28 जुलाई 2013

कथादेश में ‘’प्रसंगवश’’ के अंतर्गत अर्चना वर्मा के लेख को पढ़कर - स्त्री लेखन और स्त्रीवादी लेखन


अभी कथादेश पत्रिका में जून २०१३ में प्रकाशित भास्कर सिंह और सुरेश नायक के पत्रों की प्रतिक्रिया स्वरुप अर्चना वर्मा जी का लेख ‘’प्रसंगवश’’ में पढ़ा |
भास्कर जी के विचार जिसे अर्चना जी ने असमंजस कहा है में रमणिका गुप्ता,उषा प्रियंवदा,राजी सेठ,मृदुला गर्ग ,नासिरा शर्मा ,अनामिका जैसी लेखिकाओं में उन्हें पुरुष का स्वस्ति वाचन या स्तवन नज़र आता है या ‘’उग्र नारी चेतना की टंकार ‘’सुनाई देती है |उनका आरोप है कि स्त्री लेखन में प्रायः पुरुष को शोषक,क्रूर,अत्याचारी, चरित्रहीन दम्भी आदि दर्शया जाता है...और पुरुषों के इन दुर्गुणों की ज़िम्मेदार भी उन्होंने स्त्री को ही माना है | पुरुष के इन ‘दुर्गुणों’ को भी स्त्री के माथे मढना स्त्री के प्रति एक गंभीर लांछन और क्रूरता है ?
भास्कर जी का यह वक्तव्य पढने के बाद मुझे मुनि याज्ञवल्क्य द्वारा लिखित एक श्लोक का स्मरण हो आया
‘’सर्वेशा दोष रत्नानां सुसमुद्रिक यान्या
दुःख श्रंखलाय नित्यमलमस्तु मम स्त्रियाँ ‘’
अर्थात परमात्मा नित्य हमारी रक्षा करे सभी तरह के दोष रत्नों की पिटारी जैसी दुखों की जंजीर जैसी इन स्त्रियों से (ये वही मुनि याज्ञवल्क्य हैं जिनकी दो पत्नियां मैत्रयी और कात्यायनी थीं और जिनका परित्याग वे कर चुके थे )
(२)सुरेश नायक का मानना बल्कि धारणा है कि लेखिकाएं प्रायः उच्च मध्यम वर्ग और लेखक निम्न मध्यम वर्ग के होते हैं (किन आंकड़ों के आधार पर पता नहीं )|इस लिहाज़ से वे अर्चना वर्मा द्वारा उद्धृत हिन्दी की पहली पांत की लेखिकाओं यथा अम्रता प्रीतम,मन्नू भंडारी,नासिरा शर्मा,अनामिका ,मृदुला गर्ग आदि के ‘’स्त्री रूपकों’’ को उक्त लेखिकाओं की पारिवारिक प्रष्ठभूमि,कृतित्व जीवन दर्शन ,जीवन मूल्य आदि की भिन्नता के मद्दे नज़र अर्चना वर्मा की ‘’सर्वमान्य सैद्धांतिकी’’ (?)को संदेह/अविश्वास की द्रष्टि से देखते हैं |
(२)-ये भी एक अजीब सोच है कि स्त्री यदि स्त्री वादी नहीं है तो उसका पुरुष स्वस्ति वाचक होना तयशुदा है | सच ये है कि ऐसा करना या मानना स्त्रियों के प्रति उनकी कुटिल राजनीति और भेदभाव का परिचायक है गौरतलब है कि इस तरह के षड्यंत्र पूर्ण लांछन ही स्त्री को सदियों से दबाते रहे हैं उन्हें दोयम दर्जे के होने का अहसास कराते रहे हैं, आत्म ग्लानी और आत्म क्षोभ के कुँए में धकेलते रहे हैं | ज़बान खोलने भर का दंड यदि उसे हिंसा और बलात्कार से दिया जाता है तो ज़बान बंद रखने पर क्या उसे बख्श दिया जाता है ?ये स्पष्ट करने से वे खुद को बचा गए |क्या उनका उपरोक्त कथन उन्हें स्वयं को (पुरुष को )कटघरे में खड़ा नहीं करता ?
