एक आदत बन जाने की हद तक किसी जुनून की गिरफ्त में होना वहीं जानते हैं जो उससे गुज़र रहे होते हैं लेकिन उस के बीत जाने के बाद विजय की अनुभूति के वो पल सचमुच अवर्णनीय और अनमोल होते हैं |अभी २ एक उपन्यास ख़त्म किया ''ख़्वाबों की स्वरलिपि और बामन चौराहा '' | शुक्रिया उन सब परिवार जनों का जिन्होंने बेतरतीब दिनचर्या और जिद को शान्ति से बर्दाश्त किया
3 जून 2015
वागर्थ के मार्च 2015 अंक में कहानी ‘’मशीन’’ प्रकाशित हुई थी जिसका अनुवाद गुजराती पत्रिका ‘’आनंद उपवन’’ (मुम्बई) तथा तेलुगु की प्रसिद्द फिक्शन राईटर श्रीवाल्ली राधिका (हैदराबाद) ने तेलगु में करने की अनुमति माँगी थी |अभी एर्नाकुलम केरला की लेखिका डॉ राधामणि (प्रोफ़ेसर एर्नाकुलम) ने फोन से इसी कहानी के मलयालम अनुवाद की अनुमति चाही है |.प्रिय कहानी के अनुवाद के लिए आप सभी का आभार
26 मई 2015
नया ज्ञानोदय के कथा विशेषांक में प्रकाशित एक कहानी ‘’सहर होगी किसी स्याह रात के बाद’’ को शब्द निष्ठा सम्मान के लिए 84 कहानियों में से श्रेष्ठ 11 कहानियों में चयनित किया गया है |चिकित्सक एवं साहित्यकार डॉ अखिलेश का मेल आज मुझे मिला |
राशि,श्रेष्ठ कहानियां संकलन में शामिल करने व् प्रमाण पत्र के लिए धन्यवाद डॉ अखिलेश ....(एक छोटी सी खुशी )|
राशि,श्रेष्ठ कहानियां संकलन में शामिल करने व् प्रमाण पत्र के लिए धन्यवाद डॉ अखिलेश ....(एक छोटी सी खुशी )|
3 मई 2015
सुप्रसिद्ध दार्शनिक किर्केगार्द ने कहा था ‘’लोग सोचने की आज़ादी का इस्तेमाल
नहीं करते |इसकी क्षति पूर्ती के लिए वो बोलने की आजादी की दरकार करते हैं ‘’|बिना
सोचे विचारे बोलते जाने का शगल..|क्यूँ की सोचने की आजादी एक बौद्धिक और जटिल प्रक्रिया
से गुज़रना है जिसके लिए धैर्य और योग्यता की आवश्यकता है जो विद्वजनों की फितरत से
खारिज हो चुकी है |लग रहा है कि स्त्री और दलित के ‘’टिकाऊ’’ मुद्दे अब न सिर्फ
साहित्य या फिल्मों तक सीमित रह गए हैं बल्कि इन दो दलों की शमशीरें खुले में भी निकल
आई हैं सोशल मीडिया जिनका कुरुक्षेत्र बना हुआ है |’’बड़े लेखकों’’ के विचार कितने
छोटे हैं इनका खुलासा बनाम पर्दाफ़ाश भी इसी वाक् युद्ध में होता है | स्त्री
विमर्शकार जब अतिवादिता और धुरंधर शब्दावलियों के साथ जोशोखरोश से पुरुषों को
कोसती हैं जिस भाषा और उलाहनों का इस्तेमाल करती हैं लगता है पूरी दुनिया के मर्द
बलात्कारी व् निकृष्ट हैं सिवाय उनके संपर्क क्षेत्र और परिवार के पुरुषों के यही
हाल ‘’दलित रईस सर्वहाराओं ‘’ का है | सवाल चाहे कार्ल मार्क्स का हो या
आंबेडकर का किसी ने भी कहीं भी ये नहीं कहा है कि किसी से नफरत करो |उनका जोर
घ्रणा पर नहीं समानता लाने पर था जिसे आज नफरतों के खांचों में बाँट दिया गया है |
(१)-सवर्णों विशेष तौर पर ब्राह्मणों को गरियाना आज बहुत आम हो गया है
|बलात्कार हों,भ्रष्टाचार हो, अन्याय या राष्ट्रीय नीतियों का कोई मसला हो ,महंगाई
,आतंकवाद ..हर बुराई के ज़िम्मेदार ब्राहमण वाद |ज़ाहिर है की दलित लेखक इस मुद्दे
को गरमाए रखने में विशेष दिलचस्पी रखते हैं |ये वही ‘’दलित’’ हैं जिनकी विदेश में
खींची गयी तस्वीरें और शानदार रईसी रहन सहन आये दिन सोशल मीडिया की ‘’शान ‘’ बनता
है | तब उनके वर्ण व्यवस्था के (हितैषी) सेना के सिपाही दलितों की समस्या को भूल
उनके इस ‘चमत्कार’ के महिमामंडन में मसरूफ रहते हैं |
(२)- महंगाई,भ्रष्टाचार ,आतंकवाद आदि से दुखी और भुक्तभोगी क्या सिर्फ दलित
समाज है अन्य जातियां नहीं ? क्या बलात्कार ,चोरियां,आतंक वादी गतिविधियाँ सिर्फ
दलितों के साथ होती हैं ?
