24 अगस्त 2012



 खिड़की से आती हुई हवा में
 फडफडा रहे हैं 
मेरी मेज़ पर रखे कुछ कोरे कागज
सन्नाटों को भरते हुए अपनी रिक्तता में 
घूरते हैं मुझको    
कलम की नोक पर कांपती हैं आत्मा  
शब्दों की'
मै तैरा देती हूँ उन्हें स्मृतियों की नदी में
नौका बना
इस तरह  
कूलों की अहमियत को
इज्ज़त बख्शती हूँ मै   
कोरा घड़ा हो,कोरा यौवन या फिर
कोरे पन्ने ही
कितनी जिजीविषा होती हैं इनमे अपने
भरे जाने की ?
सपनों को रख दिया है मैंने मौन की दहलीज़ पर
दीपक बना   
बुझा दिया है लेम्प
खिड़की खुली है अब भी  
पर कागजों में कोई हलचल नहीं
सोती हुई मासूम कतरनों को पढ़ना
अच्छा लगता है मुझे 

18 अगस्त 2012


१९०८ की महिला-क्रांति से लेकर
आज की नारी मुक्ति -भ्रान्ति तक
स्त्री आज़ाद होती रही है
किश्तों में
देस्दिमोना आज भी बैठी है उसी बिस्तर पर
मौत की प्रतीक्षा में सिर झुकाए जबकि
इमीलियायें लहरा रही हैं मुट्ठियाँ शब्दों की
झाड़ते हुए धूल अपने निर्मम भ्रमों से
हजारों सीतायें ,द्रोपदियाँ ,श्कुंतालायें क्या अब नहीं
अब कोई कथाकार नहीं उनकी कथाएं रचने को
ये अलग बात है ....| 
सिमोन द बुवा से लेकर
बेट्टी फ्रायड मैन और  
वालस्तानक्राफ्ट या ताराबाई शिंदे लेकर
आज तक  
 कभी हक और कभी
आजादी के लिए कितनी ही
लड़ाईयां लड़ीं हमने  
और तमाम अभी बाकी हैं
पुरुष सत्ता के अघोषित कुरुक्षेत्र में ,
क्या खत्म हो चुके हैं हमारे तमाम अस्त्र शस्त्र विरोधों के ,
मर्यादाओं,सभ्यताओं,विचारों,संवेदनाओं और
तर्कों के?
कि हम खींचने पर उतारू हैं
अपने ही प्रतिद्वंद्वी के हलक से
उसी की ज़ुबान (भाषा)?
और कहीं ,
बिछा रहे हैं अपनी प्रसिद्धि की चादर पर
स्त्री की ही देह और खुश हो रहे हैं
स्त्री की मुक्ति पर?
गढ़ रहे हैं अ-मर्यादाओं के
नित नए कीर्तिमान कोसते हुए
पुरुषों को ?
जबकि खेल जगत,विज्ञान और तकनीक के 
कीर्तिमान रचती स्त्रियों पर नज़र 
कम ही जाती है हमारी |
ये हमारी हीनता ग्रंथि तो नहीं ?
इतने खोखले ,तर्कहीन और गैरज़रूरी हो गए हैं तथ्य ,  
कि मुद्दों की प्रासंगिकता खो चुके है हम ?
ये किस किस्म की दया है और कैसा प्रतिशोध?
कैसी नारी शक्ति है और कैसी नारी मुक्ति?
क्या विरोध आरोपों से शुरू हो दया पर खत्म होना चाहियें?
क्या हो नहीं सकता ये कि बे-जड़ दरख्त को सींचने
और मुरझाने पर दुखी होने को त्याग हम
संवारें ज़र्ज़र जड़ें समूची व्यवस्था की?
क्यूँ कि अराजकताओं की इस लंबी व
श्रंखलाबद्ध परम्पराओं में और भी कई प्रश्न है
जो दबे हैं गहरी उलझी जड़ों में ,
स्त्री दुर-दशा के इस पौराणिक और
विशाल वृक्ष की |

14 अगस्त 2012

उदासी



सुबह ,
खुली खिड़की पर आकर बैठ गई है
रात ,सुबह के झरने में 
अपना चेहरा धो रही है  
रजनीगन्धा ने अभी अभी अपनी सुगंध का
आखिरी कोना झरा है
बिलकुल अभी ही खिड़की से आकर
गौरैया फुदक कर
आ बैठी है मेज़ पर रखी सरस्वती की मूर्ति की
वीणा पर
चहक रही है वो हौले हौले
रोज की तरह
दुधमुही बयार ने अभी ही डुलाया है
माथे पर मेरे केशो का झुरमुट    
पर आज मै मुस्कुरा नहीं पा रही हूँ  
रोज की तरह
मन इन सब बह्लावों को देखकर भी 
उदास है
ना जाने क्यूँ ?
अरे हाँ याद आया
अभी अभी मैंने एक
अधूरी कहानी को खत्म किया है | 

