19 मई 2013

जैसे उडी जहाज को पंछी ...


कुछ देर वो लोग उस आलीशान होटल के कमरे में अंगरेजी में बातें करते रहे और बातें करते हुए ही कमरे से जुड़े शानदार छज्जे में जा खड़े हुए |मै अपने चारों और विस्फरित नेत्रों से देख रहा था ‘’क्या ये कमरा भी इसी प्रथ्वी का कोई हिस्सा होगा ?’’मैंने अपने अनदेखे सपनों की तरफ एक प्रश्न उछाला (जो लौटकर फिर मेरे जेहन में आ गिरा )|अद्भुत अभूतपूर्व द्रश्य क्रमशः प्रकट हो रहे थे उसी क्रम में अब एक होटल कर्मचारी जिसकी सफ़ेद चमचमाती वर्दी मेरे मैले कुचैले कपड़ों से कई गुना व्यवस्थित और साफ़ सुथरी थी मेरे सामने कुछ इस्त्री किये तहशुदा कपडे लेकर खड़ा था बिना कुछ बोले बुत की तरह |मै मन ही मन खुद को अब तक इतना असभ्य और गया गुजरा मान चुका था कि अब उसकी खाली नज़रें और सभी प्रशन मेरे सामने निरीह हाथ बांधे खड़े थे |तब मुझे पहली बार ये महसूस हुआ कि जिस जगह पर मै लाया गया हूँ वहां शब्द सुविधाओं से कम पेश किये जाते हैं |(उपन्यास अंश) 

