बहुत याद आ रही है माँ
तुम्हारी आज,कुछ ख़ास नहीं ,बस
हरहराती बारिश के कोप को
धरती से सोखते देख लिया था
पतझड़ के सूखे गिरे पत्तों की जगह
नई नई कोपले उगते देखि थीं तुम्हारी
हथेली की वो चिरपरिचित गर्माहट
शिद्दत से महसूस की थी मैंने अपने
पसीना छल्छालाये माथे पर
ऐसा ही होता है अक्सर
कि विचारों में तुम अकेली नहीं आतीं
तुम्हारे साथ तुम्हारी यादों का हुजूम चलता है
इसी हुजूम का अटूट हिस्सा है बचपन सो
याद आई
तुम्हारे साथ साथ
भरे पूरे बचपन की
तुम्हारे बगैर अधूरा था जो ,
याद है माँ तुम्हे वो
दो कमरों को एक करती वो छोटी सी छत और
आंगन के बीचों बीच किसी बड़े बुज़ुर्ग के
सयानेपन सा खड़ा वो घना नीम का दरख्त
उसी दरख्त के तले झोलदार मूंज की खटिया पर
अपनी बांह का तकिया बना और दूसरे हाथ की
उँगलियाँ मेरे सर पर फेरती
असीम संतृप्ति से भरी तुम, अपनी ही तरह की
भोली भली सीधी सदी कहानियाँ सुनाती
कभी कभी लोरी गुनगुनाती ,
खुद सो जाया करती थीं
तब तुम्हारे चेहरे की थकी हुई लकीरों को
कुछ देर अपलक निहारती थी में
और सोचती आखिर क्यूँ पूजती हो तुम
''देवी माँ''को?
तुम्हारे मसालों की गंध से गंधाती
माँ की शुध्ध गंध के बीच
सिकुड़ कर गुडमुदी हो मैं
तुम्हारे पेट से चिपक ऑंखें बंद कर लेती
और समां जाती एक दिव्य लोक में.
अनंत सुख में जहाँ न भय था स्कूली ''होमवर्क''का
न स्कुल के रिक्शे से गिरने का
न ओजोन का न पेड़ों के कटे जाने का न प्रदुषण का
वो सिर्फ गोद होती थी तुम्हारी
निर्मल और सुकून भरी गोद
आज भी सोचती हूँ कि तुम्हारी दुबली पतली काया और
क्षीण हाथों में भला कहाँ से आता था बल
निष्पाप निर्भयता और
निष्णांत सुरक्षा का
तुमने तो बावजूद साधारण सी
''रामायण बांचने लायक''शिक्षा ही अर्जित की थी न?
पर कैसे भला तुम मेरी आहट से मेरे अंतर्मन का बोध पा जाती थीं?
तुम्हारी इस अंतर्दृष्टि ने
कितने ही फितूरों से बचाया था
और कितनी सादगी से
मै खुश होती,तुम धर भर मैं चकरघिन्नी होतीं
खाना नाश्ता कपडे न जाने क्या क्या
और जब उदास होती मै, तुम माँ से हटकर साये में
तब्दील हो जातीं अचानक,आज भी
जब तुम नहीं हो पास, मुसीबत के
वक़्त तुम्हारा स्पर्श महसूस करती हूँ अपने माथे पर
तुम्हाती ही आशीषों से भरी वो आँखों की रोशनी
ही मुझे राह दिखती है अँधेरी भटकन के बीच
23 अगस्त 2010
15 अगस्त 2010
दौड़
दौड़
हो रहा है यूँ कि',
बचपन की पढी किताबों के
वो प्रेरनादायी किस्से
अनायास ही अविश्वसनीय और
गैरजरूरी से लगने लगे हैं
और
'ओज ,नैतिकता ईमानदारी जैसे
हलके फुल्के भोले शब्दों पर
चढ़ गई है परतें
सयानेपन की
मुह चिढाती हुई
और चुनौती देती हुई '
कि अब न दूध का दांतों और न
बालों का उम्र से कोई वास्ता रहा
ये नया युग है
छायावादी संस्कारों से अलहदा
मायावादी संस्करणों का युग,जहाँ
बच्चे अब
बच्चे कम मशीन ज्यादा
हो गए हैं
या कर दिए गए हैं'क्यूंकि
माँ पिताओं को फिक्र और जल्दी है
उनके 'बड़े'हो जाने की '
नयेपन के कंधे तक पहुँच
जाने की
उनके पिछड़ न जाने की
शायद इसीलिए चाहते हैं वो
संतानों के भविष्य को
खींचकर
वर्तमान में ले आयें 'ताकि
भविष्य जिसे वर्त्तमान भी होना है कभी
सुरक्षित किया जा सके
बेशक उसका वर्त्तमान
मिटाकर '
महसूस करती हूँ कहीं न कहीं
संबंधों का ठंडापन और
संबोधनों की रिक्तता
शायद ये भी
नए दौर की शर्तें हैं
अचानक खुद को और
संगृहीत सहेजे विचारों और मान्यताओं को
खारिज होते देख रही हूँ निरंतर
क्या हर जाती आती आधुनिकता की
ये पीढीगत अनिवार्यताएं होती हैं?
