26 मई 2015

नया ज्ञानोदय के कथा विशेषांक में प्रकाशित एक कहानी ‘’सहर होगी किसी स्याह रात के बाद’’ को शब्द निष्ठा सम्मान के लिए 84 कहानियों में से श्रेष्ठ 11 कहानियों में चयनित किया गया है |चिकित्सक एवं साहित्यकार डॉ अखिलेश का मेल आज मुझे मिला | 
राशि,श्रेष्ठ कहानियां संकलन में शामिल करने व् प्रमाण पत्र के लिए धन्यवाद डॉ अखिलेश ....(एक छोटी सी खुशी )|

3 मई 2015

सुप्रसिद्ध दार्शनिक किर्केगार्द ने कहा था ‘’लोग सोचने की आज़ादी का इस्तेमाल नहीं करते |इसकी क्षति पूर्ती के लिए वो बोलने की आजादी की दरकार करते हैं ‘’|बिना सोचे विचारे बोलते जाने का शगल..|क्यूँ की सोचने की आजादी एक बौद्धिक और जटिल प्रक्रिया से गुज़रना है जिसके लिए धैर्य और योग्यता की आवश्यकता है जो विद्वजनों की फितरत से खारिज हो चुकी है |लग रहा है कि स्त्री और दलित के ‘’टिकाऊ’’ मुद्दे अब न सिर्फ साहित्य या फिल्मों तक सीमित रह गए हैं बल्कि इन दो दलों की शमशीरें खुले में भी निकल आई हैं सोशल मीडिया जिनका कुरुक्षेत्र बना हुआ है |’’बड़े लेखकों’’ के विचार कितने छोटे हैं इनका खुलासा बनाम पर्दाफ़ाश भी इसी वाक् युद्ध में होता है | स्त्री विमर्शकार जब अतिवादिता और धुरंधर शब्दावलियों के साथ जोशोखरोश से पुरुषों को कोसती हैं जिस भाषा और उलाहनों का इस्तेमाल करती हैं लगता है पूरी दुनिया के मर्द बलात्कारी व् निकृष्ट हैं सिवाय उनके संपर्क क्षेत्र और परिवार के पुरुषों के यही हाल ‘’दलित रईस सर्वहाराओं ‘’ का है | सवाल चाहे कार्ल मार्क्स का हो या आंबेडकर का किसी ने भी कहीं भी ये नहीं कहा है कि किसी से नफरत करो |उनका जोर घ्रणा पर नहीं समानता लाने पर था जिसे आज नफरतों के खांचों में बाँट दिया गया है |
(१)-सवर्णों विशेष तौर पर ब्राह्मणों को गरियाना आज बहुत आम हो गया है |बलात्कार हों,भ्रष्टाचार हो, अन्याय या राष्ट्रीय नीतियों का कोई मसला हो ,महंगाई ,आतंकवाद ..हर बुराई के ज़िम्मेदार ब्राहमण वाद |ज़ाहिर है की दलित लेखक इस मुद्दे को गरमाए रखने में विशेष दिलचस्पी रखते हैं |ये वही ‘’दलित’’ हैं जिनकी विदेश में खींची गयी तस्वीरें और शानदार रईसी रहन सहन आये दिन सोशल मीडिया की ‘’शान ‘’ बनता है | तब उनके वर्ण व्यवस्था के (हितैषी) सेना के सिपाही दलितों की समस्या को भूल उनके इस ‘चमत्कार’ के महिमामंडन में मसरूफ रहते हैं |
(२)- महंगाई,भ्रष्टाचार ,आतंकवाद आदि से दुखी और भुक्तभोगी क्या सिर्फ दलित समाज है अन्य जातियां नहीं ? क्या बलात्कार ,चोरियां,आतंक वादी गतिविधियाँ सिर्फ दलितों के साथ होती हैं ?
(३)-जब दलित वर्ग इतना शोषित और दयनीय है तो तथाकथित ब्राह्मण विरोधी व् समर्थ /संपन्न ‘’दलितों’’ ने उनके लिए कोई आर्थिक सहायता मुहैया करवाई है जिससे उनका कल्याण हो सके?
(४)-साक्षरता मिशन के एक कार्यक्रम के तहत जब राजस्थान के गाँवों में दौरे किये  और मुफ्त शिक्षा अपने बच्चों व् महिलाओं को देने की योजना के बारे में बताया तो सभी दलित बस्तियों के ज्यादातर लोगों ने स्पष्ट मना कर दिया कि हम अपने बच्चों व् महिलाओं को शिक्षा दिलवाना नहीं चाहते | उन्हें अपने बच्चों का बाल मजदूर होना और औरतों का घरों घरों काम करना ज्यादा व् त्वरित फायदेमंद लगा ताकि उन निठल्ले पुरुषों के मदिरा सेवन की व्यवस्था सुचारु चलती रहे |
(५)-उसी गाँव की सरपंच दलित महिला थी जो अनपढ़ थी जिसका पति उसके काम काज करता था |उस गाँव में दिशा मैदान के दौरान महिलाओं के साथ दुर्घटनाओं के कई केस थे लेकिन एक दलित परिवार की सरपंच होते हुए उसने महिलाओं के लिए शौच की कोई व्यवस्था नहीं की बल्कि उस गाँव में बी पी एल की भी बहुत धांधली थी |जबकि सरपंच की उस आलीशान हवेली में (लोगों के बताये अनुसार) तीन संडास थे