17 मई 2013

कहो तथागत


मै महामाया हूँ ,मै ही गौतमी,यशोधरा ,सुजाता,विशाखा ,क्षेमी और क्रशा हूँ | लेकिन ज़न्म से म्रत्यु तक अंततः मात्र एक स्त्री ...नाम तो देह के होते हैं वर्ण के नहीं ..|ज़र्ज़र देह,शव,दरिद्रता ,देखकर तुम्हे दुःख हुआ था और इनसे मुक्ति का मार्ग खोजने तुम निकल पड़े थे आधी रात में सबको सोया छोड़कर वन में |अपने कर्तव्यों को द्रष्टिपरे कर जीवन म्रत्यु का रहस्य सुलझाने और ‘अपनों’ के स्वप्नों की तमाम आशाओं  को ध्वस्त छिन्न भिन्न करके | तुमने एक व्यक्ति को देखा था जिसकी कमर झुक चुकी थी उसकी देह ज़र्ज़र हो चुकी थी जो ठीक से सांस भी नहीं ले पा रहा था ,तब तुमने अपने सारथि सौम्य से पूछा था और जब सौम्य ने बताया था कि ये एक वृद्ध पुरुष है सभी को ऐसा ही होना पड़ता है ये नियति है जीव की तब तुम स्तब्ध रह गए थे ,और फिर उसके बाद म्रत्यु,जीवन ,आयु के सत्य ,इन सबसे तुम्हारे मन में एक विरक्ति की भावना पैदा हुई थी और तुमने गृह त्याग कर दिया था |शरीर और ‘’आने जाने ‘ से मुक्ति का मार्ग खोजने निकल पड़े थे सत्य की खोज में |
 आज मै तुमसे पूछती हूँ तथागत क्या सचमुच तुम खोज पाए मुक्ति का मार्ग?यदि हाँ ,तो क्या हर मुक्ति का रास्ता विरक्ति से ही होकर गुजरता है ?और यदि ये भी सत्य है तो तो स्त्री को मुक्ति की अभिलाषा होना आपकी नियमावलियों के खिलाफ क्यूँ था?
क्या म्रत्यु और जीवन मरण के रहस्यों को वस्तुतः सुलझा पाए?क्या तुमने बयासी वर्ष की आयु तक वही सब नहीं भोगा जिसके लिए तुमने गृह त्याग कर प्रवजना ली थी ?...कि तुम्हारी सुदर्शन देह के भीतर भी एक मन तो था ही तुमने महसूस तो किया ही होगा उस अंतर्द्वंद को ...मुक्ति मार्ग और आकर्षण के मध्य के उस बहुत महीन पारदर्शी झीने आवरण को ?बावजूद ह्रदय परिवर्तन के इस मुक्ति यात्रा के मार्ग में तुम्हे कभी स्मृति आई तो आई होगी उन स्त्रियों की जो तुम्हारे जीवन में एक महत्वपूर्ण घटना बनकर आईं और जिन्हें तुमने कभी अपनी मुक्ति अभियान के मार्ग में व्यवधान मानकर और कभी उन्हें महान बनाकर दूर कर दिया ?लेकिन इस दीर्घ जीवन में क्या तुम्हारे उस विरक्त और सन्यासी जीवन के विशाल आँगन में कोई एक अन्धेरा कोना इन्हीं स्त्रियों से ‘कलुषित’ नहीं रहा ?
मै तुम्हारी जीवनदायिनी ,तुम्हारी माँ महामाया.... जिसकी गोद में तुमने ऑंखें खोलीं |लेकिन सिर्फ सात दिनों के बाद मेरा तुम्हारा नाता टूट गया तब जब तुम माँ को सिर्फ दुनियां की इकलौती उस गर्माहट से पहचानते थे जो किसी भी शिशु के लिए पूरी प्रथ्वी होती है तुम्हारे शिशु रुदन और द्रष्टि ने भी तो ढूंढा होगा मुझे चारों ओर ...और निराश होकर तुमने अपनी ऑंखें झपकी होंगी उस निराशा को अपनी बरोनियों की ओट में छिपा लिया होगा! उम्र की उस नाज़ुक अवस्था में जब मिलने और खोने के अर्थ से परे उसकी स्मृति उसके अवचेतन में कहीं धंस जाती है |अपनी विमाता गौतमी के सरंक्षण में तुमने गौतम नाम पाया लेकिन तुम्हारी आत्मा कभी मुझे अपनी जन्मदात्री को विस्मृत कर पाई ?
मै यशोधरा ..तुम्हारी ब्याहता पत्नी ...तुम्हारे पुत्र की जननी |क्या कमी थी मेरी पतिव्रता भावना में ,मै बाँझ भी नहीं ना ही दायित्व हीन मै तो अविश्वसनीय भी नहीं फिर अपने सभी स्त्रियोचित उत्तरदायित्व बखूबी पूरे करने के मुझे किस बात की सज़ा दी |उर्मिला,द्रोपदी,कुंती,शकुन्तला,अहिल्या की श्रंखला में तुमने मुझे भी तो एक कड़ी बना दिया और इतिहास पुरुष बन गए ?आखिर क्यूँ ? पुरानों से लेकर राजाओं महाराजाओं  यहाँ तक कि संतों तक ने स्त्रियों की भावना को कुचलकर अपना स्वस्ति का परचम लहराया ...और महापुरुष कहलाये |लेकिन तुम उनसे अलग थे ....क्यूँ की तुम तथागत थे बुद्ध थे पार्थक्य ... तुम्हारी निर्लप्ति को भी मैंने तुम्हारी शिष्या बन शिरोधार्य किया ..लेकिन अंतत मै स्त्री ही तो थी और एक माता भी तो ?
राजकुमार सिद्धार्थ ...जब आप राजमहल से बाहर निकलते थे कुमारियाँ अपनी अट्टालिकाओं पर खडी होकर आपको निहारा करती थीं ,उस दिन जब आप शक्य कुमारों के साथ उद्यान विचरण व् जलक्रीडा कर वापस अपने महल को जा रहे थे तब मै भी अन्य कुमारियों के साथ उसी अट्टालिका पर खडी आपको अपलक निहार रही थी... आसक्त हो गई थी |हाँ मै क्रशा गौतमी ....स्मरण है आपको तथागत ?...अनायास आपकी द्रष्टि मुझ पर पडी थी और आप भी कुछ क्षण मुझे निहारते रहे थे |आप चलते चलते वहीं ठिठक कर खड़े हो गए थे |मै विक्षिप्त सी आपको अपलक निहार रही थी |अनायास आपने अपना मुक्ताहार मेरी और उछाला था मै खुशी से बौरा गई थी |मेरी आँखों में काम वेग उतर आया था ...मै आपके अंक शयन के लिए आतुर हो गई थी मै अट्टालिका से पागलों की तरह दौड़ते हुई नीचे आई थी परन्तु आपने तो मुझे वो माला गुरु स्वरुप भेंट की थी ! क्या
 विरक्ति किसी की आसक्ति के ऊपर ही राज्य करती है?