हो रहा है यूँ कि',
बचपन की पढी किताबों के
वो प्रेरनादायी किस्से
अनायास ही अविश्वसनीय और
गैरजरूरी से लगने लगे हैं
और
'ओज ,नैतिकता ईमानदारी जैसे
हलके फुल्के भोले शब्दों पर
चढ़ गई है परतें
सयानेपन की
मुह चिढाती हुई
और चुनौती देती हुई '
कि अब न दूध का दांतों और न
बालों का उम्र से कोई वास्ता रहा
ये नया युग है
छायावादी संस्कारों से अलहदा
मायावादी संस्करणों का युग,जहाँ
बच्चे अब
बच्चे कम मशीन ज्यादा
हो गए हैं
या कर दिए गए हैं'क्यूंकि
माँ पिताओं को फिक्र और जल्दी है
उनके 'बड़े'हो जाने की '
नयेपन के कंधे तक पहुँच
जाने की
उनके पिछड़ न जाने की
शायद इसीलिए चाहते हैं वो
संतानों के भविष्य को
खींचकर
वर्तमान में ले आयें 'ताकि
भविष्य जिसे वर्त्तमान भी होना है कभी
सुरक्षित किया जा सके
बेशक उसका वर्त्तमान
मिटाकर '
महसूस करती हूँ कहीं न कहीं
संबंधों का ठंडापन और
संबोधनों की रिक्तता
शायद ये भी
नए दौर की शर्तें हैं
अचानक खुद को और
संगृहीत सहेजे विचारों और मान्यताओं को
खारिज होते देख रही हूँ निरंतर
क्या हर जाती आती आधुनिकता की
ये पीढीगत अनिवार्यताएं होती हैं?
14 अगस्त 2010
साजिश
बहुत कोलाहल है वायुमंडल में.
कहीं मेलों का तो कहीं
खेलों का ,
कहीं चर्चे ''आर्ट ऑफ़ लिविंग ''के
तो कहीं बहसें ''ऑनर किलिंग ''पे ,तो कही
भ्रष्टाचार से दिपदिपाते मांसल गोलमटोल चेहरे
बड़े बड़े ओहदों से लदे फदे देश की चिंता करते
अपने विशाल वातानुकूलित महलों में
गुदगुदे गद्दों के बीच विराजे
या की लड़ते झगड़ते अवतरित होते टी वी चेनलों में ,
देश के चिंताओं पर चिंतन बहस करते
झूठ को सच और सच को झूठ करते
बेशर्मी भी इनसे शर्मा जाये
तो कहीं ,
''पोजिटिव थिंकिंग ''की सीख देते
अपने महल नुमा 'मंदिर में''विराजे
भक्तों की भीड़ में चींटों के विशाल झुण्ड में गुड की डली से ये ''लिविंग गुरु''
दे रहे हैं शिक्षा ''खुश रहने की
हर हाल में ,कि
भूख एक अहसास है
और गरीबी ,अमीर बनने का लालच
इसी लालच से बचना है तुम्हे
यदि खाने को कम है तो सोचो कि
ज्यादा भोजन स्वास्थ्य के लिए
हानिकारक है
चीथड़ों में जीवन की निस्सारता छिपी है
किसी भी किस्म का अन्याय
जूझने का अभ्यास है
इसे ही तो ''पोजिटिव थिंकिंग''कहते हैं
उलटवासी
धुप तो खिला करती थी पहले भी
पर अब ये खिलती कम
तपती अधिक है
झाड़ लिया है पल्लू सूरज ने भी
अपनी तपन को ''ओजोन के सर''मढ़ कर
प्रकृति भी सीख गई है
आदमी के नुस्खे
कहीं मेलों का तो कहीं
खेलों का ,
कहीं चर्चे ''आर्ट ऑफ़ लिविंग ''के
तो कहीं बहसें ''ऑनर किलिंग ''पे ,तो कही
भ्रष्टाचार से दिपदिपाते मांसल गोलमटोल चेहरे
बड़े बड़े ओहदों से लदे फदे देश की चिंता करते
अपने विशाल वातानुकूलित महलों में
गुदगुदे गद्दों के बीच विराजे
या की लड़ते झगड़ते अवतरित होते टी वी चेनलों में ,
देश के चिंताओं पर चिंतन बहस करते
झूठ को सच और सच को झूठ करते
बेशर्मी भी इनसे शर्मा जाये
तो कहीं ,
''पोजिटिव थिंकिंग ''की सीख देते
अपने महल नुमा 'मंदिर में''विराजे
भक्तों की भीड़ में चींटों के विशाल झुण्ड में गुड की डली से ये ''लिविंग गुरु''
दे रहे हैं शिक्षा ''खुश रहने की
हर हाल में ,कि
भूख एक अहसास है
और गरीबी ,अमीर बनने का लालच
इसी लालच से बचना है तुम्हे
यदि खाने को कम है तो सोचो कि
ज्यादा भोजन स्वास्थ्य के लिए
हानिकारक है
चीथड़ों में जीवन की निस्सारता छिपी है
किसी भी किस्म का अन्याय
जूझने का अभ्यास है
