15 अगस्त 2010

दौड़

दौड़

हो रहा है यूँ कि',
बचपन की पढी किताबों के
वो प्रेरनादायी किस्से
अनायास ही अविश्वसनीय और
गैरजरूरी से लगने लगे हैं
और
'ओज ,नैतिकता ईमानदारी जैसे
हलके फुल्के भोले शब्दों पर
चढ़ गई है परतें
सयानेपन की
मुह चिढाती हुई
और चुनौती देती हुई '
कि अब न दूध का दांतों और न
बालों का उम्र से कोई वास्ता रहा
ये नया युग है
छायावादी संस्कारों से अलहदा
मायावादी संस्करणों का युग,जहाँ
बच्चे अब
बच्चे कम मशीन ज्यादा
हो गए हैं
या कर दिए गए हैं'क्यूंकि
माँ पिताओं को फिक्र और जल्दी है
उनके 'बड़े'हो जाने की '
नयेपन के कंधे तक पहुँच
जाने की
उनके पिछड़ न जाने की
शायद इसीलिए चाहते हैं वो
संतानों के भविष्य को
खींचकर
वर्तमान में ले आयें 'ताकि
भविष्य जिसे वर्त्तमान भी होना है कभी
सुरक्षित किया जा सके
बेशक उसका वर्त्तमान
मिटाकर '
महसूस करती हूँ कहीं न कहीं
संबंधों का ठंडापन और
संबोधनों की रिक्तता
शायद ये भी
नए दौर की शर्तें हैं
अचानक खुद को और
संगृहीत सहेजे विचारों और मान्यताओं को
खारिज होते देख रही हूँ निरंतर
क्या हर जाती आती आधुनिकता की
ये पीढीगत अनिवार्यताएं होती हैं?

3 टिप्‍पणियां:

  1. संतानों के भविष्य को
    खींचकर
    वर्तमान में ले आयें 'ताकि
    भविष्य जिसे वर्त्तमान भी होना है कभी
    सुरक्षित किया जा सके
    भविष्य की चिंता कही न कही वर्तमान पर प्रभाव डाल रही हैं
    सुन्दर रचना

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  2. "संबंधों का ठंडापन और
    संबोधनों की रिक्तता
    शायद ये भी
    नए दौर की शर्तें हैं"

    कठोर सत्य.बेहतरीन रचना.

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