदेह एक बहुआयामी और अद्भुत व्यक्तित्व के धनी रहे एक ऐसा व्यक्तित्व जो ना सिर्फ बहुत श्रेष्ठ कवि बल्कि उपन्यास कार ,वक्ता,नाटककार,समालोचक,दार्शनिक,लेखक,व अध्यापक रहा |एक ही व्यक्ति में इतनी प्रतिभा सचमुच अद्भुत व अतुलनीय |गुरुदेव को सन १९१३ में विश्व का सर्वश्रेष्ठ पुरूस्कार नोबेल पुरूस्कार से नवाजा गया  उल्लेखनीय है कि बाद में २००१ में साहित्य का नोबेल पुरूस्कार तथाकथित भारतीय मूल के वी एस नायपाल को मिला |निस्संदेह इन दो विभूतियों के प्रति भारत कृतकृत्य हुआ |नोबेल पुरूस्कार प्राप्ति के वक़्त जो पंक्तियाँ पुरूस्कार भाषण में कही गईं वो थीं ‘’टैगोर की काव्य रचना की आभ्यांतरिक गहराई और उच्च उद्देश्य ऐसे हैं तथा प्राच्य विचारों को इन्होने पाश्चात्य वर्णन शैली में ऐसी सुंदरता और नवीनता के साथ व्यक्त किया है कि वे वास्तव में पुरूस्कार पाने के अधिकारी हैं ‘’| संभवतः किसी भी कवि के लिए उसकी श्रेष्ठता तथा उत्कृष्टता का इससे बड़ा प्रमाण नहीं हो सकता |’’नोबेल पुरूस्कार उन्हें ‘’बंगाल की गीता ‘’ कही जाने वाली पुस्तक गीतांजलि पर ही मिला जिसकी अनेक विदेशी भाषाओँ में अनुवाद हुए |इसके अतिरिक्त उनकी अंग्रेज़ी कहानियों का संग्रह लन्दन के एक प्रकाशक ने निकाला |(मैकमिलन ‘से भी उनके कुछ उपन्यास ,कहानियाँ और नाटक प्रकाशित हुए )|गौर तलब है कि बहुमुखी प्रतिभा संपन्न इस विद्वान की ख्याति विदेशों तक उनकी कविताओं के कारन अधिक हुई |तुलनात्मक द्रष्टि से उन्होंने नाटक कम लिखे |उनके नाटकों में मुख्य हैं ‘नलिनी’,’मायर खेल’,मानसी,’राजा ओ रानी’,चित्रांगदा आदि |इसके अतिरिक्त उन्होंने बुद्ध पर आधारित एक नाटक नातीर पूजा (न्रात्यान्गना की पूजा ) भी लिखा था |
कोई भी साहित्य या कला अपने समय से अलग होकर नहीं जी सकती |अर्थात उसमे तात्कालीन समाज राजनीती,दर्शन आदि का समावेश एक बहुत सामान्य और सहज घटना है लेकिन ये कतई आवश्यक नहीं कि उसी रचना को पचास साठ वर्ष भी उतना ही सराहा जाये !जुबैदा,कानन कौशल सुरैया जैसी सिने अभिनेत्रियों की फ़िल्में उस वक़्त हाउस फुल रहती थीं क्या आज उनसे ये अपेक्षा की जा सकती है?या नाटक को ही देखें तो १९४७ के आसपास लिखे और खेले गए नाटकों की उस समय धूम रहती थी |आगा हश्र कश्मीरी,से लेकर स्वर्गीय कर्नल गुप्ते तक या एक के हंगल, उत्पल दत्त,भीष्म साहनी ,प्रथ्वी राज कपूर,सोहराब मोदी जैसे समर्पित लेखक/कलाकारों जिनमे से कुछ इप्टा के फाउन्दर्स में भी गिने जाते हैं के द्वारा लिखे या खेले गए तत्कालीन नाटक जो उस वक़्त काफी पसंद किये गए थे बल्कि कुछ पर बेहद लोकप्रिय होने के मद्दे नज़र ‘’देशद्रोही ‘’होने का दोष लगा प्रतिबंधित भी कर दिया गया था ...लेकिन आज हम आज़ाद हिन्दुस्तान में सांस ले रहे हैं स्थितियां बदल चुकी हैं समस्याओं,विकास,आधुनिकता,विचारधारों ,राजनीति,सामाजिक व्यवस्थाएं सभी के रूप और अर्थ बदल चुके हैं जो कालगत परिवर्तन के मद्दे नज़र स्वाभाविक है |तकनीक,कथ्य ,शिल्प,मंच सब का स्वरुप बदल चुका है |जहाँ तक टैगोर के नाटकों का प्रश्न है उनके नाटक स्त्री करुना,यानी दुखांत हुआ करते थे (नलिनी और मायर खेल निर्धन गृहस्थों के जीवन पर आधारित नाटक थे वहीं चित्रांगदा नाटक के लिए कुछ समीक्षकों का मत था कि सौंदर्य की द्रष्टि से इतना सुन्दर नाटक नहीं लिखा गया,लेकिन कुछ समीक्षकों ने इसके आलोचना करते हुए लिखा कि इस नाटक का सौंदर्य वर्णन भारतीय आदर्शों के अनुरूप नहीं इस द्रष्टि से ये हेय है ‘’ 

