18 दिसंबर 2014

एक अजीबोगरीब नोबेल पुरस्कार विजेता ...दारियो फ़ो 
क्या आप यकीन करेंगे कि दुनियां के सबसे महंगे और प्रतिष्ठित पुरस्कार नोबेल पुरस्कार से एक ऐसे विवादास्पद साहित्यकार (मूलतः नाटककार)को नवाज़ा गया था जो अपनी विवादित रचनाओं के कारन न सिर्फ कई बार पिटा ,अपमानित हुआ बल्कि उसे जेल में बंद कर यातनाएं तक दी गईं थीं लेकिन उसने लिखना नहीं छोड़ा |इटली के महान नाटककार और अभिनेता दारियो फ़ो ने राजनीतिज्ञों,शासकों समस्त बुर्जुआ वर्ग,पादरियों ,पुलिस कर्मियों आदि से सम्बंधित विषयों को अपने व्यंगात्मक,तीखे कटाक्ष और माजाकिये नाटकों का प्रमुख विषय बनाया |वे प्रयोगवादी नाटककार और अभिनेता हैं फ़ो का समस्त लेखन सर्वहारा शोषित और उत्पीडित तबके के लिए है |उन्हें अपने सबसे चर्चित नाटक ‘’एक्सीडेंटल डेथ ऑफ एन एनार्किस्ट’’ पर नोबेल पुरस्कार दिया गया | इसके अलावा पुरस्कार भाषण में उनके दुसरे नाटक ‘’वी कांट पे ,वी डोंट पे’’को भी सराहा गया |जब उन्हें नोबेल पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना मिली तब वो कार से कहीं जा रहे थे |एक अन्य कार चालक ने उन्हें रोककर ये सूचना दी तो वो हतप्रभ रह गए |उन्होंने हँसते हुए कहा ‘’मुझे तो लगता था कि मैं ही दुनिया को चकित कर सकता हूँ ‘’|उनके नाटकों की खासियत ये रही कि आम जनता को उनके नाटक बेहद प्रिय थे क्यूँ कि वो उन्हीं के लिए लिखे गए थे लेकिन वैटिकन ,राजनीतिज्ञों,पादरियों आदि को वे भड़काऊ और प्रतिबंधित करने लायक लगते थे तभी तो उनके एक नाटक ‘’मिस्तेरो वुफो ‘’को दिखाया गया तो वैटिकन ने इस नाटक को टेलीविज़न पर दिखाए गए कार्यक्रमों में सर्वाधिक ‘’ब्लेस्फीमल’’ कह कर आलोचना की | मजदूरों के लिए लिखे गए एक नाटक के लिए उन्हें टेलीविजन के कार्यक्रमों से निष्काषित कर दिया गया था ये प्रतिबन्ध पंद्रह वर्षों तक रहा |उल्लेखनीय है कि वो अपने लेखन से नौकरशाहों,शोषकों आदि के ही नहीं बल्कि सर्वहारा और पीड़ित वर्ग के दिलों में भी एक हलचल पैदा करना चाहते थे |कहा जाता है कि फ़ो जो हमेशा आतंकवाद के खिलाफ लिखते रहे लेकिन उनके खिलाफ दुष्प्रचार के तहत उन्हें अमेरिका में आतंकवादी कहकर रोक दिया गया था |ये प्रतिबन्ध उन पर दो वर्षों तक रहा |सुप्रसिद्ध आलोचक /समीक्षक देवेन्द्र इस्सर कहते हैं ‘’ फ़ो के नाटक इब्सन और बनार्ड शा की याद दिलाते हैं |’’उनकी पत्नी फ्रांका रामे स्वयं एक मंजी हुई अभिनेत्री थीं |उन्होंने फ़ो के कई नाटकों में अभिनय किया और पिछले वर्ष यानी २०१३ में उनका देहांत हो गया |रामे ने अपने पति दारियो फ़ो के साथ मिलकर कुछ नाटक लिखे भी थे जिनमे प्रमुख है ‘’इट इज ऑल बैड एंड बोल्ड ‘’इसमें रामे ने अविस्मरनीय अभिनय भी किया था | रामे ने स्वयं नारी मुक्ति को विषय बनाकर कई मोनोलॉग लिखे हैं जिन्हें ‘फेमिनिस्ट क्लासिक’’ कहा जाता है |1973 में फासीवादियों द्वारा रामे का अपहरण कर लिया गया और खून में लथपथ सडक पर फेंक दिया गया था |इसके बावजूद पति पत्नी ने हार नहीं मानी और वे नाटकों को लिखने व मंचित करने में जुटे रहे | न सिर्फ एक सार्थक लेखन करने ,नोबेल पुरस्कार तक पहुँचने के लिए बल्कि एक दुसरे के लिए समर्पित दंपत्ति का एक अप्रतिम उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए भी उन्हें याद किया जाएगा |जब फ़ो को 1997 साहित्य नोबेल पुरस्कार घोषित हुआ तो उन्होंने उसे अपने उन अभिनेताओं को देने की घोषणा की ये कहकर कि ‘’जिन्होंने पैरोडी और व्यंग द्वारा अन्याय के विरुद्ध युद्ध किया जिनमे ये कहने के साहस है कि ‘’सम्राट वस्त्र विहीन है ‘’उन्हें समर्पित ‘’

5 अक्तूबर 2014


ईद के इस मुबारक मौके पर मेरी कहानी ''ईद मुबारक''विविध भारती के उद्घोषक युनुस खान की आवाज़ में सुनिए

http://katha-paath.blogspot.in/2014/10/story-eid-mubaarak-writer-vandana.html 

24 सितंबर 2014

मार्खेज़ ने कहा था लेखन एक तनहा पेशा है | इन चंद शब्दों के पीछे लेखक और लेखन की तमाम उलझनों व् तर्कों का समाधान छिपा है | ज़ाहिर है कि लेखन किसी लेखक के लिए उसका एक निहायत व्यक्तिगत अनुभव और कल्पनाशीलता का माध्यम है लेकिन वो सार्थकता पाठकों के बीच (सामूहिक पक्ष में )ही पाता है |किसी रचना की महत्ता का गणित अंकों पर नहीं बल्कि प्रतिभा की गुणवत्ता पर आश्रित होता है |लेकिन श्रेष्ठता के मायने ये कौन और कैसे निर्धारित करेगा ? इसे ‘’योग्यता’’ के किस बैरोमीटर से नापा जाएगा? कितना यथार्थ ,कितनी कल्पना,कैसी प्रतीकात्मकता और कितने संकेत और ब्योरे इनके अनुपात ,विश्वसनीयता ,सम्मिश्रण ये सब वस्ताविकता की किस कसौटी पर परखा जाए ये एक गंभीर मसला है |ये कौन तय करेगा कि कहानी का आलोचक अपने संज्ञान, अनुभवों ,तटस्थता आदि के स्तर पर आलोचना के मापदंडों हेतु स्वयं कितना सटीक बैठता है ?किसी कहानी की बाकायदा आलोचना करना और किसी कहानी पर अपना ‘’पाठकीय मत’’ देना ये दो बिलकुल अलग बातें हैं |किसी भी रचना को पढने उस पर अपना पक्ष रखने और उसके लेखन की बारीकियों को बताने की कसौटी हर पाठक (आलोचक की भी ) अलग अलग होती है जो उसके स्वयं के लेखिकीय अनुभवों उसकी चारित्रिक विशेषताओं व् उसके साहित्यिक ओहदे पर भी निर्भर करती है |कभी कभी एक सामान्य पाठक एक सिद्धहस्त आलोचक (?) से अधिक सटीक समीक्षा और सूक्षम आकलन कर देता है | किसी रचना विशेष के सन्दर्भ में जब आलोचक सहित सब पाठकों की प्रतिक्रियाएं उनकी रूचि के विषय ,शिल्प आदि से सम्बंधित अलग अलग होती हैं तो फिर किसी एक व्यक्ति द्वारा उस रचना की आलोचना (प्रसंशा या बुराई) को सटीक कैसे माना जा सकता है ?