(४)- आरक्षण व्यवस्था को एक अरसा बीत चुका क्या उसका कोई सकारात्मक या उल्लेखनीय प्रभाव देखने को मिल रहा है ? दुसरे शब्दों में उक्त प्राप्य सुविधा के कोई रेखांकित करने योग्य परिणाम? 

15 अप्रैल 2015

‘’दी हाइब’’ ‘द फेमिली व्  ‘’मिसिज़ काल्डवेल स्पीक्स टू हर सन ‘’जैसे विश्व प्रसिद्द स्पेन के उपन्यासकार एवं नोबेल पुरस्कार विजेता (1989 ) कामिलो खोसे सेला द्वारा लिखित ‘’पास्कुआल दुआर्ते का परिवार’’ आज पढकर पूरा किया |यद्यपि ये उपन्यास मूलतः पास्कुआल और उनके परिवार के आसपास घूमता है लेकिन उसमे समकालीन स्पेनी समाज के संघर्ष  , सामाजिक भयावहता और निष्ठुर यथार्थवाद का जीवंत और मार्मिक वर्णन किया गया है| ये उपन्यास तात्कालीन समय के फ्रांको-शासन की चमचमाती छवि के नेपथ्य में  आम जनता के निष्ठुर यथार्थ का खुलासा है |किसी उपन्यास में विस्तार (Details) की क्या अहमियत होती है ये उपन्यास बहुत बारीकी से दर्शाता है | राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित उक्त उपन्यास का हिन्दी अनुवाद पाठक द्वारा उपन्यासकार के मर्म को गहराई तक समझ लेने में काफी हद तक मददगार है | 