(३)-जब दलित वर्ग इतना शोषित और दयनीय है तो तथाकथित ब्राह्मण विरोधी व् समर्थ
/संपन्न ‘’दलितों’’ ने उनके लिए कोई आर्थिक सहायता मुहैया करवाई है जिससे उनका
कल्याण हो सके?
(४)-साक्षरता मिशन के एक कार्यक्रम के तहत जब राजस्थान के गाँवों में दौरे किये
और मुफ्त शिक्षा अपने बच्चों व् महिलाओं
को देने की योजना के बारे में बताया तो सभी दलित बस्तियों के ज्यादातर लोगों ने
स्पष्ट मना कर दिया कि हम अपने बच्चों व् महिलाओं को शिक्षा दिलवाना नहीं चाहते |
उन्हें अपने बच्चों का बाल मजदूर होना और औरतों का घरों घरों काम करना ज्यादा व्
त्वरित फायदेमंद लगा ताकि उन निठल्ले पुरुषों के मदिरा सेवन की व्यवस्था सुचारु चलती
रहे |
(५)-उसी गाँव की सरपंच दलित महिला थी जो अनपढ़ थी जिसका पति उसके काम काज करता
था |उस गाँव में दिशा मैदान के दौरान महिलाओं के साथ दुर्घटनाओं के कई केस थे
लेकिन एक दलित परिवार की सरपंच होते हुए उसने महिलाओं के लिए शौच की कोई व्यवस्था
नहीं की बल्कि उस गाँव में बी पी एल की भी बहुत धांधली थी |जबकि सरपंच की उस
आलीशान हवेली में (लोगों के बताये अनुसार) तीन संडास थे
(४)- आरक्षण व्यवस्था को एक अरसा बीत चुका क्या उसका कोई सकारात्मक या
उल्लेखनीय प्रभाव देखने को मिल रहा है ? दुसरे शब्दों में उक्त प्राप्य सुविधा के
कोई रेखांकित करने योग्य परिणाम?