5 सितंबर 2014

ये सच है कि मनुष्य गलतियों से ही सीखता है लेकिन गलतियां जब मूर्खता और जल्दबाजी की वजह से हुई हों तो स्थिति एक बार पुनः आत्मविश्लेषण की होना स्वाभाविक है |पिछले कुछ महीनों में फेसबुक ,भिन्न भिन्न पत्रिकाओं और पुरुस्कारों के भुलावे में आकर एकमुश्त सभी ‘प्रसंषित’ किताबें खरीद लीं और उन्हें पढ़ना शुरू किया |ज़ाहिर था कि उनका एक विशेष आकर्षण और छवि मस्तिष्क में थी लेकिन जब पढ़ना शुरू किया तो कुछ तो उनमे से कुछ (बहुत कम ) वाकई अच्छी थीं लेकिन कुछ को पढ़कर लगा कि आखिर इनमे ऐसा क्या था जिसे इतना आभामंडित करके व्याख्यायित किया गया पुरूस्कार दिए गए ?माना कि पाठकों ,आलोचकों व् स्वयं लेखक की द्रष्टि में फर्क हो सकता है लेकिन इतना ?...सच हतप्रभ हूँ |  

7 जुलाई 2014

‘’वॉर एंड पीस’’ और ‘’अन्ना केरेनीना’’ जैसी महान कृतियों के लेखक टोलसटॉय और ‘’द लास्ट सपर ‘’ ,मैडोना ऑफ़ द रोक्स ‘’ और विश्व प्रसिद्द रचना ‘’मोनालिसा’’ के अद्भुत कलाकार लियोनार्दो दा विन्सी यद्यपि एक लेखक है और दूसरा कलाकार लेकिन दोनो में एक अद्भुत समानता है |दौनों ने ही अपनी स्वयं गढ़ी गयी कृतियों से इस क़दर प्रेम किया कि ताजिन्दगी वो उतना प्रेम किसी जीवंत स्त्री को नहीं कर पाए | अन्ना केरेनीना उपन्यास का प्रारम्भ एक प्लेटफोर्म से होता है (और अंत भी प्लेटफोर्म पर ही )| टालस्टॉय इस उपन्यास के दौरान अपनी नायिका अन्ना के प्रेम में डूब गए |एक विवाहित स्त्री के प्रेम से कहानी निर्लिप्त भाव से शुरू होती है लेकिन धीरे धीरे ये महसूस होने लगता है कि अन्ना के प्रति उनके ह्रदय में कोई कोमलता है जो आहिस्ता आहिस्ता विवशता और अवसाद में बदलती जाती है ...सामाजिक ,पारिवारिक ,ममत्व आदि की विसंगतियां व् असुरक्षा का मिला जुला भाव और अंतत वो आत्महत्या कर लेती हैं| वहीं विन्सी के बारे में कहा जाता है कि उनकी अनेकों कृतियाँ यहाँ वहां पडी रहती थीं लेकिन मोनालिसा की कलाकृति को ताजिन्दगी (2 मई 1519 तक )उन्होंने अपने से अलग नहीं किया वो जहाँ गए उसे अपने साथ लेकर गए |विश्व प्रसिद्द लेखक मार्खेज़ के बारे में भी कहा जाता है कि अपने एक उपन्यास की नायिका की म्रत्यु के बाद वो फूट फूट कर रोये |हमारे यहाँ मीरा और कृष्ण के प्रेम को इस द्रष्टि से देखा जा सकता है लेकिन कृष्ण की छवि मीरा के मन में पहले से थी और इन महान रचयिताओं ने अपना प्रेम खुद गढ़ा और जीवन पर्यंत उससे लिप्त रहे |