इसे ही तो ''पोजिटिव थिंकिंग''कहते हैं
उलटवासी
धुप तो खिला करती थी पहले भी
पर अब ये खिलती कम
तपती अधिक है
झाड़ लिया है पल्लू सूरज ने भी
अपनी तपन को ''ओजोन के सर''मढ़ कर
प्रकृति भी सीख गई है
आदमी के नुस्खे
26 जून 2010
स्वीकारोक्ती
लघुकथा
स्वीकारोक्ती
एक शहर के गधों ने अपने धोबी एवं बोझा ढुलवाने वाले मालिकों के खिलाफ आपातकालीन बैठक शहर के बाहर वाले मैदान पर बुलाई!संचालन एक बुजुर्ग गधे को सौंपा गया!सबसे पहले गधा यूनियन के सेक्रेटरी ने अपनी बात शुरू की ''आदरणीय गधाधिराज महोदय,सर्वप्रथम मैं आप का ध्यान हम गधों की मार्मिक स्थिति की और केन्द्रित करने की अनुमति चाहता हूँ!महोदय,ये मनुष्य जाति बहुत ही अहसान्फरोश कौम है!हमें निरा मूर्ख समझती है.दिन भर बोझा ढोते हैं तब कहीं भोजन मिलता है ऊपर से हम पर दुनियां भर के लतीफे बनाये जाते हैं.ये दम्भी मनुष्य किसी मूर्ख को मूर्ख न कहकर हमारे नाम से ही संबोधित करता है!हम पर तमाम व्यंग लिखे जाते हैं कॉमेडी नाटक लिखे और खेले जाते हैं.आखिर कब तक हम अपमान का घूंट यूँ ही पीते रहेंगे?बुजुर्गवार का खून खौल गया बोले ""हमें इस मनुष्य नामक प्राणी को सबक सिखाना ही पड़ेगा ....काफी विचार विमर्श के बाद तय हुआ कि शहर भर के गधे यहाँ से भाग कर (जिसे गधा समूह द्वारा पलायन का नाम दिया गया )पास के जंगल मे चले जायेंगे बाद की रणनीति वहीं पर तय की जायेगी!
जंगल मे पहुंचकर सभी बहुत थक गए थे थोडा रेस्ट किया !एक दूसरे को देखकर खूब हँसते रहे कुछ देर! एक बोला मस्त मज़ा आ गया यार !कैसा हमें मूर्ख कहते थे न सोचते थे कि हम उन से डरते हैं अब मज़ा आएगा!भोजन की समस्या पर विचार करने के बाद सलाह करके सब निकट के खेत मे घुस गए!खेत का मालिक सीधा सदा था निश्चिन्त होकर घर आराम करने गया हुआ था!सभीने खूब छककर हरी हरी घांस खाई! जैसे ही किसान आता दिखा सब भाग खड़े हुए!किसान बड़ा दुखी हुआ!अब तो किसान के लिए ये रोज़ की समस्या ही हो गयी!और गधों की टोली तंदुरुस्त !हारकर उसने अपना खेत बिल्डर को बेच दिया!दुसरे दिन भोजन के समय जब सारे गधे मस्ताते हुए खेत पर गए तो उन्होंने देखा कि वहां तो खेत है ही नहीं!कुछ मनुष्य खड़े हुए हैं और बुल्डोसर चलाया जा रहा है!सबके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गयी!आसपास भी कोई खेत नहीं था भूख के मारे जान अलग निकली जा रही थी!एक बोला''दिखा दिया न आदमी ने अपना कमीनापन? मै तो पहले ही मना कर रहा था पर तब तो ''यूनिटी''की कसमें भकोसी जा रही थीं!अब मरो भूखे ""वो रुंआसा हो गया बुजुर्गवार ने सांत्वना दी!सब झाड़ के पीछे छिपकर आदमियों की कार्यवाही देखने लगे !तभी उन्होंने जो देखा उस पर खुद ही विशवास नहीं हुआ उन्हें !कुछ पैदल और कुछ गाडी मै जुटे गधे ईंटें और बजरी लादकर चले आ रहे थे!एक बोला''अरे हम तो सब यहाँ आ गए थे ये कहाँ से आ गए?सामान उतारकर उन गधों के सामने हरी घास डाल दी गई जिसे देखकर सबके मुह मै लार आने लगी!एक दुसरे की तरफ देखकर बोले ""साले दगाबाज़ ....स्वाभिमान नाम की तो चीज़ ही नहीं है इनमे!''तभी उन्होंने सुना कार मै बैठे बिल्डर से मजदूर हाथ जोड़कर कह रहा था ''का करें साब पेट्रोल इतेक महंगा हो गया है कि मोटर ला नहीं पाए गधा भे जाने कहाँ चले गए इतेक ही बचे हैं ....वो पूरा वाकया बोल पाता इससे पहले ही सारे के सारे उग्रवादी गधे सर झुकाए एक दुसरे को ठेलते हुए मजदूर के सामने आकार खड़े हो गए !मानो कह रहे हों ''हमें माफ़ कर दीजिये आपसे कोई नहीं जीत सकता हम वही हैं आप जो समझते हैं