(४)-यद्यपि इस तथ्य को भी पूर्णतः नकारा नहीं जा सकता कि किसी घटना अथवा प्रकरण विशेष में दोषी स्त्री भी हो सकती है लेकिन हर स्त्री के प्रति उस विशेषता का यूँ सामान्यीकरण कर देना संभवतः उचित नहीं |
(५)_ये सही है कि स्त्री लेखन और स्त्रीवादी लेखन को एक संवाद की ज़रुरत है लेकिन सम्प्रेषण हीनता और संतुलन का अभाव ही संवादहीनता का परिणाम है| अधिकांश मामलों में स्त्रियों से सम्बंधित किसी मसले में एक पक्षीय निष्कर्ष और भर्त्सना का एक सामाजिक दंड मुक़र्रर कर दिया जाता है | ज्यादा दूर ना जाते हुए अभी अभी एक पत्रिका में छपे विभूति नारायण और मैत्रेयी पुष्पा की तस्वीर को लेकर किसी पुराने मुद्दे को फिर उठाया गया और मैत्रेयी जी पर अन्यान्य तरीकों से वाक्’हमले किये गए |यहाँ तक कि अन्ततोगत्वा उन्हें राय के कुत्सित और अश्लील संवादों को ‘’क्षमा ‘’ कर देने का निष्कर्ष भी मान लिया गया | न सिर्फ ये प्रकरण बल्कि उसके पहले भी ऐसे अनेकानेक प्रकरण हुए हैं जिसमे स्त्रियों के प्रति पुरुष की लगभग हर ज्यादती को स्त्री का दोष मान लिया गया |अभी पिछले वर्ष दिल्ली के सामूहिक गेंग रेप के प्रकरण में भी स्त्री विरोधियों (जिसमे स्वयं कुछ परम्परावादी स्त्रियाँ भी शामिल थीं )द्वारा लडकी के रात में घर से बाहर रहने और लड़के के साथ बस में सफर करने के दुस्साहस को भी उसकी वजह माना गया | क्या ये विसंगति और दकियानूसी सोच स्त्री को उसकी उपनिवेशवादी धारणा और पुरुष सत्तात्मकता को सही ठहराने की पक्षधर दिखाई नहीं देती?
अर्चना जी का ये कहना कि वाद विवाद भी संवाद का ही एक स्तर और एक प्रकार है ,सही है ये | संवाद किसी भी एक पक्षीय व्यक्तव्य और किसी धारणा विशेष के मस्तिष्क में कुण्डली मार न बैठ पाने का सबसे सही सरल और परिपक्व तरीका है लेकिन संवाद स्वस्थ्य और तटस्थ होना उसकी पहली शर्त है |
अर्चना वर्मा पर जिस ‘’ऐसे वैविध्यपूर्ण रूपकों से तथाकथित सर्वमान्य सैद्धांतिकी गढ़ने ‘का जो आरोप लगाया गया है वो आरोप कर्ता के अपरिपक्व अनुभवों से निकला एक विचार ही नहीं बल्कि हास्यास्पद भी है |उन का कहना है कि ‘’प्रायः पुरुष लेखन में निम्न मध्यम वर्गीय पुरुष सक्रीय होते हैं और स्त्री लेखन में उच्च मध्यम वर्गीय स्त्रियाँ ‘’(पता नहीं ये उनकी अपनी धारणा है ,विचार है या फिर अनुभव )|पितृ सत्तात्मकता वैश्विक स्तर पर स्त्रियों के प्रति एक आम धारणा और सोच (सत्य)है |जहाँ तक हिन्दुस्तान की बात है यदि इतिहास को ही टटोला जाये तो कितने ही ऐसे प्रकरण मिलते हैं जिसमे लोक गीतों ,लोक कविताओं ,लेखों आदि के माध्यम से स्त्री की कु-दशा अथवा उसकी नियति को वर्णित किया गया है क्या शताब्दियों पूर्व प्रचलित इन लोक गीतों के रचयिता स्त्री /पुरुष उच्च मध्यमवर्गीय रहे होंगे ?तद्भव के एक अंक में ऐसे ही लोक गीतों विशेषतौर पर उन लोकप्रिय और ‘’श्रद्धेय ’’ धार्मिक गर्न्थों की कथाओं में पौराणिक स्त्रीयों की दुर्दाषाओं संबंधी लोक गीतों .और स्त्रियों द्वारा ही उन्हें उलाहित करने पर एक लेख प्रकाशित हुआ था |इसके अलावा भी तमाम उदाहरण हैं -
हम तो बाबुल तेरी बगिया की चिड़िया,
भोर भये उड़ जाना रे...’’
