3 अप्रैल 2012
21 मार्च 2012
25 फ़रवरी 2012
मै खड़ी हूँ /
आधुनिकता से दमकती उस नई नवेली बहुमंजिला इमारत के सामने
जो मेरे बचपन के सपाट मैदान की स्मृति है
बगीचे,तरन-तारण,मॉल/कसीनो
और इन भव्य दीवारों के बीच टहलती
सभ्यता नव्यता संस्कार
ये सब मेरे इतिहास के भविष्य से ताल्लुक रखते हैं
पोंछती हूँ अपनी स्मृतियों के धुंधले आईने से
वक़्त का चेहरा
तो नज़र आती हैं वो आकृतियाँ
जिनके चेहरे अपनी ऑंखें गँवा चुके हैं
ठीक वैसे ही जैसे खो दीये थे अपने हाथ
ताज के कारीगरों ने
आकृतियाँ....
जिनके स्वप्न धूल से भरे बीहड़ थे
जहाँ नल कूप धूप में खड़े थे प्यासे
जीवन से अघाए किसी संत की मानिंद
पर रात में तकते थे ये आसमान
हर कहानी की जड़ के अंधेरों में
एक चिंगारी सुलगती है नाउम्मीदी की
सपनों में उरजती है पर
फसलें लहलहाती ,
हालाकि ,टिकने को इनके भी कंधे ही हैं
पर कुदालें चोट के लिए नहीं होतीं
इनके प्रहार कभी २ सबूत भी होते हैं
किसी बंजर धरती के
वो धरती ,जो जल के एवज में
निरस्त कर देती है रक्त का सोखना
प्रथ्वी पर खरोंचें हैं अब तक
घोड़ों के खुरों की आवाजें टकराती है जो
दीवारों के बीच के सन्नाटों में
गोया धडकनें हों ये सच और झूठ के बीच की
सुख और संताप के दरमियाना
एक तरलता होती है पारे की सी
हम भले ही भुला दे पर
इमारतों को याद होता है अपना अतीत
बिलकुल वैसे ही जैसे
वस्त्र की धडकनों में बजता है कबीर
और काँटों से बचाकर
ले जाते हैं रैदास |
आधुनिकता से दमकती उस नई नवेली बहुमंजिला इमारत के सामने
जो मेरे बचपन के सपाट मैदान की स्मृति है
बगीचे,तरन-तारण,मॉल/कसीनो
और इन भव्य दीवारों के बीच टहलती
सभ्यता नव्यता संस्कार
ये सब मेरे इतिहास के भविष्य से ताल्लुक रखते हैं
पोंछती हूँ अपनी स्मृतियों के धुंधले आईने से
वक़्त का चेहरा
तो नज़र आती हैं वो आकृतियाँ
जिनके चेहरे अपनी ऑंखें गँवा चुके हैं
ठीक वैसे ही जैसे खो दीये थे अपने हाथ
ताज के कारीगरों ने
आकृतियाँ....
जिनके स्वप्न धूल से भरे बीहड़ थे
जहाँ नल कूप धूप में खड़े थे प्यासे
जीवन से अघाए किसी संत की मानिंद
पर रात में तकते थे ये आसमान
हर कहानी की जड़ के अंधेरों में
एक चिंगारी सुलगती है नाउम्मीदी की
सपनों में उरजती है पर
फसलें लहलहाती ,
हालाकि ,टिकने को इनके भी कंधे ही हैं
पर कुदालें चोट के लिए नहीं होतीं
इनके प्रहार कभी २ सबूत भी होते हैं
किसी बंजर धरती के
वो धरती ,जो जल के एवज में
निरस्त कर देती है रक्त का सोखना
प्रथ्वी पर खरोंचें हैं अब तक
घोड़ों के खुरों की आवाजें टकराती है जो
दीवारों के बीच के सन्नाटों में
गोया धडकनें हों ये सच और झूठ के बीच की
सुख और संताप के दरमियाना
एक तरलता होती है पारे की सी
हम भले ही भुला दे पर
इमारतों को याद होता है अपना अतीत
बिलकुल वैसे ही जैसे
वस्त्र की धडकनों में बजता है कबीर
और काँटों से बचाकर
ले जाते हैं रैदास |
8 जनवरी 2012
शेष दुःख
कुछ भ्रम देर तक पीछा करते हैं नींद का
सिरहाने की हदें भिगो देती हैं चंद किताबें
शब्द खोदने लगते हैं सपनों की ज़मीन
और वक़्त अचानक पलट कर देखने लगता
धरती का वो आखिरी पेड़
जिसके झुरमुट में अटकी है कोई
खुशी से लथपथ फटी चिथड़ी स्मृति
किसी सूखे पत्ते की ओट में , हवा के डर से
थकी,उदास और सहमी सी
करवटें भींग जाती है विषाद से
घूमने लगते हैं घड़ी के कांटे उलटे
रातें बदलती हैं तेज़ी से पुराने अँधेरे
देखती है कोई कोफ़्त तब
हरे भरे पेड़ को वापस ठूंठ हो जाते हुए
या नदी पर खुश्क दरारों की तडकन
सोचती है पीठ किसी क्षत-विक्षत सपने का उघडा हुआ ज़ख्म
सुदूर एक घुटी सी चीख टीसती है
कौंधने के पीड़ा-सुख तक चुपचाप,बेआवाज़
किसी डरे हुए पक्षी से फडफडाते हैं कलेंडर के पन्ने
छिपाते हुए खुद से अपनी तारीखों के अवसाद
आंधी में सूखे पत्तों से उड़ते हुए वो मुलायम स्पर्श
फिर ओढ़ लेते हैं कोई हंसी,दुःख,उदासी या मलाल
रात....उम्मीद का पीछा करते शब्दों की निशानदेही पर
पहुँच जाती हैं उस नदी तक
जहाँ चांद की छाँह में स्मृतियाँ निचोड़ रही होती हैं
अपने शेष दुःख
28 दिसंबर 2011
तन्हाई
तन्हाई ने लिखा मौन /और मै भाषा हो गई
पढ़ा जिसे मेरी आँखों ने
आस्मां ,नदी ,पेड़ और जंगल की
निस्पंद देह पर
छुआ गया उँगलियों की ज़ुबान
पीले निरीह ताड़ पत्रों पर
भाषा का ना कोई सुख होता है ना दुःख
ना निराकार ना साकार
वो बस जीती है एक सीप में
बरसों बरस खुद को भूल जाते हुए
समुद्र का एक हिस्सा बनकर
जिसे फेक दिया गया हो
नकार देने की हद तक हाशियों पर |
समुद्र में पड़ती चाँद की परछाईं सी
कांपती है जो अपने ही भीतर
धूप से ही नहीं ,पिघलती हैं चट्टानें
बारिश और चांदनी में भी
रेत को भिगोती लहरों का संगीत
बारिश की बूंदों और पत्तों की लयबद्ध सिहरन
या हो प्यार ही ,
शब्दों की निरस्ती की छुअन है
मेघ गर्जन या बारिश की बूँदें
बादलों के तिलस्मी रूप
शब्दों की मोहताजी से पीठ है जिनकी
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