26 जून 2014

‘’पाश्तीश की संस्कृति और चिंतन पर हाहाकार क्यूँ ?’’
इस भूमंडलीकरण और नवउदारवादी संस्कृति ने न सिर्फ बाज़ार और सभ्यता के मापदंड बदल दिए बल्कि जीवन के अर्थ और गुणवत्ता पर भी इस नव-विकास और विचारशील संस्कृति का ज़बरदस्त प्रभाव पड़ा है इसे हम बीस पचास बरस पूर्व से अब तक के तुलनात्मक अध्ययन से भली प्रकार देख और जान सकते हैं |शिक्षा ,समाज ,साहित्य, फ़िल्में ,राजनीति,दर्शन ,लोक ,बाज़ार ,विपणन आदि के अर्थ और औचित्य बदल चुके हैं |यदि हम इनमे से सिर्फ एक को लें साहित्य जो न तो पुराने खरे सोने से मुक्त हो पा रहा है और ना नए की उथली सोच और स्वरुप से संतुष्ट इसके कुछ गंभीर कारन अवश्य होंगे |क्या वजह है की आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ,हजारी प्रसाद द्विवेदी से लेकर महादेवी वर्मा और अज्ञेय तक ने अपना सम्पूर्ण जीवन और ज्ञान साहित्य को समर्पित करते हुए नई पीढी के हाथ में मशाल सौंपी थी लेकिन उस मशाल की रोशनी अब फीकी क्यूँ हो रही है?संभवतः कुछ ज्ञानी /विद्वान् ऐसा ना मानते हों और वो साहित्य के सार्थक भविष्य से आश्वस्त हों लेकिन यदि ऐसा है तो फिर साहित्य जो लेखक ,पाठक ,आलोचक,चिन्तक,संपादक,प्रकाशक, आदि से मिलकर अपना अस्तित्व गढ़ता है इनमे से कोई एक भी संतुष्ट नज़र क्यूँ नहीं आता ? ये असंतुष्टि उस लेखिकीय असंतुष्टि से अलग है जो हिन्दी साहित्य के कालजयी की श्रेणी में रखे गए रचनाकारों की असहमति बनी |प्रेमचंद ,रेनू,शरतचंद से लेकर मन्नू भंडारी ,चित्रा मुद्गल,मृदुला गर्ग .कृष्ण सोबती आदि तक|उनकी असंतुष्टि या असहमति साहित्य के भविष्य,उसके स्वरुप और उसकी शास्त्रीयता के पक्ष में थी | कहानी कहानी होती थी कविता कविता और आलोचना एक पूर्ण आलोचना निष्पक्ष और संतुलित |यद्यपि अपवाद मनुष्य के साथ उसके अस्तित्व की आख़िरी सांस तक रहेंगे और तब भी थे लेकिन आज इन अपवादों ने निहायत व्यक्तिगत रूप गढ़ लिया है साहित्य और साहित्यिक सरोकार न रहकर साहित्य और वैयक्तिक आक्षेप के स्तर तक आलोचना उतर आई है |व्यंग का मतलब व्यक्तिगत आक्षेप और कुंठाओं का निष्कासन भा कहीं कहीं दिखाई देता है रह
साहित्य हो या कलाएं हर युग में सहमती –असहमति .तर्क-वितर्क उनके साथ उंगली पकडे चली है |
हर सदी के अपनी समस्याएं होती हैं ,उनका प्रतिकार और उन्हें दूर करने की कोशिशें भी |राजनैतिक अस्थिरता समाजिक मूल्य ,आर्थिक सोच और कई समस्याओं की जनक होती है और दुर्भाग्यवश भारत ने इस अस्थिरता के परिवेश और दैत्य को बहुत झेला है आज भी झेल रहा है |एक और तथ्य है जिसने हिन्दी साहित्य को अत्यधिक प्रभावित किया है वो है बहुसंस्कृति की परम्परा |
और इसी बहुसांस्क्रतिकता (मल्टीकल्चर्लिज्म) का भी यहाँ के साहित्यिक संस्कृति में एक बड़ा योगदान है तो दूसरी और एक विघटनकारी मानसिकता का भी यही उपक्रम माना जा सकता है |
शमशेर चाँद का मुहं टेड़ा है की भूमिका में कहते हैं ‘’मुक्तिबोध युग के उस चेहरे की तलाश करते हैं जो आज के इतिहास के मलबे के नीचे दब गया है ,मगर मर नहीं गया है (शमशेर-चाँद का मुहं टेढ़ा है’’भूमिका )|आजकल हिन्दी साहित्य में पश्चिम के प्रभाव की चर्चा है |यद्यपि ये प्रभाव कोई नया नहीं है |यदि परिवेश के स्तर पर पाश्चात्य प्रभाव देखा जाये तो निर्मल वर्मा का नाम सबसे पहले आयेगा |उनकी कहानी ‘’लन्दन की एक रात ‘’और जलती झाडी इसका साक्षात् उदाहरन हैं इसके अलावा उषा प्रियंवदा की ‘’मछलियाँ’’टूटे हुए ,कृष्ण बलदेव वैद की कहानी ‘’शेडोज़’’आदि हैं |
पाश्चात्य प्रभाव का विरोध करने से पूर्व ‘’साहित्य क्यूँ और किसके लिए ‘’ इस प्रश्न पर हमें गंभीरता से विचार करना होगा |क्या साहित्य मनोरंजन है?क्या साहित्य का औचित्य मनुष्य में मनुष्यता की भावना का संचार करना या उसे समाज ,देश,मनुष्य मात्र के प्रति जागरूक करना है?क्या साहित्य एक जाती विशेष ,एक समूह विशेष,एक भाषा विशेष एक देश विशेष ,अथवा भूमंडलीय स्तर तक मनुष्य को प्रभावित करने का एक माध्यम है? स्वाभाविक है की यदि साहित्य इतने स्तरों तक मनुष्य के जीवन को प्रभावित करने की क्षमता रखता है तो उतने ही स्तरों पर उससे सहमत असहमत होने वाले लोग भी होंगे और उतने ही विचार? यदि साहित्य वैश्विक स्तर पर समाज को आंदोलित,प्रभावित करने का माद्दा रखता है तो फिर परिवेश के स्तर पर उसका विरोध क्यूँ ?पूरे विश्व में विदेशी साहित्य अनुवादित रूप में पढ़ा जाना और पसंद किया जाना क्या इसका प्रबल साक्ष्य नहीं ?यदि हम किसी कहानी ,उपन्यास या कविता के माध्यम से किसी दुसरे देश की संस्कृति,रीत रिवाज या मानसिकता को जान पायें तो इसमें क्या बुरा है?यदि किसी रचना पर पाश्चात्य प्रभाव रचना के शिल्प,संवेदना या चिंतन के स्तर प् होता है तो भी मनुष्य और सामाजिक प्राणी होने के नाते ये भी उतना ही महत्वपूर्ण क्यूँ नहीं है तब जबकि भौगोलिक अवस्थाएं ,भाषा, रीति रिवाज,कायदे क़ानून अलग हो तो भी दुःख ,पीढा,खुशी का रूप पूरे विश्व में अनुभूति के लिहाज से एक होता है? लेकिन साहित्य में उल्टा हो रहा है हम इन सबका विरोध तो कर रहे हैं लेकिन पाश्चात्य फैशन ,खुलापन (जो कुछ देशों में मान्य है पर यहाँ नहीं )का साहित्य में खुलकर स्तेमाल कर रहे हैं ,|देश-देश के बीच जो संस्कृतिक ,वैचारिक या नैतिक बुनावट के फर्क की लकीर को हम अपनी कहानियों उपन्यासों में मिटा रहे हैं वो भी स्त्री दशा या विमर्श के नाम पर पाश्चात्य प्रभाव तो इसे मानना चाहिए ,जिसे नज़रंदाज़ किया जा रहा है |हिन्दुस्तान की संस्कृति में तो कभी इतना खुलापन और आज़ादी नहीं रही विशेषतौर पर स्त्री लेखन में ? चाहे कला हो या साहित्य ये प्रयोगधर्मिता का युग है और नए नए प्रयोग होना निस्संदेह किसी भी विधा के लिए शुभ संकेत है |कई बार कहानियों के शिल्प पर पाश्चात्य प्रभाव का दोष भी लगाया जाता है |आज जब दुनियां सिमट रही है लोग,समस्याएं,ख़बरें वैशिक धरातल पर नज़दीक आ रहे हैं और हम बाकायदा उन्हें कुछ अर्थों में अपना भी रहे हैं तो यदि कहानी के शिल्प में पाश्चात्य प्रभाव दिखाई देता है तो उसे प्रयोग की द्रष्टि से क्यूँ नहीं स्वीकार किया जाता ?कहानी उपन्यास के कुछ विषय सार्वभौमिक होते हैं जैसे भूख,अन्याय या म्रत्यु का विषय |म्रत्यु को भारत सहित पूरी दुनिया के तमाम लेखकों ने विषय बनाया ..हेमिंग्वे ,कामू,मार्खेज़ या फिर हिन्दी के लेखक भीष्म साहनी ,निर्मल वर्मा,श्रीकांत वर्मा ऐसे और भी उत्क्रष्ट कोटि के लेखक हैं |म्रत्यु एक अवस्था है एक स्थिति इसको शिल्प या चिन्तन की द्रष्टि से भले ही अलग कर लें लेकिन संवेदना के स्तर पर आखिर कितना फासला रख सकते हैं ?(प्रथम भाग)

20 जून 2014

सुपरिचित कथाकार-कवि Vandana Shukla (वंदना शुक्‍ल) इस बार अनुनाद के लिए संगीत का अनुपम उपहार लायीं तो लगा किसी अमर प्रतीक्षा का सुफल मिला। कविता के कार्यकर्ता हमेशा ही संगीत की ओर झुकते हैं। दोनों कलाओं का अन्‍तर्सम्‍बन्‍ध अपने आपमें एक पुराकथा है। वंदना जी ख़ुद कुशल ध्रुपद गायिका हैं और हम इन कविताओं के लिए उनका हार्दिक आभार व्‍यक्‍त करते हैं।
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http://anunaad.blogspot.in/2014/06/blog-post_21.html

24 मई 2014

वागर्थ 2014 ''समकालीन कथा साहित्य और बाज़ार ''विषय पर कुछ साहित्यकारों के साक्षात्कार लिए गए थे उन प्रश्नों पर बतौर पाठक एक प्रतिक्रिया