11 अप्रैल 2015

पढने का शौक पुराना है लेकिन पिछले तीन चार वर्षों में सुनियोजित तरीके से एक ब्यवस्थित और कुछ ज्यादा गंभीरता से किताबें पढने का जूनून सवार हुआ | निस्संदेह अनुकूल अवसर भी मिले जिनमे कुछ कवितायेँ ,लेख ,यात्रा वृत्तांत लेकिन सबसे ज्यादा कहानियाँ थीं और बहुत कम उपन्यास भी |शुरू में जो रचनाएं बाँध लेती थीं उन्हें पूरा पढ़ते थे और जिनमे कुछ बिखराव सा लगता या कमज़ोर विषयवस्तु को खींचते जाना अथवा अपने शिल्प या कथ्य के ‘’चमत्कारों’’ की उबाऊ बोझिलता के कारन उन्हें दोचार पंक्ति या प्रष्ट पढ़कर बंद कर दिया करते थे लेकिन अब जब पाठकीय परिपक्वता और लेश मात्र प्रतिबद्धता भी बढ़ी तो रचना ‘’हर स्थिति में ‘’ पूरा पढने की क्षमता को दुरुस्त किया ये सोचते हुए कि शास्त्रीय संगीत या उत्कृष्ट कला के अच्छे श्रोता/पारखी बनने की तरह अच्छे साहित्य के गंभीर पाठक होना भी एक तैयारी है एक 'महारथ ' है और उसमे दक्षता की दिशा में बढना चाहिए |कभी २ कोई रचना बीच में बिखरकर अंत में रोचक हो जाती थी ये अनुभव भी तभी हुए | जितना भी पढ़ा (जिसमे क्षेत्रीय से लेकर विदेशी साहित्य तक था लेकिन बात यहाँ सिर्फ हिन्दी साहित्य तक सीमित हैं )उनमे शिल्प /प्रवाह रोचकता तो सब शानदार थी लेकिन एक सोद्देश्यता या पाठकीय द्रष्टि से विषय वैविध्य का बेहद अभाव लगा |वही दो चार विषय ...जिन्हें विमर्श कहकर और अंडर लाइन यानी रेखांकित कर दिया गया और तमाम साहित्य शिल्पगत चमत्कारों और अतिरेकपूर्ण घटनाक्रम के साथ इसी के इर्द गिर्द घूमता नज़र आने लगा |क्या साहित्य की ये दिशा टीवी धारावाहिकों या फ़िल्मी लोकप्रियता के प्रभाव का परिणाम है?हमारे यहाँ कहानियों का इतना सीमित विषयगत दायरा क्यूँ है ? जब साहित्य समाज ,परिवेश,दुनिया,जीवन, म्रत्यु ,दर्शन जैसी सैंकड़ों विविधताओं की पड़ताल कर सकता है (कालजयी साहित्य इसका साक्ष्य है )फिर सिर्फ गिने चुने विषय ही क्यूँ ?साहित्यिक परिद्रश्य पटल पर दर्शन,ह्यूमेन सायकोलोजी ,या चाइल्ड सायकोलोजी , बाल मजदूर, वृद्धावस्था या ओल्ड एज होम की बढ़ती तादादें और वहां रहने वाले वृद्धों की कहानियाँ ,पर्यावरण ,खेल ,शिक्षा आदि क्यूँ नहीं ?पंकज विष्ट,संजीव , रस्किन बोंड ,मन्नू भंडारी ,निर्मल वर्मा आदि जैसे हिन्दी के कुछ उत्कृष्ट रचनाकारों ने हालाकि लीक से अलग हटकर कुछ विषयों का चुनाव किया है जो सराहनीय और आशान्वित करने वाला है लेकिन समकालीन बहुसंख्यक रचनाएं अभी कुछ ख़ास विषयों पर ही लिखी जा रही हैं जिनमे जटिल यथार्थवादी समस्याएं व् पीडाएं प्रमुखता में हैं और उनके समाधान या सकारात्मक भविष्य की और यहाँ कुछ कम तरजीह दी जा रही है |कहीं सामाजिक ,राजनैतिक आर्थिक आदि विसंगतियों व् अराजकताओं को भोगते हुए हम नकारात्मक और हताश तो नहीं होते जा रहे ? मारियो वर्गास ल्योसा का कथन यहाँ प्रासंगिक लगता है ‘’मैंने एक ऐसे समान्तर जीवन का निर्माण किया जहाँ हम बुरे वक़्त में शरण ले सकते हैं |जिससे हम असाधारण को सामान्य और साधारण को विलक्षण बना सकते हैं |’’

24 फ़रवरी 2015

एक बड़ी उपलब्धि

अर्चना वर्मा दी की वॉल से साभार 


कथादेश और सर्नुनोस का सहयोगी उपक्रम 
रहस्य-कल्पना कथा-प्रतियोगिता 2014 – 2015 
परिणाम
रहस्य-कल्पना की निम्नलिखित सात कहानियाँ अंग्रेजी और फ़्रेंच में अनुवाद और संकलन के लिये चुनी गयी हैँ। प्रतियोगिता में पुरस्कारों की घोषित संख्या दस थी लेकिन हमारा प्राथमिक सरोकार ऐसी कहानियों के चुनाव का था जिन्हें अंग्रेजी और फ़्रेंच पाठक समुदाय के समक्ष विश्वरस्तर से प्रतिस्पर्धापूर्वक प्रस्तुत किया जा सके। यही कारण है कि चुनी हुई कहानियोँ की संख्या को हम दस तक नहीं पहुँचा सके।
ये सभी कहानियाँ अनुवाद और संकलन के लिये चुनी गयी हैँ। इस चुनाव में प्रथम द्वितीय जैसा कोई वरीयता क्रम नहीं है। वे यहाँ लेखकों के नाम के अकारादिक्रम से दर्ज की जा रही हैँ।
प्रत्येक कहानी के लिये पुरस्कार राशि 25000/= है। इस सन्दर्भ में जल्दी ही कथादेश की ओर से विजेताओं से सम्पर्क किया जायेगा।
विजेताओं को बधाई.
1. दिलीप शाक्य – प्रोफ़ेसर 800
2. निवेदिता जेना – बिसात पर सजी मोहरें
3. प्रतिभू बनर्जी – वास्को डि गामा गली
4. प्रेमचंद गाँधी – सुकून भी जुनून भी
5. भालचंद्र जोशी – आने वाले कल का खूनी रहस्य
6. वन्दना शुक्ल – अपने होने के विरुद्ध
7. विवेक मिश्र – कारा