स्वीकारोक्ती
एक शहर के गधों ने अपने धोबी एवं बोझा ढुलवाने वाले मालिकों के खिलाफ आपातकालीन बैठक शहर के बाहर वाले मैदान पर बुलाई!संचालन एक बुजुर्ग गधे को सौंपा गया!सबसे पहले गधा यूनियन के सेक्रेटरी ने अपनी बात शुरू की ''आदरणीय गधाधिराज महोदय,सर्वप्रथम मैं आप का ध्यान हम गधों की मार्मिक स्थिति की और केन्द्रित करने की अनुमति चाहता हूँ!महोदय,ये मनुष्य जाति बहुत ही अहसान्फरोश कौम है!हमें निरा मूर्ख समझती है.दिन भर बोझा ढोते हैं तब कहीं भोजन मिलता है ऊपर से हम पर दुनियां भर के लतीफे बनाये जाते हैं.ये दम्भी मनुष्य किसी मूर्ख को मूर्ख न कहकर हमारे नाम से ही संबोधित करता है!हम पर तमाम व्यंग लिखे जाते हैं कॉमेडी नाटक लिखे और खेले जाते हैं.आखिर कब तक हम अपमान का घूंट यूँ ही पीते रहेंगे?बुजुर्गवार का खून खौल गया बोले ""हमें इस मनुष्य नामक प्राणी को सबक सिखाना ही पड़ेगा ....काफी विचार विमर्श के बाद तय हुआ कि शहर भर के गधे यहाँ से भाग कर (जिसे गधा समूह द्वारा पलायन का नाम दिया गया )पास के जंगल मे चले जायेंगे बाद की रणनीति वहीं पर तय की जायेगी!
जंगल मे पहुंचकर सभी बहुत थक गए थे थोडा रेस्ट किया !एक दूसरे को देखकर खूब हँसते रहे कुछ देर! एक बोला मस्त मज़ा आ गया यार !कैसा हमें मूर्ख कहते थे न सोचते थे कि हम उन से डरते हैं अब मज़ा आएगा!भोजन की समस्या पर विचार करने के बाद सलाह करके सब निकट के खेत मे घुस गए!खेत का मालिक सीधा सदा था निश्चिन्त होकर घर आराम करने गया हुआ था!सभीने खूब छककर हरी हरी घांस खाई! जैसे ही किसान आता दिखा सब भाग खड़े हुए!किसान बड़ा दुखी हुआ!अब तो किसान के लिए ये रोज़ की समस्या ही हो गयी!और गधों की टोली तंदुरुस्त !हारकर उसने अपना खेत बिल्डर को बेच दिया!दुसरे दिन भोजन के समय जब सारे गधे मस्ताते हुए खेत पर गए तो उन्होंने देखा कि वहां तो खेत है ही नहीं!कुछ मनुष्य खड़े हुए हैं और बुल्डोसर चलाया जा रहा है!सबके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गयी!आसपास भी कोई खेत नहीं था भूख के मारे जान अलग निकली जा रही थी!एक बोला''दिखा दिया न आदमी ने अपना कमीनापन? मै तो पहले ही मना कर रहा था पर तब तो ''यूनिटी''की कसमें भकोसी जा रही थीं!अब मरो भूखे ""वो रुंआसा हो गया बुजुर्गवार ने सांत्वना दी!सब झाड़ के पीछे छिपकर आदमियों की कार्यवाही देखने लगे !तभी उन्होंने जो देखा उस पर खुद ही विशवास नहीं हुआ उन्हें !कुछ पैदल और कुछ गाडी मै जुटे गधे ईंटें और बजरी लादकर चले आ रहे थे!एक बोला''अरे हम तो सब यहाँ आ गए थे ये कहाँ से आ गए?सामान उतारकर उन गधों के सामने हरी घास डाल दी गई जिसे देखकर सबके मुह मै लार आने लगी!एक दुसरे की तरफ देखकर बोले ""साले दगाबाज़ ....स्वाभिमान नाम की तो चीज़ ही नहीं है इनमे!''तभी उन्होंने सुना कार मै बैठे बिल्डर से मजदूर हाथ जोड़कर कह रहा था ''का करें साब पेट्रोल इतेक महंगा हो गया है कि मोटर ला नहीं पाए गधा भे जाने कहाँ चले गए इतेक ही बचे हैं ....वो पूरा वाकया बोल पाता इससे पहले ही सारे के सारे उग्रवादी गधे सर झुकाए एक दुसरे को ठेलते हुए मजदूर के सामने आकार खड़े हो गए !मानो कह रहे हों ''हमें माफ़ कर दीजिये आपसे कोई नहीं जीत सकता हम वही हैं आप जो समझते हैं
25 जून 2010
औलाद