10 मई 2013

दिनांक -१०-५-२०१३
कल जेट एयरवेज़ की फ्लाईट से सिंगापूर पहुँची |चानी हवाई अड्डे से पंगोल सारा समीन के साथ उनके घर  |नया शानदार फ्लेट आठवीं मंजिल पर खूबसूरती के अलावा  और कुछ नहीं घर में भी और बाहर भी  |दौनों आर्टिस्ट हैं ...बड़े बड़े शीशे पूरे घर में ख़ूबसूरत पेंटिंग्स कम लेकिन शानदार फर्नीचर बहुत करीने और मेहनत से सजाया गया |मैंने पहले भी ये महसूस किया है कि (फ्लाईट से )जैसे जैसे आसमान में रोशनी (धूप) की तीव्रता यानी नीले पटल पर छितराए सफ़ेद बादलों के गुछे कहीं गाढे कहीं इक परतीय जब धुंधलाने लगते हैं और मौसम का मिज़ाज कुछ ढीला होने लगता है ये एक पुख्ता सूचना होती है (प्रकृति प्रदत्त)की अब सिंगापूर आ रहा है |(क्या मौसम भी जानता है कहाँ कैसे उगना है उसे )?खैर सिंगापूर के समयानुसार  यहाँ साढ़े पांच बजे थे | सामान्य चहल पहल,सुकून,कोई हडबडाहट नहीं न चेहरों पर न सडकों पर |सब अपने अपने कामों गतिविधियों में मसरूफ |मुझे यहाँ की ये अदा भाती  है लोग दूसरों से ज्यादा अपनी ज़िंदगी से मतलब रखते हैं और सुख दुःख अपने स्तर पर भोगते हैं |राजनैतिक सामाजिक स्थितियां उनकी दिनचर्या और ज़िंदगी में ज्यादा जगह नहीं घेरतीं |पूरा देश रात में भी रोशनी से सराबोर रहता है |

