26 जनवरी 2012

 15 जनवरी 2012 -दैनिक भास्कर ''रसरंग'' में कहानी ''अफ़सोस'' प्रकाशित|

24 जनवरी 2012

''वागर्थ ''के जनवरी अंक में कहानी ''उड़ानों के सारांश '' प्रकाशित |

8 जनवरी 2012

शेष दुःख

कुछ भ्रम देर तक पीछा करते हैं नींद का
सिरहाने की हदें भिगो देती हैं चंद किताबें 
शब्द खोदने लगते हैं सपनों की ज़मीन 
और वक़्त अचानक पलट कर देखने लगता 
धरती का वो आखिरी पेड़
जिसके झुरमुट में अटकी है कोई
खुशी से लथपथ फटी चिथड़ी स्मृति  
किसी सूखे पत्ते की ओट में , हवा के डर से 
थकी,उदास और सहमी सी 
करवटें भींग जाती है विषाद से
घूमने लगते हैं घड़ी के कांटे उलटे 
रातें बदलती हैं तेज़ी से पुराने अँधेरे
देखती है कोई कोफ़्त तब 
हरे भरे पेड़ को वापस ठूंठ हो जाते हुए
या नदी पर खुश्क दरारों की तडकन  
सोचती है पीठ किसी क्षत-विक्षत सपने का उघडा हुआ ज़ख्म
सुदूर एक  घुटी सी चीख टीसती है
कौंधने के पीड़ा-सुख तक  चुपचाप,बेआवाज़
किसी डरे हुए पक्षी से फडफडाते हैं कलेंडर के पन्ने
छिपाते हुए खुद से अपनी तारीखों के अवसाद
आंधी में सूखे पत्तों से उड़ते हुए वो मुलायम स्पर्श 
फिर ओढ़ लेते हैं कोई हंसी,दुःख,उदासी या मलाल
रात....उम्मीद का पीछा करते   शब्दों की निशानदेही पर 
पहुँच जाती  हैं उस नदी तक 
जहाँ चांद की छाँह में स्मृतियाँ निचोड़ रही होती हैं 
अपने शेष दुःख

28 दिसंबर 2011

तन्हाई


तन्हाई ने लिखा मौन /और मै भाषा हो गई
 पढ़ा जिसे मेरी आँखों ने
आस्मां ,नदी ,पेड़ और जंगल की
 निस्पंद देह पर
छुआ गया उँगलियों की ज़ुबान
पीले निरीह ताड़ पत्रों पर  
भाषा का ना कोई सुख होता है ना दुःख
ना निराकार ना साकार
वो बस जीती है एक सीप में
बरसों बरस खुद को भूल जाते हुए
समुद्र का एक हिस्सा बनकर
जिसे फेक दिया गया हो
नकार  देने की हद तक हाशियों पर |
समुद्र में पड़ती चाँद की परछाईं सी
कांपती है जो अपने ही भीतर
धूप से ही नहीं ,पिघलती हैं चट्टानें
बारिश और चांदनी में भी
 रेत को भिगोती लहरों का संगीत   
बारिश की बूंदों और पत्तों की लयबद्ध सिहरन
या हो प्यार ही ,
शब्दों की निरस्ती की छुअन है  
मेघ गर्जन या बारिश की बूँदें
बादलों के तिलस्मी रूप
शब्दों की मोहताजी से पीठ है जिनकी 

21 दिसंबर 2011


अर्थों ने बदल लिया है खुद को
नए ज़माने की पोशाक की तरह
आदमी को मशीन और आग को बर्बादी कह दो तो भी
अर्थ नहीं बदलते इनके
मशीन में तब्दील होते हुए , आदमी के लिए
पुर्जों की अहमियत पेड़ से अधिक है अब
मशीने जो सिर्फ आग उगलती हैं
धमाकों से अलग भी ,
 बेइंतिहा शोर रचती हैं ये
सुलगते मौन के भीतर भी,
कुछ नहीं दिखाई देता ,ना कुछ सुनाई
 सभ्यता की नई परिभाषा में  
वो आग अब बुझ चुकी है 
अग्नि कहकर जिसकी परिक्रमा की जाती थी
हजारों संतानें गवाह है इसकी ,या
लिपे चूल्हे की गोद में अंगारों पर सिंकी रोटी की
अपनापे की गंध  
अब आग के मायने सिर्फ
दिल से लेकर चिता तक धधकती वस्तु रह गई है
और पानी के ,एक सूखी नदी की दरारें
हवा के,एक दमघोट धुआं |
और धुंए के मायने  ..एक युग

15 दिसंबर 2011

पहचान-पत्र



मुझे ,
मेरा ‘’होना’’ याद दिलाता हैं
मेरा पहचान पत्र |
क्या भरोसा नहीं मुझे ,कि मै वही हूँ
जो कल थी ,या उससे पहले !
क्या बदलती हूँ मै हर दिन हर पल ?
जो गले में लटकाए फिरती हूँ
इसे नुमाइश की तरह ?
उन्हें यकीं क्यूँ नहीं कि
मै वही हूँ  
जो इस कार्ड पे चस्पा हैं ?
मेरे ‘’मै ’’होने का भरोसा
वो पाते हैं कार्ड की तस्वीर को देखकर
घूरकर देखते हैं मुझे अपनी आँखों की
सुरक्षात्मक सच्चाइयों से  इस क़दर  ,
कि खुद की शराफत पे शक होने लगता है मुझे |
यदि लगा दूँ मै इसमें अपने बचपन की कोई तस्वीर
खेलते हुए फुटबॉल या पकड़ते हुए तितली
तब क्या ‘’मै’’ मै ना रहूंगी?
जब मेरा नाम ‘ये’ ना होकर ‘वो ‘हुआ करता था
अब तो कितनी परतें जम गईं हैं चेहरे पर
घर का ,कॉलेज का और बाजार का चेहरा  
कितनी गिरह नामों में ?
दीदी,डार्लिंग,बिटिया,अंजू,मौसी ,बुआ वगेरा
असली नाम बचा ही कहाँ?
ना चेहरा...
इन परतों को हटाकर अपना मूल चेहरा दिखाऊँ  
जो बचपन में था ,बिंदास खिला हुआ, भोला
तो क्या यात्रा नहीं करने दोगे मुझे जहाज़ में ?
ना प्रवेश होटल में ?
ना मेरे ऑफिस में?
क्या इतने आशंकित हो चुके हो तुम ,
सच्चाइयों  से ?
कि कागजों से पूछते हो   
मेरे होने का सबूत  ?
क्या नहीं है इसकी संभावना भविष्य में कभी
 कि अपने होने की पहचान ,
कार्ड से दिखाते २
मै खुद भूल जाऊं खुद की  पहचान
और पता देखकर पहुंचूं अपने घर या
फोटो देखकर जानूं अपना नाम?

10 दिसंबर 2011