तथ्य केवल यही है कि लगभग सौ वर्षों के इस विशाल अंतराल के बीच दुनियां में तमाम परिवर्तन हुए भारतीय समाज यहाँ की राजनैतिक,सांस्कृतिक परिस्थितियां और परिवेश बदले |सोवियत संघ के विघटन का प्रभाव भी कला और साहित्य पर पड़ा |भूमंडली करण और बाजार वाद ने समाज परिवार सोच आदर्शों के मायने ही बदल डाले |स्वाभाविकतः साहित्य के नए मानदंड व मापदंड तय किये गए |गिरीश कारनाड एक समर्पित ,एवं प्रतिभावान नाटककार,लेखक निर्देशक हैं इसमें कोई शक नहीं | बचपन में मैंने उनका लिखा नाटक हयवदन देखा था जिसमे कलाकार ओम् शिवपुरी व सुरेखा सीकरी मुख्य पात्रों में थे |मेरा सौभाग्य है कि बाद में मुझे हयवदन व उनके लिखे एतिहासिक नाटक ‘’तुगलक’’(निर्देशक बी एम शाह भूतपूर्व निर्देशक राष्ट्रीय नाट्य विद्ध्यालय देहली)के निर्देशन में स्त्री मुख्य पात्र करने का सुअवसर प्राप्त हुआ |नाटक तुगलकजितने बार पढ़ा लेखक की श्रेष्ठता और बारीकियों का लोहा माना |
 बंगाल कला साहित्य की श्रेष्ठता में सर्वोपर है निस्संदेह |शरत चंद  ,बंकिम चंद ,अभिनेता हरेंद नाथ चट्टोपाध्याय ,उत्पल दत्त जैसे मूर्धन्य लेखक ,कलाकार हुए हैं |उत्पल दत्त का तो कोई सानी ही नहीं (मुझे उनके नाटक ‘’टीनेर तलवार’’में अभिनय करने का अवसर मिला हास्य,त्रासदी,व्यंग,गीत संगीत से परिपूर्ण ऐसा संतुलन मैंने ब्रेख्त के नाटक कॉकेशियन चौक सर्किल के अलावा किसी में नहीं देखा |)
बहरहाल इस विवाद में दो तथ्य महत्वपूर्ण है पहला कारनाड ने टैगोर को उनके सम्पूर्ण साहित्य के लिए  नहीं वरन सिर्फ नाटक में औसत माना ,अलावा इसके ये उस कलाकार का वक्तव्य है जो स्वयं लंबे समय से नाट्य लेखन व अभिनय के लिए समर्पित है और कला क्षेत्र में अपनी एक विशिष्ट पहचान रखता है उसके व्यक्तिगत विचारों को विवादों में घसीटते हुए खारिज नहीं किया जा सकता |दूसरे ,टैगोर को पूजनीय का दर्जा देने वालों (विशेषतौर पर उस महानगर विशेष से ताल्लुक रखने वालों )ने इस मसले को आस्थाओं पर प्रहार माना जो आज के युग व परिस्थितियों में निहायत दकियानूसी विचार है | जो लोग बगैर किसी तर्क के अंध आस्था के तहत ऐसा मान रहे हैं उनके लिए सिर्फ एक ही उद्धरण याद आता है सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक गेलीलियों ,कोपर्निकस और उनके युवा शिष्य ब्रूनो का जिन्हें बाइबिल के इस सत्य को कि ‘’सूर्य प्रथ्वी का चक्कर लगता है ‘’नकार कर ये सत्य उजागर व घोषित करने कि ‘’प्रथ्वी सूर्य का चक्कर लगती है’’अंध विश्वासी और आस्थावान मिश् नारियों ने देश निकाला दे दिया था ,नतीजतन  गेलीलियो को बहत्तर वर्ष की उम्र तक कचहरी के चक्कर लगाने पड़े थे वहीं ब्रूनो और उसकी प्रेमिका को उस ‘’असत्य’ सत्य को नकार देने के अपराध में चौराहे पर जिंदा जला दिया गया था |हर अति अपने चरम में आखिरकार अपनी ऊष्मा खो देती है चाहे वो आस्थाओं से सम्बंधित ही क्यूँ ना हों क्यूँ कि आस्थाएं कहीं ना कहीं अन्धं विश्वास की पडौसी ही होती हैं |
वन्दना
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