2 मई 2012

यात्रा


अतीत छोड़ता है कुछ चिन्ह अपने होने के
शिशु की आँखों की पारदर्शी झील के नीचे
पहियों की रफ़्तार नापती है वक़्त की धूल
दूर तक......गुबारों के पार  |    
एक किस्सागोई  ,खंडहरों की कालिख ,
धरती की परतों और
समुद्र में डूबे हुए ज़हाजों के अवशेषों में
भरती है बुजुर्ग हुंकारें|  
अँधेरे की सुरंग में धूप की लकीर
लिखती है कुछ साँसें ,
जमती जाती है बर्फ की परतें
सोते जाते हैं जिनके तले
सपने पिघलते हुए  
यात्रा , लिखती है अपनी थकान
 पसीने के बिंदुओं को जोड़कर
गढती हैं अपनी भाषा खुद
चित्र उकेरती है चेहरे पर ताजे जालों का
नित नया घना और घना .....
यूँ खड़े होते जाते हैं
बरगदों के सायेदार जंगल
वक़्त की हथेलियों पर खुद को थामे हुए
 बरगदों की देह
सोखती नहीं सहेजती है अपने अँधेरे
जैसे  ज़मीन
रक्त की बूंदें
भविष्य को गढ़ने ......| 

25 फ़रवरी 2012

मै खड़ी हूँ /
आधुनिकता से दमकती उस नई नवेली बहुमंजिला इमारत के सामने 
जो मेरे बचपन के सपाट मैदान की स्मृति है
बगीचे,तरन-तारण,मॉल/कसीनो 
और इन भव्य दीवारों के बीच टहलती 
सभ्यता नव्यता संस्कार 
ये सब मेरे इतिहास के भविष्य से ताल्लुक  रखते हैं 
पोंछती हूँ अपनी स्मृतियों के धुंधले आईने से 
वक़्त का चेहरा 
तो नज़र आती  हैं वो आकृतियाँ 
जिनके चेहरे अपनी ऑंखें गँवा  चुके हैं 
ठीक वैसे ही जैसे खो दीये थे अपने हाथ 
ताज के कारीगरों ने 
आकृतियाँ....
जिनके स्वप्न धूल से भरे बीहड़ थे 
जहाँ नल कूप धूप में खड़े थे प्यासे 
जीवन  से अघाए किसी संत की मानिंद 
पर रात में तकते थे ये आसमान 
हर कहानी की जड़ के अंधेरों में 
एक चिंगारी सुलगती है नाउम्मीदी की 
सपनों में उरजती  है पर  
फसलें लहलहाती ,
हालाकि ,टिकने को इनके भी कंधे ही हैं 
पर कुदालें चोट के लिए नहीं होतीं 
इनके प्रहार कभी २ सबूत भी होते हैं 
किसी बंजर धरती के 
 वो धरती ,जो जल  के एवज में 
निरस्त कर देती है रक्त का सोखना 
प्रथ्वी  पर खरोंचें हैं अब तक 
घोड़ों के खुरों की आवाजें टकराती है जो 
दीवारों के बीच के सन्नाटों में 
गोया धडकनें हों ये सच और झूठ के बीच की 
सुख और संताप के दरमियाना 
एक तरलता होती है पारे की सी
हम भले ही भुला दे पर  
 इमारतों को याद होता है अपना अतीत 
बिलकुल वैसे ही जैसे 
वस्त्र की धडकनों में बजता है कबीर 
और काँटों से बचाकर 
ले जाते हैं रैदास |





26 जनवरी 2012

 15 जनवरी 2012 -दैनिक भास्कर ''रसरंग'' में कहानी ''अफ़सोस'' प्रकाशित|

24 जनवरी 2012

''वागर्थ ''के जनवरी अंक में कहानी ''उड़ानों के सारांश '' प्रकाशित |