24 जून 2012

प्यास


गर्म भपाती धरती ने जब
तिलमिलाकर 
देखा होगा कोई पहाड़
उठाई होगी सीली हथेली
प्रार्थना में 
सूरज की तरफ
एक चिड़िया उड़ने लगी होगी सहसा
आकाश की चोहद्दी में
बैठ गई होगी धुरी की
सबसे दुरूह ऊँचाइ पर |
 उड़ानों को
हवा ने जिस की बुना होगा
रेशमी उजालों से   
समय के केनवास पर
तिनके को रात की स्याही में डुबा
खींची होंगी कुछ लकीरें 
नन्ही चोंच से
चिड़िया ने,
हरहरा बह निकली होगी कोई नदी
डुबोई होगी जिसमे चिड़िया ने
अपनी प्यास |

14 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूबसूरत शब्दों का माया जाल ...

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    1. शुक्रिया वंदना इस हौसला अफजाई के लिए ...स्वागत है आपका ''चिंतन '' में

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  3. वाह काव्य में बिखरा सौंदर्य ...!!
    सुंदर प्रस्तुति ...!!
    शुभकामनायें.

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  4. क्या बढ़िया भाव हैं और क्या ही खूब शब्दों का चयन...बेहद अच्छी रचना

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