(प्रतिक्रया-बतौर पाठक )
बिना एक निश्चित ढांचा तैयार किये ये एक कुंठा की अभिव्यक्ति है |
प्रश्न एक -कथा पुस्तकों की मांग अन्य विधाओं की बनिस्बत प्रकाशकों के यहाँ अधिक है विशेष रूप से विवादास्पद और ‘’बोल्ड’’ कथा साहित्य की |इस द्रष्टि से आज के कथा साहित्य का क्या बाज़ार से भी कोई सम्बन्ध बनता है ..घोषित या अघोषित रूप में ?
मत -भू मंडलीकरण के इस दौर में जब पूरा विश्व एक ग्लोबल मंडी में तब्दील चुका है यहाँ तक कि परिवार,समाज रिश्ते नाते वर्तमान भविष्य सब इस महा -बाज़ार की गिरफ्त में हैं तब साहित्य/कलाओं को उससे दूर कैसे रखा जा सकता है ?ज़ाहिर है कि बाज़ार का हिस्सा बनकर बाज़ार के कायदे कानूनों को स्वीकारना ही होगा |बाज़ार का स्वभाव चंचल और गतिमान है लिहाजा नज़र रखनी होगी नित नई बदलती दुनियां और ट्रेंड पर | आगे आना है तो दौड़ना ही पड़ेगा ...पेश करना होगा कुछ नया ....कुछ अलग ...अनोखा  .
–ब्यूटीफुल नहीं सिर्फ बोल्ड....
(.यदि‘’बोल्ड’’ का अनुवाद ‘नई लकीर ‘’माना जाए तो ....)
अभी कुछ रोज़ पहले जाने माने कथाकार प्रियवंद की कहानी ‘’बूढ़े का उत्सव पढी’’ एक अच्छे शिल्प में गढ़ी एक विचित्र कहानी |हलाकि इसका विषय हटकर था .. कब्रों पर ‘’समाधि लेख’’ लिखने वाले एक अघोरी टाईप बूढ़े का उसकी अजीबोगरीब आदतें और स्वभाव |लेकिन उस ‘’अलग हटके ‘’ के प्रयास में कहानी किस क़दर वीभत्स और अनैतिक हो गयी इसका अंदाज़ इससे लगा सकते हैं कि उसे पढने के बाद बहुत देर तक सामान्य नहीं हो सके | कहानी का एक अंश ‘’बूढ़े ने दरवाज़ा बंद किया और कांपते पांवों को उसी तरह घसीटता हुआ चूल्हे के पास चढ़े बर्तन के पास बैठ गया |अजनबी ने देखा बर्तन में मसाले से लिपटी दस बारह छिपकली पडी थीं बूढा उन्हें भून रहा था |...तुम थोड़ी देर बैठो मैं इन्हें पीसकर इसका चूर्ण बना लूं ‘’|
सुना है कि अफ्रीका में लोग सांप छिपकलियाँ खाते हैं यानी ये एक अनहोनी बात नहीं लेकिन हिन्दुस्तान में जहाँ अहिंसा को परम धर्म कहा गया है जहाँ की लगभग साठ प्रतिशत आबादी शाकाहारी है और जिस समाज में हजारों विसंगतियां अंधविश्वास उस समाज में ऐसी कहानियाँ ?...क्या इनसे मनोरंजन हो रहा है पाठकों का ?ज्ञानवर्धन?शिक्षा ?या फिर ये हमारे समाज में व्याप्त कोई विक्षिप्तता का नया आकार है ? कहानी की मूल कथा ये भी नहीं | मूल कथा तो और भी भयानक है जिसे यहाँ लिखना संभव नहीं| आदर्शों और संस्कारों की तलछट में कुछ रहे सहे रिश्ते और मूल्य बचे हैं उनके साथ भी खिलवाड़ ? बावजूद इसके कि संसार घोर आश्चर्यों ,वीभत्सताओं व् अनहोनियों से भरा पड़ा है ..फिर भी ...|कुछ अलग करने की चाह में हम ये कैसा साहित्य परोस रहे हैं अपने समाज के सामने और यदि इसमें कोई हर्ज़ नहीं तो हिन्दी साहित्य में पाठकों का टोटा होने का रोना क्यूँ ,ये जानते हुए भी कि मध्य वर्ग ही हिन्दी साहित्य का सबसे बड़ा पाठक है तमाम आधुनिकताओं के चोंचलों के बावजूद उसके अपने संस्कार हैं परिवेश और समाज है ?
उत्तर आधुनिक काल के मौजूदा हिस्से में ‘’मुक्ति चाह ‘’ से लथपथ कुछ अति महत्वाकांक्षी लेखिकाओं के लिए स्वयं को बोल्ड कहलाना गर्व का विषय है |अर्थात इस एक शब्द से उनके सामने स्वछंदता के कई द्वार खुलते हैं ..रहन सहन में , बातचीत में,लेखन और विचारों में ,व्यवहार में यानी की जीवन में बोल्ड जिसे वो कहीं न कहीं वूमन फ्रीडम (नारी मुक्ति) के लिए ज़रूरी मानती हैं और स्त्री विमर्श या मुक्ति की आड़ में काफी ‘’खुलकर’’ अपनी आज़ादी का उद्घोष करती दिखाई देती हैं लेकिन उनकी इस सेंसर हीन रचनाओं को ज़रा खुलकर अश्लील कह दिया जाए तो वो और उनके प्रशंसक भड़क उठते हैं|( उनकी कहानियों /उपन्यासों के वो विवादस्पद अंश पुनः यहाँ देना आवश्यक नहीं|जानी मानी स्त्री –विषयक लेखिका शालिनी माथुर अपने लेख में शब्दशः दे चुकी हैं |) इसे जस्टीफाय करते हुए एक बोल्ड और चर्चित लेखिका कहती हैं ‘’(दरअसल)अपने भीतर और बाहर खड़ी कर दी गई परंपरा,शिष्टाचार और मर्यादा की तथाकथित दीवारों को लांघने के संकल्प के साथ जारी इस यात्रा में अपनी अग्रज लेखिकाओं द्वारा देखे गए स्वप्न भी शामिल हैं। ..स्त्रियों को सिर्फ मादा होने तक सीमित कर दिये जाने की साजिश के विरुद्ध उन्हें मनुष्य रूप में प्रतिष्ठित करने का जो बीड़ा ‘रचना’ ने उठाया हुआ है, आलोचना को भी उसके मर्म तक पहुँचने की जरूरत है। (स्त्री काल ब्लॉग में ‘’साहित्य में स्त्रियों की भागीदारी विषय पर एक लेख से उद्धृत अंश ) |अब इसमें दो तथ्य हैं जिन पर हमें विचार करना होगा पहला - परम्परा ,मर्यादा और शिष्टाचार की तथाकथित दीवारें अश्लील या बोल्ड कहानियाँ लिखकर ‘’ही’’लांघी जा सकती हैं |,दूसरे ,यदि स्त्रियों को सिर्फ मादा बनाने तक पुरुषों की साजिश है तो अति बोल्ड कथानकों व् विवरण से उन्हें (स्त्रियों को ) मनुष्य रूप में प्रतिष्ठित करने का बीड़ा इस एकमात्र हथकंडे से ही उठाया जा सकता है|
‘’अग्रज लेखिकाओं’’से उनका तात्पर्य कदाचित बोल्ड साहित्य लिखने वाली ,मुक्ति की घनघोर हिमायती  जैसे इस्मत चुगताई (लिहाफ), कृष्णा सोबती (मित्रों मरजानी और अन्य ),कर्तुएल एन हैदर (पतझड़ की आवाज़ ) मैत्रेयी पुष्पा (चाक) ,कमला दास ,रमणिका गुप्ता ,अम्रता प्रीतम –(आत्मकथाएं )आदि से रहा होगा |उक्त लेखिकाएं निस्संदेह हिन्दी कथा साहित्य की अग्रिम पांत की और मशहूर लेखिकाएं हैं | ये अलग बात यह है कि मशहूर और ‘’बिकाऊ’’ (पठनीय साहित्य )होने के बाद भी शिवानी जैसी लेखिका कभी साहित्य की मुख्य धारा में नहीं मानी गईं |क्यूँ ...इसका ठोस प्रमाण है लिहाफ की लेखिका इस्मत चुगताई द्वारा स्वतः किया गया एक खुलासा कि मैंने तमाम साहित्य लिखा लेकिन मुझे लोग जानते सिर्फ ‘’लिहाफ’’ के कारण हैं |’’
गौर तलब है कि तथाकथित लेखिकाओं ने समवेत स्वरों में स्वीकारा है कि ये ‘’बोल्ड लेखन’समाज में व्याप्त यथार्थ से रू ब रू कराने की एक कोशिश है
कथाकार नाट्य लेखक ,रंगमंच आलोचक श्री हृषिकेश सुलभ कहते हैं ‘’यथार्थवाद एक दृष्‍टि‍है, यह आवश्‍यक नहीं कि‍यथार्थ की सघन अभि‍व्‍यक्‍ति‍के लि‍ए यथार्थवादी शैली में ही प्रस्‍तुति‍हो। उदाहरण प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा ‘’रतन थि‍यम के कर्णभारम् में कुंती के काँधे की एक चादर सरकती है और प्रसव की पीड़दायी प्रक्रि‍या समाप्‍त होती है। चक्रव्‍युह में मृदंग के बजाता अभि‍नेता रथ के गति‍शील पहि‍ए में बदल जाता है। प्रोबीर गुहा के नमकीन पानी में एक अभि‍नेत्री के पेट से लाल वस्‍त्र नि‍काल उसे चबाने का नाट्य करता अभि‍नेता स्‍त्रीभ्रूण हत्‍या का ऐसा दृश्‍य रचता है कि‍दर्शक हतप्रभ रह जाते हैं ‘’ यद्यपि लेखन में द्रश्य की सुविधा नहीं बावजूद इसके क्या ऐसी ही ‘’शब्द सांकेतिकता’’का प्रयोग कथा साहित्य में नहीं किया जा सकता या कभी नहीं किया गया?
 डॉ श्रोत्रीय इसकी मनोवैज्ञानिक वजह बताते हुए कहते हैं कि‘’यौन मुक्ति ये नारा भारतीय स्त्री  विमर्श ने पाश्चात्य से ही लिया है पर पश्चिम में ये कोई मामला ही नहीं इसलिए इस मामले में पश्चिमी लेखिका एक अनुत्तेजक सहजता में बात  करती है लेकिन भारतीय लेखिका इस प्रकरण पर बेहद उग्र हो जाती है |’’
प्रश्न दो - नेट्वर्किंग और मार्केटिंग के बहाने अमरता की होड़ -
मत -ये एक बहुत ही बचकाना और बेवकूफी भरा स्वपन है या भ्रम |जहाँ किताबो ,पत्रिकाओं ,पुरुस्कारों ,सम्मानों की बाढ़ सी आई हुई है रोज एक नई किताब (लेखक) अवतरित हो रही है ज़ाहिर है दूसरी को पीछे धकेलकर ऊपर से फेसबुक जैसे सोशल मीडिया ने जहाँ एक एक पल में बदलाव और डिलीट का ऑप्शन दे रखा है वहां ‘’बोल्डनेस ‘’ के बूते ‘’अमरता’’ हासिल ...ये सिर्फ अपने मन को बहलाने के लिए एक झुनझुना है और कुछ नहीं | ये भी सच है कि इन तथाकथित बोल्ड और विवादास्पद कहानियों के लिए कुछ प्रकाशक और संपादक भी ज़िम्मेदार हैं जो अपनी पत्रिका/पुस्तक की बिक्री के लिए ऐसे विवादास्पद मामले तलाशते रहते हैं क्यूँ की वे साहित्य-सेवक बाद में पहले व्यवसायी हैं लिहाजा समय ,प्रतिस्पर्धा व् बाज़ार पर भी नज़र रखना उनकी ज़रुरत है | शायद इसीलिये मशहूर लेखिका कृष्णा सोबती का कहना है कि बोल्ड,गर्म,कल्पना या यथार्थ के टुकड़ों से बुनी सामग्री सुथरी हो या अश्लील संपादक द्वारा चुन लिए जाने पर उसे ‘’बिकाऊ’’ का खिताब देना उचित नहीं |
सच है ...सारा खेल मार्केटिंग का ही है साहित्य में ये मार्केटिंग आन्दोलन के नाम पर हो रही है | सुप्रसिद्ध लेखक/आलोचक डॉ प्रभाकर श्रोत्रीय कहते हैं ‘’बिना एक निश्चित ढांचा तैयार किये ये एक कुंठा की अभिव्यक्ति है |’