या
तोहरे धरा मा रहिबे बैठी हम लुकाई
जोनों मिले रूखा सूखा तेने हम खाई
पहिनब फह्बा पुरान मोरे बिरना ..
एक दिन के दिहा हमरो बिदाई
हरे हरे बाँसवा के डोलिया सजाई
डोए दिहा बन के कहार मोरे बिरना |......
यदि इससे भी पुराने काल में जाएँ तो कुछ उदाहरन मिलते हैं जिसमे स्त्री ने स्वयं पुरुष की वर्चस्वता और अधीनस्थ होने को स्वीकारते हुए समर्पण किया है
‘’नमस्ये पुरुषं त्वाध्यमीश्वरं प्रक्रतैयः परम ‘’अर्थात ‘’मै उस पुरुष को नमस्कार करती हूँ जो इस भौतिक जगत से परे है |अर्थात ईश्वर परम पुरुष है(महारानी कुंती की शिक्षाएं)
स्त्री –पुरुष असमानता एक वैश्विक,शाश्वत और जटिल मसला है जिसे आज की नई पीढी इस तरह व्यक्त करती है

सीता निष्कासन
हम सब भोग लें आपस में
कितनी बार होगा
सीता बनवास
जारी है हर समय हर जगह
वन को जाते समय
सीता ने बाँट दिया था थोडा थोडा
हम सब में (नवनीता देव सेन –अवधेश मिश्र के तद्भव में लेख से साभार )
या फिर-
मानुष मानुषेर शिकारी
नारी के कोरेछ वेश्या
पुरुशेर कोरेछ भिखारी (शिवानी )...एक सत्य ...
(अर्थात मनुष्य ही मनुष्य का शिकारी है |वही नारी को वैश्या बनाता है और पुरुष को भिखारी |
ऐसी तमाम कवितायेँ /लोक गीत है
स्त्री लेखन का सम्बन्ध कम से कम वर्तमान में तो किसी ख़ास वर्ग का कृत्य नहीं रह गया है क्या भास्कर जी ने ये स्पष्ट करने की ज़हमत उठाई की निम्न वर्ग की स्त्री लेखन में सक्रीय क्यूँ नहीं क्या कारन हैं इनके ?क्या वो समाज से अलग है ?क्या वो पुरुष सत्ता के व्यवहार सोच की भुक्त भोगी नहीं ?क्या उस पर पुरुष का न्याय और प्रेम बरसता है या फिर उसके पास कुछ कहने को है ही नहीं इसलिए नहीं ?...बिलकुल सटीक प्रश्न है अर्चना जी का |निम्न और निम्न मध्यम वर्गीय औरतों को छोड़ दिया जाये जिनके लिए जीवन सिर्फ दो जून की रोटी का जुगाड़ ,दैनिक ज़रूरतों की पूर्ती ,दरूखोर मर्दों की ज्यादतियों से मुठभेड़ और बच्चों को पालना भर है अन्य वर्ग लेखन कर रहे हैं अनेकानेक तकनीकी सुविधाओं ने निस्संदेह उन्हें अधिक ज्ञानपूर्ण और जागरूक बनाया है |इस लेखन का स्वरुप कैसा है क्या है ये एक अलग मुद्दा है लेकिन आज स्त्री पहले की अपेक्षा अधिक आत्मविश्वासी और जागरूक हुई है इसे नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता लेकिन एक ये भी दुर्भाग्य पूर्ण सच है कि जहाँ स्त्री ने अपने विरोध को असहमति के रूप में दर्ज किया है वहीं पुरुष ने अपने बाहुबली और समर्थशीलता के दंभ से औरत की इच्छाओं का संहार किया है |इतिहास भी इस तथ्य का गवाह है – कुछ विद्वान मानते हैं कि सभ्यता के आरंभिक वर्षों से पुरुष मन पर नारी का आतंक रहा है वैदिक ग्रन्थ इनके साक्षी हैं बल्कि आठवीं सदी के शंकराचार्य से लेकर नाथपंथी योगियों,तुलसी ,कबीर तक नारी के विरोधी रहे हैं