छगन लाल उर्फ़ गन्नू गाँव के माध्यम दर्जे के किसान थे!तीन बच्चे बड़ा रमेश मझला महेश और चोटी बेटी लक्ष्मी !महेश और लक्ष्मी पढने मे बचपन से ही काफी तेज पर मंझला बेटा महेश मंद बुद्धि रहा!बड़े बेटे और लक्ष्मी ने जब आठवी कक्षा में राज्य भर मे टॉप किया तो गाँव भर का नाम ऊँचा हो गया!लड्डू बंटे! अखबार मे छगनलाल और पत्नी सोमा देवी की तस्वीर भी छपी!तीन चार दिनों तक घर मे आने जाने वालों का ताँता लगा रहा!गन्नू और सोमा देवी सातवें आसमान पर!फिर दोनों बच्चे सरकारी छात्रवृत्ति पर पढ ने शहर के नामी स्कूल मे दाखिल हो गए !गन्नू की इज्जत गाँव भर मे अचानक बढ़ गयी!महेश बहुत भोला और अनपढ़ रह गया था अतः उसे पिता के साथ खेती मे हाथ बंटाना पड़ता था!गाँव की ही एक गरीब घर की लड़की से उसका ब्याह कर दिया गया!! छुट्टियों मे बड़ा बेटा रमेश और बेटी लक्ष्मी होस्टल से घर आते तो उनका खूब सत्कार होता!माँ सोमादेवी होस्टल वापस जाते वक़्त दोनों के साथ घर के घी के लड्डू गुझिया आचार वगेरह बांध देती !
समय बीतता गया!बेटी डॉक्टर और बेटा इंजीनिअर बन गया!फिर से गाँव मे खुशियाँ मनाई गईं!बेटी जब डाक्टर बनकर पहली बार गाँव ई तो गाँव के लोगों और सरपंचजी ने गाँव मे अस्पताल खोलने की इच्छा जताई तब उसने कहा की वो शहर के ही एक डॉक्टर से शादी कर रही है वहीं रहेगी और चली गयी!बड़े बेटे को छगन ने साफ़ हिदायत दे दी थी की यदि तुमने भी अपनी पसंद की लडकी से ब्याह किया तो बिटिया की तरह तुम्हारे लिए भी इस घर के दरवज्जे सदा के लिए बंद हो जायेंगे और जब बड़े बेटे रमेश ने भी ने शहर मे अपने लिए लडकी पसंद करली और पिता को सूचित किया व् समझाने की कोशिश की तो उन्होंने कहा की आज से कभी मुह मती दिखाना हम डोकर डोकरी को !पिता छगनलाल ने साफ़ कर दिया की अब उनका बेटा सिर्फ महेश है वो उसी के साथ रहेंगे!दिन बीतते गए...छगनलाल के सपने ध्वस्त हो गए थे तनाव बर्दाश्त न कर सके और खटिया पकड़ ली!किसानी भी मद्दी होने लगी!महेश के भी दो बच्चे हो गए परिवार चलना मुश्किल हो गया!खटिया पर पड़े पड़े छगनलाल बेटे रमेश को खूब भला बुरा कहते और दुखी होते रहते !घर बाहर के लोग खूब समझाने की नाकाम कोशिश करते!माँ सोमा भी सूखके कांटा हो गई!तभी सरपंचजी ने पंचायत बुलाई और कहा की शहर के कुछ बिल्डर गाँव की जमीन खरीदना चाहते हैं जो लोग बेचना चाहें बेच दें!ज्यादातर लोगों ने मना कर दिया!पहले तो छगना ने भी न कर दी पर घर की हालत देखकर जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा बचाकर बाकी का बड़ा हिस्सा बेच दिया!सोमा खूब रोई बोली""ऐसे व्बाप दादन की जायदाद कोई बेचता है क्या""पर छगन ने एक ने सुनी!बहू लीला ने भी पूछ बैठी दद्दा अब एक कमरा मे कैसे रहेंगे सब लोग?सब तो बेच दियो""तो उदास होकर छगना ने कहा ''अरे पर ज़िंदा रहने के लिए भी तो पैसा चाहिए"एक छोटी मोटी दुकान डाल देंगे परचून की हम दोनों आदमी तो है ही कितने दिन के''बहु चुप हो गई