 वरिष्ठ लेखिका और स्त्री मुक्ति की प्रबल दावेदार मैत्रयी पुष्पा कहती हैं ‘’ये विवरण (बोल्डनेस)कहानी की मांग है ‘’| बाज़ार के नियमानुसार मांग है तो उसकी आपूर्ति भी होगी और स्थिति तब विचित्र हो जाती है जब आपूर्ति ..मांग से ज्यादा और पहले बाज़ार में आ जाए |सच पूछा जाए तो कहानी की ये मांग बड़ी खतरनाक चीज़ है जिसका न कोई और छोर है और ना तोड़ ..|यदि ये कहानी की मांग ही है तो मन्नू भंडारी ,प्रभा खेतान ,सूर्यबाला ,नासिरा शर्मा आदि का ज़माना या तो सात्विक आदर्श और स्त्री पुरुष की समानता का ज़माना था या फिर ये लेखिकाएं स्त्री के उस ‘’मर्म ‘’ (यथार्थ )को समझ पाने में असफल रहीं जो कहानी की ‘’मांग’’ थी और जिन्हें आज की यथार्थवादी और अति संवेदनशील लेखिकाएं ही समझ पा रही हैं | क्या इस परिपेक्ष्य में एक बार पुनःआशापूर्णा देवी ,महादेवी वर्मा,शिवानी ,व् मालती जोशी जैसी मशहूर लेखिकाओं के नामों को दोहराने की ज़रुरत नहीं हैं जिन्होंने नैतिक मूल्यों व् मर्यादा के साथ स्त्री के संघर्ष बनाम स्त्री मुक्ति के संघर्षों को अपनी रचनाओं में लिखा और इससे भी ज्यादा महत्वूर्ण बात कि समय की शिला पर आज भी इन लेखिकाओं का नाम खुदा हुआ है ?जहाँ तक आज की लेखिकाओं की बात है कई लेखिकाएं इस तथाकथित ‘’यथार्थ वादी आवश्यकता’’से इतर भी यथार्थवादी  लेखन कर रही और सराही जा रही हैं | स्त्री मुक्ति और स्त्री देह मुक्ति .. स्त्री विमर्श आन्दोलन आज स्पष्टत इन दो खेमों में बंट गया है |सूसन कहती हैं ‘’ स्त्री मुक्ति,स्त्री के सम्पूर्ण जीवन को मानवीय संघर्ष में शामिल करता है और स्त्री देह मुक्ति का अर्थ है स्त्री देह पर मिलकियत |वो कहती हैं ‘’ये देह का उत्सव नहीं देह का अपमान है ‘’|दिस इज नॉट अ सेलीब्रेशन बट द ह्युमेलियेशन ऑफ़ बॉडी’’|( कथादेश २००८ से उद्दृत )
 प्रश्न -३ ‘बाज़ार’ ‘’सर्जना’ और ‘बिकाऊ’ - अंतर्संबंध
मत-बाज़ार का स्वभाव चंचल और गतिमान है |नीतियाँ ,अर्थशास्त्र ,मनोविज्ञान सहित बाज़ार का अपना एक समाजशास्त्र भी होता है | कोई भी नया उत्पाद जब बाज़ार में दस्तक देता है तो वो ग्राहकों की पहली पसंद हो जाता है ये भीड़ का एक मनोविज्ञान भी है और बाज़ार का उसूल भी |यानी बाज़ार नित नया बदलाव चाहता है अच्छा या बुरा |मिसाल के तौर पर बर्तन मांजने के न जाने कितने साबुन नए नए रैपर या लिक्विड फॉर्म में बाज़ार में उपलब्ध हैं फिर भी रोज़ एक नयी कंपनी कोई नई डिजायन ,सुविधा के साथ अपना प्रोडक्ट बाज़ार में ले आ रही है क्यूँ कि व्यवसायी बाज़ार की नब्ज़ पहचानता है और ग्राहक की कमजोरी भी |वो जानता है कि उपभोक्ता हर चमकती लुभाती नई चीज़ पर टूटे पड़ते हैं , फैशन हो ,कोई प्रोडक्ट हो या साहित्य/कला का कोई नया ‘’चलन’’ ही लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू ये भी है कि बाज़ार में दूसरा नया प्रोडक्ट उतरते ही उपभोक्ताओं का ये भ्रम शीघ्र ही टूट जाता है जब तक कि उसकी उपियोगिता ,स्थायित्व व् गुण ‘नए’ से बेहतर न हों |कला में इसके उदाहरण देखना है तो हिमेश रेशमिया और अल्ताफ राजा हैं जिन्होंने एक समय में बौलीवुड में धूम मचा दी थी आज कहाँ हैं कुछ नहीं पता |यदि साहित्य में देखा जाए तो बोल्ड और विवादस्पद साहित्य की ये बहस इसी ‘’बदलाव’’ का अर्क है |बदलाव यानी नवीनता और नयापन यानी नई सोच नयी पीढी | बदलाव की इस ‘’नई खेप’’ (जिसकी स्त्रोत व् प्रेरक पुरानी पीढ़ी की कुछ प्रगतिवादी लेखिकाएं भी है ) पर लेखिका नमिता सिंह कहती हैं पोर्न साहित्य को आज साहित्य की मुख्य धारा में लाने की कोशिश की जा रही है |जबकि वरिष्ठ कथाकार और ‘’मित्रों मरजानी ‘’ जैसे विवादास्पद कहानी की लेखिका इस ‘’नयेपन’’ को खामोशी से स्वीकारने की सलाह देती हैं |उनका कहना है कि नई पौध को निरुत्साहित करना मुनासिब नहीं |
इसी बदलाव को एक और विवादास्पद और सुपरिचित लेखिका (जिनकी कुछ रचनाओं की मैं भी मुरीद हूँ )मैत्रेयी पुष्पा अपने चिर परिचित अंदाज़ में इस तरह व्याख्यायित करती हैं | ‘’बाज़ार में रफ़्तार तब आती है जब बदलाव का लेखन आता है |किन्ही पिटी लकीरों का कब तक कोई सुमिरन या जाप करता रहे |जबकि समय के साथ इन सुमिरन कथा का कोई ताल मेल ना बैठता हो |’’ (वागर्थ मई २०१४)उनके इस कथन में तीन अर्थ अन्तर्निहित हैं  –(१)-अश्लील लेखन समय की मांग है ?(२)- ‘’प्रेमचंद ,रेनू,अज्ञेय ,मन्नू भंडारी जैसे लेखक उनका साहित्य (सुमिरन कथाएं )अब पिटी हुई लकीरें हो चुका है ? (३)-संभवतः इसीलिये लेखिका स्वयं इस ‘’बोल्ड लेखन ‘’ की ट्रेंड सेटर लेखिकाओं की कतार में आ चुकी हैं कि कभी उनकी स्वयं की ये तथाकथित ‘सुमिरन कथाएं’ भी ‘पिटी लकीरों’ में शामिल न कर ली जाएँ |
कह सकते हैं कि साहित्य में ये परिपाटी पश्चिम की नकल और भारतीय अतिवादिता,असम्भव प्रकरणों व् स्वप्नदर्शी ‘’करोड़ों का बिजनेस ‘’ करने वाली फिल्मों के चमत्कारों का मिला जुला परिणाम हैं |रही सही कसर धारावाहिकों ने पूरी कर दी है |गौर तलब है कि मध्यम वर्ग साहित्य ,फिल्मों और धारावाहिकों का सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है और औज़ार भी और इन का प्रभाव भी इसी वर्ग पर सबसे ज्यादा पड़ता है | |जिसका सीधा सीधा लाभ संपादक/प्रकाशक व् लेखक को अपने उत्पाद की मार्केटिंग में मिलता है |नेट्वर्किंग या सोशल मीडिया ने लेखकों व् संपादकों/प्रकाशकों का रास्ता और साफ़ कर दिया है | लब्बे लुबाव ये कि साहित्य भी अब इस ग्लोबल बाज़ार का अटूट हिस्सा है और बाज़ार जहाँ अपने नए नवेले उत्पाद को सर माथे बिठाने का आग्रह और उत्साह रखता है, साहित्य में जिसका सबसे बड़ा ग्राहक साहित्येतर पाठक ही है वही उसे बिकाऊ और लोकप्रिय बनाता है ,एक ही ‘’चलन ‘’ से उकताकर वही उसे फेंक देने में भी कोई हिचक या कोताही नहीं बरतता |बाज़ार को बनाए रखना पुरोधाओं अकेले की वश की बात नहीं | यहाँ ये कहना शायद प्रासंगिक होगा कि  मसाले दार बिकाऊ और लोकप्रिय साहित्य (?) जिसका औजार औरत ही है को पुरुष ने ही सबसे ज्यादा उत्साहित किया है और दुत्कारा या रोंदा भी सबसे ज्यादा उसी ने है |
प्रश्न चार  -मसाला कथा साहित्य का क्या सर्जनात्मकता से कोई सम्बन्ध बनता है या केवल कथावस्तु के आधार पर ही यह ‘’साहित्य ‘(?) चर्चा का अधिकारी हो गया ?
मसाला कथा साहित्य का अर्थ भी अंततोगत्वा ‘’बोल्ड लेखन ‘’ से ही है कुछ मसालेदार, कुछ हटके लिखना या पाठकों /दर्शकों की दबी हुई इच्छाओं को बाहर निकालना (जो करोड़ों के बजट से बनी और दुगना तिगुना मुनाफ़ा कमाती हिन्दुस्तानी फ़िल्में और सालों तक घसीटते हिन्दी धारावाहिक करते रहे हैं |)गुलशन नंदा,ओमप्रकाश शर्मा ,रानू अपने ज़माने में मसाला साहित्य के द्रोणाचार्य रहे |गुलशन नंदा की  किताबें लाखों में बिकती थीं ..| लोग रेलगाड़ियों में यात्रा करते हुए ,कॉलेज की छात्राएं अपनी कोर्स की किताबों में छिपाकर उन्हें पढ़तीं | करुना से लबालब उनके उपन्यासों पर बनी फिल्मों में अपार भीड़ होती और औरतें ऑंखें सुजाये हॉल के बाहर निकलतीं ,लेकिन गुलशन नंदा बिकाऊ व् लोकप्रिय होते हुए भी मुख्य धारा में नहीं समझे गए | लोकप्रियता को स्तरीय होने से कदापि नहीं जोड़ा जा सकता | गुलशन नंदा /रानू,ओमप्रकाश शर्मा को अपने ज़माने में लोकप्रिय और बिकाऊ तो माना जा सकता है लेकिन सर्जनात्मकता नहीं |ऐसे लेखकों के लिए प्रसिद्द लेखक काशीनाथ सिंह कहते हैं ‘’लिखना और बिकना उनका व्यवसाय था ||एक रचना अथवा पुस्तक स्तर हीन होने के बावजूद लोकप्रिय हो सकती है या इससे उलट कोई पुस्तक स्तरीय और अर्थवान होते हुए सामने नहीं आ पाती |ये भी साधनों पर निर्भर करता है ,जिनमे प्रचार प्रसार ,विज्ञापन प्रस्तार,पद ,गुटबाजी,मित्रता ,आदि हो सकते हैं | हेतु भारद्वाज कहते हैं ..चर्चित कृतियों में प्रचार योजनाओं की काफी हिस्सेदारी होती है | )|
लेकिन वास्तविकता यह है कि ख्यात होने का कोई शोर्ट कट नहीं होता इसके उदाहरन हैं भगवती चरण वर्मा (चित्रलेखा ),प्रेमचंद (गोदान),शिवानी (क्रष्ण कली )धर्म वीर भारती (अंधायुग ) जैसे कालजयी लेखक |
जहाँ तक आलोचक की बात है ,ज़ाहिर है की जब समूचा परिवेश साहित्य कलाएं सब बाज़ार के अधीन हैं तो फिर आलोचक भी तो उसी बाज़ार का एक हिस्सा हुआ ?(इससे आगे कुछ कहने की आवश्यकता नहीं) लेकिन सभी आलोचकों को इस कोटि में रखना ज्यादती होगी |
मैत्रेयी पुष्पा बोल्ड ,विवादास्पद ,या बिकाऊ जैसे (दकियानूसी ) शब्दों को हटाकर उनकी जगह सिर्फ एक शब्द विज़न की सलाह देती हैं |और उस ताकतवर विजन की खिड़की पाठक की और खोलने का मशविरा भी देती हैं |सिर्फ एक प्रश्न विजन की भी एक सीमा तो होती होगी  ?
अंत सुपरिचित लेखिका अनामिका के की पंक्ति से “”कितना ही सभ्य समाज हो औरत को तमाशा बनते देखते देर नहीं लगती “|