उनका ये कहना कि स्त्रीवादी लेखन का दंभ छोड़कर लेखन को सिर्फ लेखन ही रहना चाहिए...इस वाक्य के पीछे उनकी मंशा अथवा औचित्य तो अस्पष्ट है या शायद अधूरा-वाक्य लेकिन कहीं न कहीं इसके एक (सकारात्मक)पक्ष में सच्चाई ज़रूर है कि आज का स्त्री द्वारा लिखा गया लेखन कम से कम सत्तर प्रतिशत स्त्रीवादिता से संदर्भित ही है |अब इसके अनेकानेक कारण कहे जा सकते हैं जैसे पुरुष सत्तात्मकता के चलते स्त्री का स्वयं के प्रति समानता और सह्रदयता की अनुपस्थिति जनित रोष,अवसाद, अभिव्यक्ति की आजादी का नतीज़ा इत्यादि लेकिन इसे ना तो अस्वाभाविक माना जा सकता है और ना ही गलत बल्कि इन तथाकथित स्त्री लेखन के समीक्षकों /आलोचकों द्वारा उनके लेखन के किसी विशेष विषय पर पर उंगली उठाना स्त्रियों की आजादी,समानता वादी अवधारणा(स्वक्प्न) को नकारना या खारिज करना माना जायेगा |
सुरेश जी अर्चना वर्मा की इस वकालत पर संदेह और छींटा कशी करने से भी नहीं चूकते कि उनकी (अर्चना वर्मा की )सैद्धांतिकी भारत के गरीब,सर्वहारा वर्ग,स्त्री ,दलित आदि को पार करते हुए लैटिन अमेरिका जैसे अति पिछड़े महाद्वीपों के स्त्री –पुरुषों के संबंधों की विषमताओं पर कैसे अपने विचार उद्धृत कर सकती हैं ? हलाकि अर्चना जी ने उनके इस पक्ष को उन्हीं के शब्दों व् ‘’उनकी स्वयं की सैद्धांतिकी ‘’ में लपेट लिया है ..’’लेखन के लिए लेखन ...तो फिर ये बात कहाँ से प्रकट हो गई ? सुरेश जी के इस कथन के पीछे उनका स्त्री –पुरुष (लैंगिक पक्ष से सम्बंधित ) अल्प ज्ञान अथवा संकीर्ण पक्ष भी कहीं न कहीं उजागर होता है | ८ मार्च १९०८ को प्रतिवर्ष मनाये जाने वाले महिला दिवस ,१२ फरवरी १९८३ को पकिस्तान की एक्टिविस्ट महिलाओं द्वारा लाहौर में अपने हकों के लिए उठाई जाने वाली आवाजें जो आज भी याद के तौर पर मनाया जाता है प्रसिद्द फ्रांसीसी लेखिका एलेन सियु की आवाज़ कि मर्दों ने स्त्री के प्रति सबसे जघन्य अपराध ये किया है कि उन्होंने स्त्री को स्त्री से नफरत करने को बाध्य कर दिया है |स्त्रियों की अपार शक्ति को अपने ही खिलाफ खड़ा कर दिया है और सियु का ये कहना कि पुरुष ने स्त्री को अपने लेखन और अपने शरीर के प्रति एक हीन भावना से भर दिया है |वो कहती हैं स्वयं लिखो तुम्हारे शरीर को सुना जाना आवश्यक है ‘’योर बॉडी मस्ट बी हर्ड..| ‘’ यही है लैंगिकता का मतलब यही पुरुषों को समझना है |