युद्ध स्तर पर काम शुरू हो गया.महीने भर मे फ्लैट तनने लगे!छगन अपने आँगन की झोलदार खटिया पे पड़ा पड़ा बिल्डिंग बनती देखता रहता...बिकुल उदास और खीझ से भरा!छह आठ महीने मे चार मंजिला ईमारत बनकर तैयार हो गई!वो उदघाटन का दिन था!बड़ी बड़ी करों की लम्बी कतारें लगी हुई थी!पुरी बिल्डिंग लाइटों और पन्नियों से सजाई गई थी!नियत समय पर एक बड़ी कार आकर रुकी बिल्डिंग के आगे !लोगों ने उन्हें फूलों का गुलदस्ता दिया!पति पत्नी को घेरके सब खड़े हो गए.!पंडित ने मंत्रोच्चार शुरू कर दिए!अचानक आगंतुक पति पत्नी छगन लाल के घर के सामने जाकर रुक गए!कुंडी खटखटाई...महेश बाहर निकला!जब तक वो कुछ पूछता आगंतुक घर के अन्दर चले गए पत्नी सहित!दुर्बल कायी छगनलाल घबराकर खटिया पर बैठ गए!घर लोगों से भरने लगा!आगंतुक के बॉडी गार्ड उनको बाहर ठेलने का असफल प्रयास करते रहे !आगंतुक ने काला चश्मा उतार कर गीली ऑंखें रुमाल से पोंछते कहा दद्दा उठो ...अपने घर चलो !
समय बीतता गया!बेटी डॉक्टर और बेटा इंजीनिअर बन गया!फिर से गाँव मे खुशियाँ मनाई गईं!बेटी जब डाक्टर बनकर पहली बार गाँव ई तो गाँव के लोगों और सरपंचजी ने गाँव मे अस्पताल खोलने की इच्छा जताई तब उसने कहा की वो शहर के ही एक डॉक्टर से शादी कर रही है वहीं रहेगी और चली गयी!बड़े बेटे को छगन ने साफ़ हिदायत दे दी थी की यदि तुमने भी अपनी पसंद की लडकी से ब्याह किया तो बिटिया की तरह तुम्हारे लिए भी इस घर के दरवज्जे सदा के लिए बंद हो जायेंगे और जब बड़े बेटे रमेश ने भी ने शहर मे अपने लिए लडकी पसंद करली और पिता को सूचित किया व् समझाने की कोशिश की तो उन्होंने कहा की आज से कभी मुह मती दिखाना हम डोकर डोकरी को !पिता छगनलाल ने साफ़ कर दिया की अब उनका बेटा सिर्फ महेश है वो उसी के साथ रहेंगे!दिन बीतते गए...छगनलाल के सपने ध्वस्त हो गए थे तनाव बर्दाश्त न कर सके और खटिया पकड़ ली!किसानी भी मद्दी होने लगी!महेश के भी दो बच्चे हो गए परिवार चलना मुश्किल हो गया!खटिया पर पड़े पड़े छगनलाल बेटे रमेश को खूब भला बुरा कहते और दुखी होते रहते !घर बाहर के लोग खूब समझाने की नाकाम कोशिश करते!माँ सोमा भी सूखके कांटा हो गई!तभी सरपंचजी ने पंचायत बुलाई और कहा की शहर के कुछ बिल्डर गाँव की जमीन खरीदना चाहते हैं जो लोग बेचना चाहें बेच दें!ज्यादातर लोगों ने मना कर दिया!पहले तो छगना ने भी न कर दी पर घर की हालत देखकर जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा बचाकर बाकी का बड़ा हिस्सा बेच दिया!सोमा खूब रोई बोली""ऐसे व्बाप दादन की जायदाद कोई बेचता है क्या""पर छगन ने एक ने सुनी!बहू लीला ने भी पूछ बैठी दद्दा अब एक कमरा मे कैसे रहेंगे सब लोग?सब तो बेच दियो""तो उदास होकर छगना ने कहा ''अरे पर ज़िंदा रहने के लिए भी तो पैसा चाहिए"एक छोटी मोटी दुकान डाल देंगे परचून की हम दोनों आदमी तो है ही कितने दिन के''बहु चुप हो गई
युद्ध स्तर पर काम शुरू हो गया.महीने भर मे फ्लैट तनने लगे!छगन अपने आँगन की झोलदार खटिया पे पड़ा पड़ा बिल्डिंग बनती देखता रहता...बिकुल उदास और खीझ से भरा!छह आठ महीने मे चार मंजिला ईमारत बनकर तैयार हो गई!वो उदघाटन का दिन था!बड़ी बड़ी करों की लम्बी कतारें लगी हुई थी!पुरी बिल्डिंग लाइटों और पन्नियों से सजाई गई थी!नियत समय पर एक बड़ी कार आकर रुकी बिल्डिंग के आगे !लोगों ने उन्हें फूलों का गुलदस्ता दिया!पति पत्नी को घेरके सब खड़े हो गए.!पंडित ने मंत्रोच्चार शुरू कर दिए!अचानक आगंतुक पति पत्नी छगन लाल के घर के सामने जाकर रुक गए!कुंडी खटखटाई...महेश बाहर निकला!जब तक वो कुछ पूछता आगंतुक घर के अन्दर चले गए पत्नी सहित!दुर्बल कायी छगनलाल घबराकर खटिया पर बैठ गए!घर लोगों से भरने लगा!आगंतुक के बॉडी गार्ड उनको बाहर ठेलने का असफल प्रयास करते रहे !आगंतुक ने काला चश्मा उतार कर गीली ऑंखें रुमाल से पोंछते कहा दद्दा उठो ...अपने घर चलो !