3 मार्च 2013

साहित्य में जीवन की धड़कन होनी चाहिए


‘’हिन्दी साहित्य की पहली चुनौती है पढ़ना ‘’...किसी ने सही कहा है |गूढार्थ यही कि आज हिन्दी लेखकों में लिखने और उनके ‘’पढ़े जाने ‘’ की जो आतुरता है वो उनके द्वारा अन्य को पढ़े जाने की नहीं ...लिहाजा आज पाठकों से अधिक लेखक ,और उनसे भी ज्यादा अवसर (पुरूस्कार, फेसबुक,विभिन्न आयोजन इत्यादि )उपलब्ध हैं |
(आपके कहेनुसार)''कुछ साहित्यकार भ्रष्टाचार (?) में डूबे नहीं हैं क्यूँ की उन्हें अमर होने की चिंता या हडबडी नहीं है ...(पर कुछ )मठाधीशों की पूंछ पकड़कर साहित्य के भवसागर को पार करने का उपक्रम कर रहे हैं ,राजधानी की हष्ट पुष्ट पत्रिकाएं व् सामर्थ्यवान संपादकों की ‘’फेक्ट्री’’....वगेरह ...विचारणीय होने के बावजूद ये त्रासदी चिंतनीय नहीं कही जा सकती |इस मनोवृत्ति का सम्बन्ध कालगत भी है ..कुछ प्रश्न-
क्या दशकों पूर्व पैदा हुए और साहित्य जगत के उत्कृष्टतम रचनाकारों यथा प्रेमचंद,टेगोर,महादेवी वर्मा,अज्ञेय ,रेणु,शरत चंद ,जयशंकर प्रसाद आदि के काल में तथाकथित जिज्ञासु ,योग्यता से अधिक महत्वा कांक्षी और प्रसिद्धिप्रिय रचनाकार नहीं हुए होंगे ?साहित्य जगत के नक़्शे में कहाँ हैं अब वो?
बावजूद इस सत्य के कि तकनीकी सुविधाएं और बाजारवादी मनोवृत्ति ने पूरे समाज को एक बाज़ार में तब्दील कर दिया है ,लिहाजा कम समय में जल्दी और अधिकाधिक प्राप्त करने की लालसा दोगुनी हो गई है लेकिन एक सत्य ये भी तो है कि इन ‘’महत्वाकांक्षी’’ लेखक /लेखिकाओं में कालांतर में कितनों को प्रेमचंद या महादेवी वर्मा जैसे शताब्दियों तक याद रखा जाएगा?
 दरअसल वास्तविक लेखक चर्चा में आने के लिए किसी के कन्धों पर चढ़कर प्रसिद्धि पाने पर यकीन नहीं करता ये ज़रुरत तो उन लोगों को पड़ती है जिन्हें अपने काबीलियत पर भरोसा नहीं लेकिन प्रसिद्धि की चकाचौंध में रहना चाहते हैं ’’अमर ‘’बने रहने की चाहत एक बचकानी सोच और कोशिश है वस्तुतः साहित्य में जो ‘’अमरता’’ की पदवी पा चुके हैं उन्होंने इस अमरता के लिए कभी कोशिश नहीं की थी |
वास्तविक लेखक किसी भी स्थिति में लेखन करता है इतना ही नहीं उसके लेखन को वैश्विक रूप से उत्क्रश्तता की कोटि में स्वीकृत और सराहा जाता है |उद्देश्यपूर्ण और उत्कृष्ट लेखन किसी भी ‘’जोड़ तोड़ ‘’ की नीतियों का मोहताज़ नहीं होता |गौर तलब है कि लैटिन अमेरिकी देश कोलंबिया में ज़न्मे महान लेखक गेब्रियल गार्सिया मार्खेज़ का विश्व प्रसिद्द उपन्यास ‘’वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सौलीच्युड’’जो  १९६७ में लिखा गया तब उस पर किसी का ध्यान नहीं गया |बाद में इसी उपन्यास को नोबेल पुरूस्कार से नवाज़ा गया | मार्खेज़ जो पत्रकार भी थे ,उन्हें वामपंथी विचारों के कारण अमेरिका और कोलंबिया की सरकारों ने अपने देश में आने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था |ऐसी विपरीत और विकट परिस्थितियों में लेखन करने वाले तमाम लेखक हैं |इतिहास गवाह है कि किसी भी देशी विदेशी कालजयी लेखक का लेखन इस उद्देश्य की पूर्ती (मकसद)नहीं रहा कि उसे लोग सदियों तक जाने ...