15 अप्रैल 2015
‘’दी हाइब’’ ‘द फेमिली व् ‘’मिसिज़ काल्डवेल स्पीक्स टू हर सन ‘’जैसे विश्व
प्रसिद्द स्पेन के उपन्यासकार एवं नोबेल पुरस्कार विजेता (1989 ) कामिलो खोसे सेला द्वारा
लिखित ‘’पास्कुआल दुआर्ते का परिवार’’ आज पढकर पूरा किया |यद्यपि ये उपन्यास मूलतः
पास्कुआल और उनके परिवार के आसपास घूमता है लेकिन उसमे समकालीन स्पेनी समाज के संघर्ष
, सामाजिक भयावहता और निष्ठुर यथार्थवाद
का जीवंत और मार्मिक वर्णन किया गया है| ये उपन्यास तात्कालीन समय के फ्रांको-शासन
की चमचमाती छवि के नेपथ्य में आम जनता के
निष्ठुर यथार्थ का खुलासा है |किसी उपन्यास में विस्तार (Details) की क्या अहमियत
होती है ये उपन्यास बहुत बारीकी से दर्शाता है | राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित उक्त उपन्यास
का हिन्दी अनुवाद पाठक द्वारा उपन्यासकार के मर्म को गहराई तक समझ लेने में काफी
हद तक मददगार है |
11 अप्रैल 2015
पढने का शौक पुराना है लेकिन पिछले तीन चार वर्षों में सुनियोजित तरीके से एक ब्यवस्थित और कुछ ज्यादा गंभीरता से किताबें पढने का जूनून सवार हुआ | निस्संदेह अनुकूल अवसर भी मिले जिनमे कुछ कवितायेँ ,लेख ,यात्रा वृत्तांत लेकिन सबसे ज्यादा कहानियाँ थीं और बहुत कम उपन्यास भी |शुरू में जो रचनाएं बाँध लेती थीं उन्हें पूरा पढ़ते थे और जिनमे कुछ बिखराव सा लगता या कमज़ोर विषयवस्तु को खींचते जाना अथवा अपने शिल्प या कथ्य के ‘’चमत्कारों’’ की उबाऊ बोझिलता के कारन उन्हें दोचार पंक्ति या प्रष्ट पढ़कर बंद कर दिया करते थे लेकिन अब जब पाठकीय परिपक्वता और लेश मात्र प्रतिबद्धता भी बढ़ी तो रचना ‘’हर स्थिति में ‘’ पूरा पढने की क्षमता को दुरुस्त किया ये सोचते हुए कि शास्त्रीय संगीत या उत्कृष्ट कला के अच्छे श्रोता/पारखी बनने की तरह अच्छे साहित्य के गंभीर पाठक होना भी एक तैयारी है एक 'महारथ ' है और उसमे दक्षता की दिशा में बढना चाहिए |कभी २ कोई रचना बीच में बिखरकर अंत में रोचक हो जाती थी ये अनुभव भी तभी हुए | जितना भी पढ़ा (जिसमे क्षेत्रीय से लेकर विदेशी साहित्य तक था लेकिन बात यहाँ सिर्फ हिन्दी साहित्य तक सीमित हैं )उनमे शिल्प /प्रवाह रोचकता तो सब शानदार थी लेकिन एक सोद्देश्यता या पाठकीय द्रष्टि से विषय वैविध्य का बेहद अभाव लगा |वही दो चार विषय ...जिन्हें विमर्श कहकर और अंडर लाइन यानी रेखांकित कर दिया गया और तमाम साहित्य शिल्पगत चमत्कारों और अतिरेकपूर्ण घटनाक्रम के साथ इसी के इर्द गिर्द घूमता नज़र आने लगा |क्या साहित्य की ये दिशा टीवी धारावाहिकों या फ़िल्मी लोकप्रियता के प्रभाव का परिणाम है?हमारे यहाँ कहानियों का इतना सीमित विषयगत दायरा क्यूँ है ? जब साहित्य समाज ,परिवेश,दुनिया,जीवन, म्रत्यु ,दर्शन जैसी सैंकड़ों विविधताओं की पड़ताल कर सकता है (कालजयी साहित्य इसका साक्ष्य है )फिर सिर्फ गिने चुने विषय ही क्यूँ ?साहित्यिक परिद्रश्य पटल पर दर्शन,ह्यूमेन सायकोलोजी ,या चाइल्ड सायकोलोजी , बाल मजदूर, वृद्धावस्था या ओल्ड एज होम की बढ़ती तादादें और वहां रहने वाले वृद्धों की कहानियाँ ,पर्यावरण ,खेल ,शिक्षा आदि क्यूँ नहीं ?