‘’आधुनिक जनतांत्रिक समाज में उत्पीडन का परिणाम द्रोह में होता ही है ‘’अर्चना जी का ये कहना आज के तथाकथित स्त्री लेखन और उन पर गढ़े गए आरोपों का एक बहुत सटीक और परिपक्व ज़वाब है |
स्त्री द्वारा अपनी असहमति दर्ज करने को हर काल में पुरुष सत्ता ने विभिन्न आरोपों, सैद्धांतिक भूलों ,और उन्हें अपनी ‘’हैसियत’’ को याद कराने के लिए भांति २ के दुष्प्रचार के द्वारा दबाने की कोशिश की है |सुरेश नायक के इस विरोध में भी ‘पुरुष प्रतिनिधि स्वरुप ‘’उसका एक अंश देखने को मिलता है |उनका यह मानना की स्त्री का लेखन किसी भी प्रकार का सामाजिक राजनैतिक परिवर्तन का वाहक नहीं रहा ‘’वस्तुतः उनका ये निराशावादी कथन स्त्री को पुनः सौ साल पहले की सोच और स्थिति में चले जाने की मंशा रखता है |इससे भी आगे वो अपना पुरुष दंभ ज़ाहिर करने से भी खुद को नहीं रोक पाते हैं जब मानते हैं कि स्त्री के हिस्से में जो रियायतें आई हैं वो भी पुरुष प्रदत्त मानवीय द्रष्टिकोण और (पुरुष निर्मित)संविधान की बदौलत |आज क़ानून पुरुषों के बहुमत द्वारा पारित होता है न कि सिर्फ महिलाओं के द्वारा |..’’उन जैसे कट्टरवादी पुरुष अपने इस वैचारिक उथलेपन (निष्कर्ष)को थोड़ा गहराई तक ले जाते हुए स्त्री पुरुष ‘’समानता’’ का भविष्य क्यूँ नहीं स्वीकार पाते ?क्या स्त्रियों के बिना पुरुष का अस्तित्व संभव है?..क्या कुछ भी सहयोग की भावना के बिना हासिल किया जा सकता है?
सुप्रसिद्ध आलोचक डॉ प्रभाकर श्रोत्रीय स्त्री और दलित लेखन में उभरी एक नई चेतना और प्रासंगिकता को सही तो ठहराते हैं लेकिन स्त्री आंदोलनों की अतिवादिता और व्यापकता से सशंकित भी हैं |वे कहते हैं ‘’वे (आन्दोलन)बजाय उत्कृष्ट साहित्य सर्जन के अपनी वकालत और घ्रणा में केन्द्रित हो रहे हैं |’’वो ये भी मानते हैं कि सहजीवन की बजाय स्पर्धा जैसी उग्रता या स्वछंदता के लक्षण स्त्री लेखन में प्रकट हुए हैं |एक बहुत अच्छी बात वो कहते हैं ‘’स्त्री विमर्श को स्त्री के कटघरे से मुक्त कराना होगा ‘’|
वंदना 

1 टिप्पणी:

  1. पूर्व अवधारणाओं से बाहर आये बिना कहाँ निर्वाण, शिवम् भूत्वा शिवम् यजेत।

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