30 अप्रैल 2014

औचित्य...?

क्या दुनियां की किसी भी त्रासद या अनैतिक/अ- स्वाभाविक/अ-सामाजिक कहीं जाने वाली घटना को प्रासंगिकता की ओट में लिखा जाना ..लेखक के सामाजिक दायित्व के दायरे में ज़रूरी और नैतिकता की द्रष्टि से क्षम्य माना जा सकता है बावजूद इस सत्य के कि दुनियां शानदार भौगोलिक / आध्यात्मिक /सामाजिक /नैतिक आदि उदाहरणों (विषयों )के अलावा भी सैंकड़ों अजीबोगरीब ,रहस्यमयी और क्रूर घटनाओं से भरी हुई है ?हबीब तनवीर द्वारा लिखित /मंचित नाटक बहाद्दुर कल्हारिन/कमलेश्वर की कहानी मांस का दरिया/ मंटो की अधिकाँश कहानियां और आज प्रियवंद की कहानी ‘’बूढ़े का उत्सव ‘’ पढ़कर यही विचार आया |निस्संदेह ये और इस तरह की सभी कहानियां या नाटक समाज की अपाहिज मानसिकता का परिचय देती हैं सच्चाई उघाड़ते हैं |इन्हें अश्लील तो कतई नहीं माना जा सकता | हबीब तनवीर के लोक नाटक ‘’बहादुर कलारिन ’’का सत्य सामाजिक नहीं बल्कि भावनात्मक रूढ़ियों (संबंधों ) के कोमल आवरण का तार तार हो जाना है | उसका अंत देखकर जो अभूतपूर्व महसूसियत (विरक्त बैचेनी) हुई थी वही आज प्रियवंद की कहानी ‘’बूढ़े का उत्सव ‘’ को पढ़कर हुई |प्रियवंद की ये कहानी संसार के उस एकमात्र शुद्ध रिश्ते को भावनात्मक स्तर पर छिन्न भिन्न करती है असम्भव कुछ भी नहीं के बावजूद |ये कहानियाँ पठनीय होते हुए भी पाठक को कल्पना (या सत्य ) के पहाड़ पर ले जाती हुई एक अजीब भावनात्मक व् अविश्वास के एक यंत्रणा पूर्ण शिखर पर छोड़ देती हैं | 