पंकज विष्ट,संजीव , रस्किन बोंड ,मन्नू भंडारी ,निर्मल वर्मा आदि जैसे हिन्दी के कुछ उत्कृष्ट रचनाकारों ने हालाकि लीक से अलग हटकर कुछ विषयों का चुनाव किया है जो सराहनीय और आशान्वित करने वाला है लेकिन समकालीन बहुसंख्यक रचनाएं अभी कुछ ख़ास विषयों पर ही लिखी जा रही हैं जिनमे जटिल यथार्थवादी समस्याएं व् पीडाएं प्रमुखता में हैं और उनके समाधान या सकारात्मक भविष्य की और यहाँ कुछ कम तरजीह दी जा रही है |कहीं सामाजिक ,राजनैतिक आर्थिक आदि विसंगतियों व् अराजकताओं को भोगते हुए हम नकारात्मक और हताश तो नहीं होते जा रहे ? मारियो वर्गास ल्योसा का कथन यहाँ प्रासंगिक लगता है ‘’मैंने एक ऐसे समान्तर जीवन का निर्माण किया जहाँ हम बुरे वक़्त में शरण ले सकते हैं |जिससे हम असाधारण को सामान्य और साधारण को विलक्षण बना सकते हैं |’’
24 फ़रवरी 2015
एक बड़ी उपलब्धि
अर्चना वर्मा दी की वॉल से साभार
कथादेश और सर्नुनोस का सहयोगी उपक्रम
रहस्य-कल्पना कथा-प्रतियोगिता 2014 – 2015
परिणाम
रहस्य-कल्पना की निम्नलिखित सात कहानियाँ अंग्रेजी और फ़्रेंच में अनुवाद और संकलन के लिये चुनी गयी हैँ। प्रतियोगिता में पुरस्कारों की घोषित संख्या दस थी लेकिन हमारा प्राथमिक सरोकार ऐसी कहानियों के चुनाव का था जिन्हें अंग्रेजी और फ़्रेंच पाठक समुदाय के समक्ष विश्वरस्तर से प्रतिस्पर्धापूर्वक प्रस्तुत किया जा सके। यही कारण है कि चुनी हुई कहानियोँ की संख्या को हम दस तक नहीं पहुँचा सके।
ये सभी कहानियाँ अनुवाद और संकलन के लिये चुनी गयी हैँ। इस चुनाव में प्रथम द्वितीय जैसा कोई वरीयता क्रम नहीं है। वे यहाँ लेखकों के नाम के अकारादिक्रम से दर्ज की जा रही हैँ।
प्रत्येक कहानी के लिये पुरस्कार राशि 25000/= है। इस सन्दर्भ में जल्दी ही कथादेश की ओर से विजेताओं से सम्पर्क किया जायेगा।
विजेताओं को बधाई.
1. दिलीप शाक्य – प्रोफ़ेसर 800
2. निवेदिता जेना – बिसात पर सजी मोहरें
3. प्रतिभू बनर्जी – वास्को डि गामा गली
4. प्रेमचंद गाँधी – सुकून भी जुनून भी
5. भालचंद्र जोशी – आने वाले कल का खूनी रहस्य
6. वन्दना शुक्ल – अपने होने के विरुद्ध
7. विवेक मिश्र – कारा
कथादेश और सर्नुनोस का सहयोगी उपक्रम
रहस्य-कल्पना कथा-प्रतियोगिता 2014 – 2015
परिणाम
रहस्य-कल्पना की निम्नलिखित सात कहानियाँ अंग्रेजी और फ़्रेंच में अनुवाद और संकलन के लिये चुनी गयी हैँ। प्रतियोगिता में पुरस्कारों की घोषित संख्या दस थी लेकिन हमारा प्राथमिक सरोकार ऐसी कहानियों के चुनाव का था जिन्हें अंग्रेजी और फ़्रेंच पाठक समुदाय के समक्ष विश्वरस्तर से प्रतिस्पर्धापूर्वक प्रस्तुत किया जा सके। यही कारण है कि चुनी हुई कहानियोँ की संख्या को हम दस तक नहीं पहुँचा सके।
ये सभी कहानियाँ अनुवाद और संकलन के लिये चुनी गयी हैँ। इस चुनाव में प्रथम द्वितीय जैसा कोई वरीयता क्रम नहीं है। वे यहाँ लेखकों के नाम के अकारादिक्रम से दर्ज की जा रही हैँ।
प्रत्येक कहानी के लिये पुरस्कार राशि 25000/= है। इस सन्दर्भ में जल्दी ही कथादेश की ओर से विजेताओं से सम्पर्क किया जायेगा।
विजेताओं को बधाई.
1. दिलीप शाक्य – प्रोफ़ेसर 800
2. निवेदिता जेना – बिसात पर सजी मोहरें
3. प्रतिभू बनर्जी – वास्को डि गामा गली
4. प्रेमचंद गाँधी – सुकून भी जुनून भी
5. भालचंद्र जोशी – आने वाले कल का खूनी रहस्य
6. वन्दना शुक्ल – अपने होने के विरुद्ध
7. विवेक मिश्र – कारा
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