बल्कि उनका लेखन जीवन के किसी गंभीर दर्शन अथवा किन्ही सामाजिक राजनैतिक त्रासदियों को उजागर करना था | इमरे कर्तेज़ के उपन्यास .’’कैदिश फॉर अ चाइल्ड नौट बौर्न ) में नायक उस अजन्मे बच्चे का पिता बनने से इनकार कर देता है जिसे पैदा होने के बाद नाजियों के अत्याचारों को झेलना पड़े | मानव जीवन की वास्तविकता का ऐसा वर्णन और ये विषय शायद ही किसी पश्चिमी लेखक ने उठाया हो जिसकी तुलना बुद्ध से की जाती है |यदि आपके दुसरे पक्ष पर विचार किया जाये (लेखकीय महत्वाकांक्षाओं और उनकी जोड़ तोड़ की )तो कर्तेज़ का ही उदाहरण फिर देना होगा |उलेखनीय है की विश्व प्रसिद्द उनके उपन्यास ‘’फेटलैस ‘’१९६५ में लिख दिए जाने के बावजूद छपने के लिए उन्हें १० वर्ष का इंतज़ार करना पडा |नोबेल पुरूस्कार विजेता विश्वावा जिम बोर्सका जिन्होंने कहा था ‘’ज़िंदगी राजनीति से अलग होकर नहीं रह सकती फिर भी मै अपनी कविताओं में राजनीति से दूर रहती हूँ ‘’उनकी आरंभिक रचनाएँ पूंजीवादी सभ्यता की विरोधी और मजदूरों के समर्थन की रही हैं |जहाँ तक आलोचना का प्रशन है विश्व का कोई साहित्यकार ऐसा नहीं रहा जिसकी आलोचना न हुई हो |तोलस्ताय को ‘’बहुत नसीहतें देने वाला लेखक ‘’कहा गया तो विश्व प्रसिद्ध लेखक ,नाटककार आयर लेंड के सेम्युअल बेकेट के विश्व प्रसिद्द नाटक ‘’वेटिंग फॉर गोदोत’’के दो नायकों को आलोचकों ने फ़िज़ूल या आवारा कहा जबकि बेकेट के अनुसार वे दौनों उस अनजान ‘’गोदोत’’ की प्रतीक्षा कर रहे हैं जिसके बारे में उन्हें कुछ भी नहीं मालूम ...मूल में यही कि मनुष्य किस प्रकार एक उद्देश्यहीन तरीके से जीवन की यात्रा कर रहा है’’|ऐसे तमाम उदाहरण हैं |
टॉलस्टॉय ने अंतिम दिनों में गोर्की से कहा था ‘’इतना लिखा गया मगर कुछ नहीं हुआ दुनियां पहले की अपेक्षा खराब ही हुई है ....फिर भी ....’’
शोर्ट कट अथवा सांख्य के उद्देश्य से लिखे साहित्य को सफल नहीं कहा जा सकता कुछ समय बाद उसका धूमिल हो जाना निश्चित है..इसके साक्षात उदाहरण आज सामने हैं हमारे ...|
लेखन एक गंभीर और धैर्यशील कर्म है यह कालातीत है |आधुनिक फेंटेसी के जनक फ्रांत्स काफ्का की विख्यात कहानी ‘’मेटामार्फोसिस’’हिटलर के गेस्टापो युग से बहुत पहले लिखी गई थी जिसे आज भी अद्वितीय की श्रेणी में रखा जाता है |इन्हीं के उपन्यास ‘’द कासल’’एक आम आदमी के आत्म संघर्ष की लाज़वाब दास्ताँ ...|साहित्य केवल वर्तमान नहीं है बल्कि अतीत से होते हुए भविष्य तक के द्वार खोलता है ये धैर्य कहाँ है आजके ‘’त्वरित प्राप्त आकांक्षी ‘’ लेखकों में ?
आज लेखक दो प्रकार के हैं एक वो जिन्हें अपनी स्वीकृति का भय हमेशा बना रहता है अतः वो साहित्य  जगत में अपनी उपस्थिति निरंतर किसी ना किसी माध्यम से दर्ज करते (करवाते)रहते हैं| दुसरे किस्म के लेखक अपने लेखन पर तो विशवास करते हैं ,लेकिन ‘’उपस्थिति’’दर्ज करने में संकोच और एक आत्मसंघर्ष से जूझते रहते हैं ...एक स्वयं की प्रतिभा का दिग्दर्शन कर पाने का संघर्ष और दुसरे साहित्य की समकालीन दिखावटी मनोवृत्ति के लेखकों से पिछड़ जाने का भय|’’हिन्दी साहित्य के एक विख्यात लेखक का कहना है ‘’लेखक होने के नाते किसी विशेष सुविधा की मांग नहीं करता ......शायद बोल्ड नहीं हूँ अगर होता तो लिखने की बजाय कुछ और कर रहा होता ‘’