19 अप्रैल 2014

नमन

कल का पूरा दिन मार्खेज़ मय रहा |उनके बारे में उनके प्रसंशकों के ,खुद उनके और उनकी कहानियों उपन्यासों के माध्यम से बहुत कुछ पढ़ा...., जाना उस पर विचारा ..कुछ पढ़े हुए को दोहराते हुए याद किया | इन कालजयी लेखकों जिन्होंने काल को अपने हुनर से जीत लिया ...आखिर कैसे खुद को समय की तेज़ धारा से बचा पाते हैं ? कैसे उनके यश पर काल की खरोंच के दाग नहीं पड़ते? शायद इसलिए कि समय को जीतने वाले इन दुस्साहसी/अपराजेय लेखकों ने अपना लेखन कभी ‘’कालजयी होने’’ की मंशा से या उसे पोसते दुलारते नहीं किया बल्कि काल स्वयं उनके कृतित्व को सलाम करता चला ...परिस्थितियां साधारण होते हुए भी इनकी जीवन के प्रति निष्ठां ,जीने की अदम्य जिजीविषा और सोच असाधारण रही ..सामान्य से परे...लीक से अलग जो उनके लेखन में शब्दशः झलकती है |
’’पूरा हो चुका उपन्यास यानी उपन्यास से उपन्यासकार की पूरी विदाई ‘’...पूरी हो चुकी साँसें और दुनियां से एक भरे पूरे युग की अंततः विदाई ...एक वृहद उपन्यास का पटाक्षेप...सलाम मार्खेज़

17 अप्रैल 2014

पिछले माह सुना कि नया ज्ञानोदय पत्रिका में आधार प्रकाशन द्वरा प्रकाशित छः लेखक लेखिकाओं के उपन्यासों की सीरिज़ पर एक वरिष्ठ और कुछ पत्रिकाओं के चहेते आलोचक की अजीबोगरीब समीक्षा छपी है | मेरा सदस्यता शुल्क समाप्त हो जाने के कारण मेरे पास उस माह वो पत्रिका नहीं पहुँच पाई |कुछ फोन और मेल इस दौरान आते रहे उस विचित्र समीक्षा को लेकर  |एक दिन मुझे एक पत्रिका में ही उन वरिष्ठ आलोचक महोदय का फोन नंबर मिल गया मैंने उनसे फोन पर इस सम्बन्ध में बातचीत की |उनके ज़वाब हतप्रभ करने वाले थे |चूँकि अभी साहित्य क्षेत्र में आये हुए ज्यादा वक़्त नहीं हुआ है ,और दुसरे दिल्ली से बहुत दूर हूँ जो न हिन्दी साहित्य का एक मज़बूत स्तम्भ है बल्कि ऐसा ना होना साहित्य जगत के संपर्क कौशल की एक कमजोरी में गिना जाता है ...बहरहाल...उनके ज़वाबों ने अंतत ये सोचने पर मजबूर कर दिया की ऐसा भी होता है ?और क्या ऐसा होना चाहिए ?कभी कभी लगता है की साहित्य क्षेत्र में जिन ''बड़े'' लोगों के नाम हमें आक्रान्त करते हैं वो वास्तविक (वैचारिक )रूप में कितने छोटे और निकृष्ट हैं ...|फोन रखने के बाद बहुत देर तक सोचते रहे कि कमी आखिर कहाँ है?हमारे समाज में ...साहित्य में जो समाज का ही अक्स दिखाता  है या फिर उस व्यक्ति या संस्था में जिसकी सोच इस बाजारवादी मानसिकता में बेहद निम्न स्तर तक पहुँच गयी है ?

28 फ़रवरी 2014

चेखव इन माय लाइफ

लीडिया एविलोव महान लेखक एन्टोंन चेखव की प्रेमिका थीं और ये प्रेम निस्संदेह इकतरफा नहीं था (प्रसंग बताते हैं ) लेकिन उसने ताउम्र एक असफल प्रसंग की विडम्बना झेली |लीडिया,जो चेखव से चार वर्ष छोटी और उस वक़्त सिर्फ चौबीस बरस की एक शादीशुदा स्त्री थीं ने ‘’चेखव इन माय लाइफ’’चेखव की मौत के कई वर्षों बाद लिखा था |इस किताब में उनके असफल प्रेम का ज़िक्र है लेकिन इस आत्म कथ्य नुमा किताब में चेखव की सोच आदतें ,सामाजिक स्थितियों का जायजा लिया जा सकता है जो स्वाभाविकतः उसमे प्रकट होता है |चेखव के जीवन के आसपास की कई घटनाएँ उसमे व्याख्यायित हैं जिनका वर्णन चेखव ने अपने सुप्रसिद्ध नाटक की प्रष्ठभूमि ‘’द सी गल’’में किया है |एक जगह जब लीडिया अपने सबसे चहेते लेखक चेखान्ता (चेखव का छद्म नाम ) से पहली बार मिलती हैं और लेखिका की सहेली द्वारा उनका परिचय एक लेखन प्रिय स्त्री’’ के रूप में कराया जाता है तो चेखव मुस्कुराते हुए कहते हैं ‘’लेखक को वही लिखना चाहिए जो उसने देखा और भोगा है ,पूरी सच्ची और इमानदारी के साथ |मुझसे अक्सर पूछा जाता है कि किसी कहानी के पीछे मेरा आशय क्या था तो मैं चुप रह जाता हूँ |मेरा काम सिर्फ लिखना है...सिर्फ लिखना | अनुभव विचार को ज़न्म देता है विचार अनुभव को ज़न्म नहीं दे सकता |’’ लीडिया एविलोव से पहले चेखव का प्रेम प्रसंग एक अभिनेत्री लीडिया यावोस्कार्या से भी चला था लेकिन उसकी परिणिति भी दुखद रही |टोलस्तोय और चेखव के सम्बन्ध अद्भुत थे |चेखव’ उनकी आदर्शवादिता और धार्मिकता की आलोचना करते हुए भी उन्हें पसंद करते थे |तोलस्तोय इनके कटु आलोचक थे बावजूद इसके चेखव को कभी उनसे शिकायत नहीं रही  |चेखव ने अपने मित्र को बताया की मैंने तोलस्तोय से पूछा की उन्हें मेरे नाटक कैसे लगते हैं उन्होंने कहा खराब ...वजह?मैंने पूछा तो उन्होंने कहा कि वो नाटक शेक्सपियर के नाटकों से भी घटिया हैं ‘’|(सन्दर्भ सूत्र –‘’मेरी ज़िंदगी में चेखव –अनुवादिका रंजना श्रीवास्तव मूल लेखिका लीडिया एव्लोव )
यहाँ मैं चेखव के विश्व प्रसिद्द नाटक वॉर्ड नंबर 6 का ज़िक्र करना चाहूंगी |यूँ तो उन्होंने ‘’द सी गल ‘’समेत कुछ नाटक लिखे थे लेकिन वार्ड नंबर सिक्स अद्भुत नाटक था जिस पर एक हिंदी फिल्म ‘’खामोशी’’ भी बनी थी |इसके जीवंत और अत्यंत मार्मिक द्रश्य उनके अपने जीवन के काफी करीब के अनुभव थे | इस नाटक के मंचन को देखने का सौभाग्य मिला था जिसने सच कहूँ तो कई दिनों की नींद उड़ा दी थी जिसका सबब था उसका कसा हुआ निर्देशन और झकझोर देने वाली पटकथा और द्रश्य  |
दरअसल क्रांतिकारी गदय साहित्य की जो महान परम्परा तुर्गनेव , चेर्नीशेव्स्की ,ताओलास्तोय आदि से शुरू हुई थी वो चेखव तक अपने स्वर्ण काल में रही |उसी काल में मोपांसा साहित्य के शीर्ष स्थान पर पहुँच चुके थे जिन्हें यथार्थवादी साहित्य का पिता भी कहा जाता है |तोलस्तोय चेखव के आलोचक रहे लेकिन उन्होंने और चेखव दौनों ने ही मोपांसा के साहित्य की मुक्त कंठ से प्रसंशा की |चेखव और मोपांसा दौनों को कम उम्र मिली लेकिन उतनी ही आयु में उन्होंने खुद को कालजयी लेखकों की श्रेणी में खडा कर दिया था |कहना गलत न होगा कि यथार्थवादी कहानी को विकसित करने व् ऊँचाइयों तक पहुँचाने का काम जिन दो लेखकों ने किया वो चेखव और मोपांसा ही थे |