23 जून 2010
बेटियां
फूल की मुस्कान सी होती हैं बेटियां,
इक मकान को घर करती हैं बेटियां
घर के भले ही नासमझ भोली कहें उनको
पर पढो तो इक किताब होती हैं बेटियां
घर की हे वो रौनक नाजों से है पली
माता पिता की लाडली वो नन्ही सी कली
बढ़ती ही जो जाये है मौसम के संग में
पींगें बढ़ाती हुई vo नटखट सी बेटियां
ऊँचे पदों पे वो आसीन हैं
यादों से घर की उदासीन हैं
आती जो घर पे वो दो चार दिन
कर जातीं तरोताजा माहौल बेटियां
जाना है उनको इक दिन इस घर को छोड़कर
अपनी जड़ें समेटकर और मन को मारकर
यादों को मायके की इक पोटली बना
घर के किसी कोने मैं दबा जाती हैं बेटियां
बेटा तो है चिराग करने को रोशनी
दस्तूर को निभाती जाती हैं बेटियां
इक मकान को घर करती हैं बेटियां
घर के भले ही नासमझ भोली कहें उनको
पर पढो तो इक किताब होती हैं बेटियां
घर की हे वो रौनक नाजों से है पली
माता पिता की लाडली वो नन्ही सी कली
बढ़ती ही जो जाये है मौसम के संग में
पींगें बढ़ाती हुई vo नटखट सी बेटियां
ऊँचे पदों पे वो आसीन हैं
यादों से घर की उदासीन हैं
आती जो घर पे वो दो चार दिन
कर जातीं तरोताजा माहौल बेटियां
जाना है उनको इक दिन इस घर को छोड़कर
अपनी जड़ें समेटकर और मन को मारकर
यादों को मायके की इक पोटली बना
घर के किसी कोने मैं दबा जाती हैं बेटियां
बेटा तो है चिराग करने को रोशनी
दस्तूर को निभाती जाती हैं बेटियां
माँ
अवतरण के बाद अपनी नन्ही आँखें खोल
जब देखता है माँ को पहली बार और
अपने छोटे छोटे सुकोमल हाथ पैरों से
ठेलता है माँ के पेट को
रोता है उससे चिपक तो
उस वक़्त दुनियां की सबसे किस्मत वाली
लगता है उसे, कि वो है
तमाम सुख सुविधाओं के बीच पाले या फिर
गुदड़ी की शोभा हो,वो तो
समझता है माँ को ही अपना
भगवान्,भूखा तो माँ प्यासा तो माँ
खुश तो माँ
दरद तो भी वही
माँ कहे आंटी को गाना सुनाओ
तो वो शुरू
आल इस वेळ पर नाचो
तो जैसे भर जाती है उसमे चाभी
गर्व से सातवें आसमान पर होती वो उसे
उंगली पकड़ ले जाती है
स्कूल जब डिब्बा बोतल पेन पेन्सिल के
साथ मे अपने तमाम आशीर्वाद और शुभकामनायें भी
सहेजकर रख देती है बस्ते मे
माथे के सिरे पर बैठा देती है
एक काजल के टीके का पहरेदार
बुरी नज़र को डपटने के लिए
स्कूल से छोड़कर घर आते वक़्त
सुखद भविष्य की निश्चिन्तता के साथ
सपनों की भीड़ से घिरी अकेली
माथे का पसीना पोंछती
मुस्कुराती'लौटती है घर जहाँ प्रतीक्षा कर रही होती
तमाम जिम्मेदारियां घर भर की
कमर मे ठुन्सके पल्लू जुट जाती
रोज़ की किल किल मे
देर से नाश्ता देने की पति की फटकार,हो कि
सास के सुबह की तफरी के बहाने पर
उलाहनों पगे भाषण सब मंजूर है उसे
लाडले की कीमत पर
जवान होते जाते सपने उसके भी
बेटे के साथ
पर वही बेटा जब माँ की किसी समझाइश पर
कहता झिड़ककर कि ''माँ तुम नहीं समझतीं
कुछ ,ये नया जमाना है या फिर
अपने बेटे की बहु जिसका चेहरा उसकी आँखों मे
तबसे पनप रहा है जब वो
पैदा हुआ था ,अपने पति को
माँ के आँचल से जुदा कर ले जाती है बेटे को
उससे बहुत दूर और बेटा कहता कि
ऐसा ही होता है माँ ये तो समय का तकाजा है
तो वो समझ नहीं पाती इसका अर्थ कि
क्या नए समय के साथ माँ का दिल और सपने भी बदल दिए जाने चाहिए?