आज साहित्यकार ‘’हार जाने के डर’’से ग्रसित है ,और उसके द्वारा की गई ये तमाम चेष्टाएँ इसी डर का एक नकारात्मक नतीज़ा हैं ...खारिज कर दिए जाने का डर ...|प्रसिद्द साहित्यकार बद्रीनारायण कहते हैं ‘’आज कवी तो बहुत हैं ,लेकिन अच्छा कवी बना रहना एक आत्म संघर्ष है |’’प्रवासी भारतीय साहित्यकार नायपाल कहते हैं कि वे भारतीय अन्धकार से बाहर आकर ही सभ्य हुए हैं |’’कहीं उनकी ‘’असभ्यता’’ का तात्पर्य समकालीन हिन्दुस्तानी साहित्य की इन्हीं मनोवृत्तियों की और इंगित तो नहीं करता ?..क्या वजह है कि वैश्वीकरण के फैलाव और आधुनिकतम संसाधनों के बढ़ने ,सभ्यता और शिक्षा के विकसित होने के बावजूद नवीनता और विचारगत रूप से हम वैसा साहित्य नहीं रच पा रहे हैं जिसकी अपेक्षा की जाती है जहां तक विचारधारा का प्रश्न है विचारधारा ,जीवन द्रष्टि और अनुभवों का विकल्प कभी नहीं हो सकती बावजूद इस सत्य के प्रत्यक्षतः अथवा परोक्ष रूप से हर रचना के मूल में कोई न कोई विचारधारा तो होगी ये हमारे ऊपर है कि ‘’अंधों के हाथी की तर्ज़ पर हम उस लेखक विशेष अथवा रचना विशेष को किस भी विचारधारा से जोड़ दें !लेखकों व् लेखन के संदर्भ में एक और विचारणीय तथ्य यह है जैसा कि सुप्रसिद्ध कवियत्री कात्यायनी कहती हैं कि नवें दशक में और उसके बाद कवियों की एक नई पीढी उभरी जो बहुत संभावनाशील थी लेकिन उसके बाद क्रमशः उनकी रचनाओं में एकरसता ,दुहराव,चौंक चमत्कार,नकली विद्रोही तेवर आदि समाविष्ट हो गए |उनका तात्पर्य शायद अलग अलग विचारधारों और खेमों में बट जाने का लोभ संवरण न कर पाना भी संभावित है |
समय परिवर्तन शील है....इसी के मद्दे नज़र सोच भी सकारात्मक होनी चाहिए |
किसी भी वास्तविक लेखक /कलाकार के लिए साहित्यिक अमरता के बरक्स दैहिक म्रत्यु एक ऐसी घटना है जो अपने अधूरेपन को सम्पूर्ण आस्था और विशवास के साथ नई पीढी के उस सम्पूर्ण बौद्धिक जगत के हवाले करके जाती है जो इसकी वास्तविक उत्तराधिकारी है ...पूछना सिर्फ ये हैं हमें स्वयं से कि क्या हम उन कालजयी लेखकों की इस विरासत का सचमुच और वास्तविक उपियोग कर पा रहे हैं ?

24 फ़रवरी 2013


समुद्र ,अपने समुद्र होने से पहले
रहा होगा एक बहुत विशाल खाई
अँधेरा उकता कर बन गया होगा एक समुद्र
किसी अनजान नदी के साथ
बह आई होंगी कुछ मछलियाँ
मछलियों को देख आ गए होंगे
कुछ मगरमच्छ ,बड़ी मछलियाँ और
बड़े बड़े जलपोत जहाज़
माल असबाब व मनुष्यों को भरे
अक्सर आती है सपने में वो खाई
समुद्र के ....

15 जनवरी 2013

प्रेम

प्रेम को नहीं चाहिए 
अपने होने के बीच 
कोई कविता ,शब्द 
 रंग , गीत या द्रश्य
 मौन प्रतीक्षा की
 प्रेम एक अद्रश्य ज़रूरत है
 एक नीली पारदर्शी नदी 
बहती रहती है जो चुपचाप 
कोमल विरलता में
आत्मा से आत्मा तक