15 फ़रवरी 2014

17 फरवरी 2014 को प्रगति मैदान दिल्ली में उपन्यास ''मगहर की सुबह '' का लोकार्पण

कुछ कहानियाँ हम नहीं लिखते वो स्वयं को हमसे लिखवा लेती हैं |इस कहानी को भी ऐसी ही घटनाओं में गिना जाना चाहिए |
संयोग कुछ यूँ बना ....स्म्रतियों के कुछ टुकड़े थे जिन्हें जोड़ जाड़कर कुछ पंक्तियाँ लिखी थी आज से कई बरसों पहले ...डायरी की शक्ल में उसके कुछ पन्नों में .... फिर वो डायरी भी किसी विस्मृति के नीचे दब गई और खो भी गई और उसके साथ वो पंक्तियाँ भी |सरपट दौडती ज़िंदगी के बीच ही ,कई वर्ष बाद उस ‘’याद’’ के सूखे पौधे फिर हरहरा गए जब उसी से सम्बंधित घटनाओं की कुछ ताज़ा कतरने किसी परिचित के हवाले वक़्त की हवा में उड़ती हुई मुझ तक आ पहुँचीं ...ज़ख्म फिर हरा हो गया और फिर इस कुलबुलाहट ने शक्ल अख्तियार की कुछ शब्दों की ....कहानी बनने लगी |कल्पना और यथार्थ के ईंट गारे से बनी इस कहानी की अंतिम ईंट जब रखी जा रही थी तब ताज़ा सुबह का मद्धम उजाला फैलने लगा था ...नाम खुद ब खुद सूझा ‘’मगहर की सुबह ‘’|ये उन कहानियों में से एक थी जो बार बार किसी न किसी बहाने और रास्ते आ आकर खुद को लिखवाने की जिद्द ठान लेती हैं| सोचा था चार  पांच हज़ार शब्दों की एक कहानी बन जायेगी तो उस ‘’स्मृति प्रेत’’ से मुक्ति मिलेगी ,नतीज़ा कुछ अलग ही हुआ |कहानी जब अपने अंत तक पहुँची तो लगभग पैंतालीस हज़ार शब्दों का ये एक आख्यान बन चुकी थी |पता ही नहीं चला कि वो नव यौवना जो घटना की मुख्य पात्र थी कैसे खुद के वुजूद को लांघ समाज देश से होती हुई सम्पूर्ण मानवता पर छा गई| उन युवा सपनों के उम्मीदों से लबरेज़ दमकते चेहरे को धीमे धीमे एक बूढ़ी परम्परा में तब्दील होने से बचाना था |कल्पना में उस अंधेरी सर्द पौष की ठंडी रात में अलाव से उठतीं लपटों की तपन से उसका वो तपता रक्तवर्ण चेहरा दमकता हुआ दिखना राहत देता रहा |..रात गाढ़ी थी लेकिन हर रात की एक सुबह होना निश्चित है ..इंशाल्लाह......| पहला उपन्यास पहले प्रेम की तरह होता है कभी नहीं भूलता|परिपक्वता के सयानेपन से इतर एक मासूम निश्छलता और ताजगी उसमे झलकती  है ...निस्संदेह |''मगहर की सुबह''नायिका प्रधान कहानी होते हुए भी किसी विमर्श की मोहताज़ नहीं नाही उन जोशीले नारों में शामिल |अपने रंगमंचीय प्रेम और अनुभव के चलते देशज भाषा, का इस्तेमाल इसमें काफी किया गया है और शैली किस्सागोई |आदरनीय रमेश उपाध्याय सर को इस उपन्यास पर अद्भुत ‘’ब्लर्ब ‘’ लिखने के लिए हार्दिक धन्यवाद |दोस्तों,सभी प्रतिष्ठित और स्थापित लेखकों के बीच इस पहले लघु उपन्यास को भी आप पढेंगे तो खुशी होगी ...|अपने सभी साथी लेखकों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं |उपन्यास के लोकार्पण में शामिल न हो पाने का अफ़सोस रहेगा |
वंदना 


कहानी ...

कहानी हैं इसलिए हम हैं
हम हैं इसलिए कहानी है
हम दौनों है इसलिए ये
दुनिया है ,धरती है आसमान और नदियाँ हैं
पशु हैं पक्षी हैं सरकारें हैं राज पाट और घराने हैं
आदमी हैं आदमी के भीतर हैवान हैं
हैवानियत को पोसने वाले इंसान हैं
कहानी विश्वात्मा है
कहानी सिर्फ के लिए नहीं कहने
धडकने के लिए भी ज़रूरी है ....
ज़िंदगी का आना एक कहानी का आना है
धरती पर
लेकिन ज़िंदगी का चले जाना 
कहानी का ख़त्म हो जाना नहीं होता
हर म्रत्यु 
किसी पीड़ा का पुनर्ज़न्म है
 गाँवों ,सडकों ,फुटपाथों
बाज़ारों ,कार्यालयों ,छापेखानों ,मॉलों ,मेलों
सिनेमाघरों ,धार्मिक स्थलों ,कारावासों ,कब्रिस्तानों 
ये जो शह है चलती फिरती
इंसान नहीं कहानियां है
मुझे हमेशा ये डर रहा
कि मेरे वुजूद से कोई कहानी जुदा न हो जाए
कहानी को बचाए रखना जीवन के प्रति आभार था 
कहानियाँ बनती गईं जीवन हरियाता रहा
कहानी का होना मुझे सबूत देता रहा
मेरे जिंदा होने का
हालाकि मेरी कहानी
मेरे नहीं होने की हद तक चुपचाप है
या मेरे अपने होने के विरुद्ध एक
कहानी बने रहने की जिद्द गोया ज़द्दोज़हद
मैं चाहती थी उस भाषा की तरह हो जाना
जो शब्दों की मोहताज़ न हो
.....................
कहानी दो
वो मनुष्य नहीं
जिसके पास कोई कहानी नहीं 
कहानी ..ये शब्द दुनिया का सबसे
मासूम ज़हीन और मार्मिक शब्द है
कहानी एक जीवन है ,जीवन्तता है
कहानी मनुष्यता का इतिहास है
कहानी सच्चाई में लिपटा
विधाता का सबसे बड़ा झूठ है
कहानी कालातीत है
कहानी जीवन का अपभ्रंश है 
कहानी का कोई और छोर नहीं
कोई आदि अंत नहीं
कहानी न नई होती ना पुरानी
कहानी की आत्मा उसका समय है
जिसे जीती है वो आयुविहीन अप्सराओं की तरह  
चलती है वो जीव से जीव तक
बिना थके बिना रुके
तमाम झंझावातों ,घोषणाओं ,असहमतियों को
पार कर ...
सदी की खुरदुरी सीढ़ी पर बैठ
स्नान करती है धो लेती है अपने
पुराने ज़ख्म
पहनकर नए कपडे अपने ‘’नए’’ होने के भ्रम पर
मुस्कुराती हुई वो फिर हाथ पकड लेती है
जीवन का
ये सिर्फ जीवन है
क्यूँ की वो सिर्फ कहानी है

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