27 जनवरी 2015

जीवट की अद्भुत मिसाल -ओपरा विनफ्रे
एक स्त्री को कितने कष्ट कितने अपमान और दुःख मिल सकते हैं और कैसे वो स्त्री गहन अवसाद से स्वयं बाहर आकर दुनिया में आध्यात्मिक ,सामाजिक और आर्थिक रूप से नारी जगत में एक अद्भुत मिसाल बन सकती है ये ओपरा विनफ्रे के जीवन को पढ़कर जाना जा सकता है |62 वर्षीय ओपरा का जन्म मिसीसिपी अमेरिका में हुआ |पांच वर्ष की आयु में ही माता पिता में तलाक हो गया और दौनों ने ही ओपरा को त्याग दिया तब उस पांच वर्ष की बच्ची का पालन पोषण उसके दादी दादी ने किया |युवा होने पर उनकी माँ उन्हें अपने साथ ले गईं लेकिन वहां उन्ही के ख़ास रिश्तेदारों ने उनका यौन शोषण किया |तब वहां से भागकर वो अपने पिता के पास चली गईं |पिता को उन की इस स्थिति को देखकर बेहद दुःख हुआ |वो अनुशासन प्रिय और मितभाषी थे |उन्होंने ओपरा को बहुत समझाने की चेष्टा की लेकिन स्थिति तब तक काफी खराब हो चुकी थी | ओपरा की कुंठाओं और नाजायज़ रूप से गर्भ धारण करने के अवसाद ने उनका जीवन छिन्न भिन्न कर दिया |उनके असंतुलित और अराजक बचपन जिसे वो भूल नहीं पाई और जिसकी बदौलत वे मादक पदार्थों के सेवन की आदी हो गईं |विद्रोह और क्रोध उनके स्वभाव में आ गए |पिता के लिए उनकी बेटी का ये स्वभाव व् आदतें असहनीय और तकलीफदेह थीं |तब उन्होंने ओपरा को पढाई के लिए समझाया और कॉलेज में दाखिला दिलवाया |उन्हें भरपूर स्नेह दिया |स्नातक की डिग्री मिलने के बाद वे पत्रकारिता में रूचि लेने लगीं|इस नाजुक मोड़ पर पिता उनके भावनात्मक संबल बने |नतीजतन ओपरा का ध्यान कुछ सार्थक और सकारातमक दिशा की और मुड़ने लगा | वे मीडिया से जुड़ गईं और 19 वर्ष की आयु में अमरीका में टी वी पर काम करने वाली पहली अश्वेत महिला बनी |उनकी प्रसिद्धि शिकागो के एक टी वी शो’’एम् शिकागो’’ नामक कार्यक्रम से हुई |ये टी वी शो टी वी के इतिहास के सफलतम तथा उत्कृष्ट टॉक शो के नाम से प्रसिद्द हुआ |इस शो की खासियत ये थी की इसमें ओपरा अपने दिल की बात करती हैं और लोगों को परामर्श देती हैं |उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा |वे सफल अभिनेत्री ,’’ओ , द ओपरा मैगजीन ‘’ की संस्थापक और मीडिया पत्रकार हुईं |सामाजिक कार्यकर्ता और लोगों के जीवन को दिशा देने संबंधी कार्यों के लिए उन्हें अनेक पुरस्कारों से नवाज़ा गया सम्मान दिए गए |फ़ोर्ब्स के धनी व्यक्तियों की सूची में उनका नाम भी है | ओपरा के इस जीवन चक्र में कुछ ख़ास बातें हैं जैसे उनकी माँ जो स्त्री वो भी माँ होते हुए भी फिर कभी उनकी ज़िंदगी में वापस नहीं आईं |जब की ओपरा की इन तमाम उपलब्धियों की मूल वजह उनके पिता थे जो इसी सार्वभौमिक पित्र्सत्तात्मक्ता की पैदाइश थे |इस जीवनी में चाहे पिता का रोल हो या बेटी ओपरा का सिद्ध यही होता है की ऐसे प्रकरण अपवाद कतई नहीं होते