काश ज़माने के साथ साथ माँ का दिल भी बदलता जाता
तो सपनों को ध्वस्त होने की त्रासदी तो नहीं झेलनी पड़ती?
अब वो खाली है बिलकुल न स्कूल का डिब्बे का झंझट
न बस के लिए भागना न घरवालों की उलाहना
बस एक खालीपन सा बैठ गया है मन के किसी कोने में दुपककर
जिसे याद से भरने का उपक्रम करती रहती है दिन भर
झरते रहते हैं आँखों से
आशीर्वाद के बोल और
भीगती रहता है आँचल आंसुओं से
जब देखता है माँ को पहली बार और
अपने छोटे छोटे सुकोमल हाथ पैरों से
ठेलता है माँ के पेट को
रोता है उससे चिपक तो
उस वक़्त दुनियां की सबसे किस्मत वाली
लगता है उसे, कि वो है
तमाम सुख सुविधाओं के बीच पाले या फिर
गुदड़ी की शोभा हो,वो तो
समझता है माँ को ही अपना
भगवान्,भूखा तो माँ प्यासा तो माँ
खुश तो माँ
दरद तो भी वही
माँ कहे आंटी को गाना सुनाओ
तो वो शुरू
आल इस वेळ पर नाचो
तो जैसे भर जाती है उसमे चाभी
गर्व से सातवें आसमान पर होती वो उसे
उंगली पकड़ ले जाती है
स्कूल जब डिब्बा बोतल पेन पेन्सिल के
साथ मे अपने तमाम आशीर्वाद और शुभकामनायें भी
सहेजकर रख देती है बस्ते मे
माथे के सिरे पर बैठा देती है
एक काजल के टीके का पहरेदार
बुरी नज़र को डपटने के लिए
स्कूल से छोड़कर घर आते वक़्त
सुखद भविष्य की निश्चिन्तता के साथ
सपनों की भीड़ से घिरी अकेली
माथे का पसीना पोंछती
मुस्कुराती'लौटती है घर जहाँ प्रतीक्षा कर रही होती
तमाम जिम्मेदारियां घर भर की
कमर मे ठुन्सके पल्लू जुट जाती
रोज़ की किल किल मे
देर से नाश्ता देने की पति की फटकार,हो कि
सास के सुबह की तफरी के बहाने पर
उलाहनों पगे भाषण सब मंजूर है उसे
लाडले की कीमत पर
जवान होते जाते सपने उसके भी
बेटे के साथ
पर वही बेटा जब माँ की किसी समझाइश पर
कहता झिड़ककर कि ''माँ तुम नहीं समझतीं
कुछ ,ये नया जमाना है या फिर
अपने बेटे की बहु जिसका चेहरा उसकी आँखों मे
तबसे पनप रहा है जब वो
पैदा हुआ था ,अपने पति को
माँ के आँचल से जुदा कर ले जाती है बेटे को
उससे बहुत दूर और बेटा कहता कि
ऐसा ही होता है माँ ये तो समय का तकाजा है
तो वो समझ नहीं पाती इसका अर्थ कि
क्या नए समय के साथ माँ का दिल और सपने भी बदल दिए जाने चाहिए?
काश ज़माने के साथ साथ माँ का दिल भी बदलता जाता
तो सपनों को ध्वस्त होने की त्रासदी तो नहीं झेलनी पड़ती?
अब वो खाली है बिलकुल न स्कूल का डिब्बे का झंझट
न बस के लिए भागना न घरवालों की उलाहना
बस एक खालीपन सा बैठ गया है मन के किसी कोने में दुपककर
जिसे याद से भरने का उपक्रम करती रहती है दिन भर
झरते रहते हैं आँखों से
आशीर्वाद के बोल और
भीगती रहता है आँचल आंसुओं से
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