19 जनवरी 2015

साहित्य में ‘विमर्शों ‘’ की प्रासंगिकता


सबसे पहला प्रश्न विमर्श क्या और क्यूँ |विमर्श का अर्थ सरोकार से लिया जाए या मूल्यांकन से ? क्या हर नारीवादी या स्त्री विषयक लेखन विमर्श की श्रेणी में आता है? यौनिकता बनाम नारी देह से शुरू हो अंतत नारी शुचिता के नारों पर समाप्त हो जाना ही सरोकारों के उद्देश्यों की इतिश्री मानी जाए ? क्या दलित साहित्य का अर्थ सिर्फ इस वर्ग का एतिहासिक शोषण और उसके कारणों का लेखा जोखा या वस्तुस्थिति का मुजाहिरा अथवा उनके प्रति दया ,क्षुब्धता अथवा आक्रोश ही है? यदि हम अपने साहित्यिक पुरोधाओं के इस कथन से इत्तिफाक रखते हैं कि ‘’हर अच्छी रचना एक हस्तक्षेप होती है’’ तो विमर्शों की प्रासंगिकता बनाम आवश्यकता पर एक बार पुनर्विचार करना होगा बशर्ते कि हम ‘’अच्छी रचना’’ को सही सही परिभाषित ही नहीं मूल्यांकित भी कर पायें |प्रकारांत में विमर्श का अस्तित्व प्रथकता की मनोवृत्ति दर्शाता है | एकरूपता को खारिज कर स्व-विखंडन की प्रवृत्ति की स्वीकारोक्ति | यद्यपि मौजूदा साहित्य समाज की विकृतियों मनोविकारों व् जटिलताओं का काफी हद तक एक सटीक खाका खींचता है |गंभीर मुद्दे उठाये जा रहे हैं ,प्रतीकों व् ब्योरों द्वारा अभूतपूर्व रूप से स्थितियों का सूक्ष्म विश्लेषण किया जा रहा है |निस्संदेह इसमें इलेक्ट्रोनिक मीडिया व् उपकरणों का भरपूर स्तेमाल और सहयोग है और ये भी सच है कि इन उपकरणों व् मीडिया से अनेकानेक लाभ और सुविधाएं अर्जित की जा रही हैं ,ज्ञान है सूचनाएं व् जानकारियाँ हैं लेकिन इन्होने कहीं न कहीं व्यक्ति को विचार-पंगु बनाने का कार्य भी किया है | प्रायः स्त्री विमर्श कर्ता विशेषतः स्त्री पुरोधाओं के लेखन में पुरुषों व् दलित  लेखन के तहत सवर्णों को कटघरे में खड़ा किया जाता है लेकिन यदि कोई सवर्ण दलित विषयक रचना अथवा कोई पुरुष स्त्री की दशा से सम्बंधित रचना लिखता है तो उसे किस भाव में लिया जाएगा ? केदारनाथ सिंह जी ने एक साक्षात्कार में कहा है ‘’विमर्श के कारन जो सबसे ज्यादा क्षति हुई उसको अनुभव करने वाला समाज फ्रांस का समाज है वहां इतने ज्यादा विमर्श हुए हैं कि कविता में प्राणवंत लेखन लगभग दब सा गया है |उनकी ये चिंता भी वाजिब है कि आज समाज व् साहित्य में जनांदोलन क्यूँ नहीं पैदा हो रहे हैं इस पर विचार करना चाहिए|’’
बाल विमर्श का विकल्प ‘’स्लम डॉग मिलेनियम’’ जैसी फ़िल्में या बाल बंधकों /मजदूरों से सम्बंधित डॉक्युमेंट्री नहीं हो सकतीं ये तो सिर्फ इस एक वास्तविकता की पटकथा का चित्रण हैं | हमारे फेसबुक मित्र महेश पुनेठा जी ने जिस दीवार पत्रिका का श्री गणेश किया है और हमारे कई मित्र उसमे रूचि ले रहे हैं ये संभवतः कागजी विमर्शों से अधिक लाभप्रद और असरदार कोशिशें हैं | जहाँ तक स्त्री की आजादी की बात है उसकी पारिवारिक,सामाजिक, राजनैतिक अधिकारों की स्थिति पहले से बेहतर लेकिन आज भी काफी असंतोषजनक है और निस्संदेह साहित्य में स्त्री विषयक जिन चिंताओं व् उसकी पीडाओं को केंद्र में रखा जाता रहा है वास्तविक स्थिति आज संभवतः उससे भी भयावह है लेकिन क्या साहित्य का उद्देश्य सिर्फ इतना ही है कि हम स्त्री की दिशा को नज़रअंदाज कर सिर्फ उसकी दशा का सही २ और मार्मिक वर्णन कर दें व्  पुरस्कार सम्मानों के हकदार मान लिए जाएँ ? आज बहुत कम किताबें ऐसी पढने को मिल रही हैं जिनमे स्त्री के भविष्य की चिंता के साथ उसकी जटिल स्थितियों के संभावित समाधान को भी जोड़ा गया है | क्या ज़रूरी है कि स्त्री किसी रचना में सिर्फ प्रताडिता के रूप में ही हो ? क्या हमारी रचनाएं आने वाले समय की धमक सुन पा रही हैं ?