10 अगस्त 2012

एकांत

एकांत
एक ऐसा देश
सूर्य जहाँ विश्राम करता है
जहां  फूल निर्भय स्वछन्द हो
अपनी सुगंध बिखेरते हैं
पूरी प्रथ्वी पर |
नदियाँ बहती हैं चमकती दुपहर में
सूर्य की किरणों के साथ
अठखेलियाँ करती
अस्त होते सूर्य को अपनी सिंदूरी लहरों से
विदा देती और चांदनी रात में
रजनीगन्धा की तरंगों से
झिलमिलाते हुए गुफ्तगू करती हुई |
यही है वो देश जहाँ मै
संसार के रहस्य से मुक्त और
जीवन के सच से रू ब रू होती हूँ
यहाँ मैंने ईश्वर की आत्मा को
पानी की सतह पर तैरते हुए देखा है
(प्रकाशित कविता )

26 जुलाई 2012


मैंने नहीं रची कोई रणनीति किसी महायुद्ध की
ना ही काम पिपासा को शांत न करने की
सज़ा स्वरुप
श्राप दिया किसी अप्सरा को धरती पर जाने का
मैंने तो धर्म रक्षा के लिए
छोड़ा भी नहीं अपनी गर्भवती पत्नी को
घने बीहड़ में 
ना ही किसी औरत को अपमानित किया
किसी प्रणय निवेदन पर
मै तो भूला भी नहीं
अपनी प्रेमिका को किसी क्रोधी ऋषि के श्राप से
ना ही आँखों पर पट्टी बांधे पुत्र मोह में ,
होते देखता रहा नर संहार
अन्याय और धोखे की शिकार अपनी पत्नी को
क्रोधवश पत्थर भी नहीं बनाया मैंने
महानुभाव ....
अब भी यदि आप मुझे संत य देवता जैसे शब्दों से
सम्मानित करेंगे
हो सकता है कि मै इसे अपना अपमान समझूँ


21 जुलाई 2012

नीम का पेड़


कच्चे आंगन में पुराना नीम का एक पेड़ था
वो मुझे बचपन से उतना ही बूढा ,घना और
इस कदर अपना सा लगता कि मै दादाजी को
उसका जुड़वां भाई समझती |
किसी सयाने बुज़ुर्ग सा
दिन भर गाय से सूरज की चुगलियाँ सुनता
जो बंधी होती उसकी छाँव में|  
चींटियों की फुसफुसाहट उसके
तने से झरा करती|
मौसमों की बेईमानी से रूठ जाता वो
और कुम्हलाने का नाटक करता |
हर पतझड़ में उतार फेंकता अपने बूढ़े पत्ते
और पहन लेता नयी कोंपलों की पोशाक
और निम्बोलियों के आभूषण
इतराता सावन की बारिश में |
 हम बच्चे उस पर चढ कर
बैठ जाते वो बुरा नहीं मानता और खुश होता |
तब ताऊ पिता चाचा बुआ दादा दादी
सब साथ उसी के नीचे खाट बिछाकर
सई संझा से बातें करते ज़माने भर की
परिवार समाज देश त्यौहार,बारिश जाने कहाँ २ के
किस्से बतौले
पर कभी नहीं करते
उस दुनिया की जो सरक रही थी धीरे २
दबे पाँव ,आंगन से ...बिल्ली सी |
‘’नीम’’को बेआवाज़ घटनाओं की आदत थी |
 त्योहारों व विवाहों में आये मेहमानों से  
एक एक करके परम्पराएं विदा होने लगीं |
तब पहले विश्वास टूटे फिर मन
फिर परिवार उसके बाद  
ऑंखें तरेरते रिश्ते ,सम्बन्ध लहू लुहान होते
देखता रहा पेड़ ,कहा कुछ नहीं बस 
उस बरस
पतझर कुछ ज्यादा लंबा खिंच गया|
आंगन छत,पाटौर,खेत,कुओं ज़मीनों के टुकड़े हुए  
नीम और गाय देखते रहते अपने अपने हिस्सों से
एक दूसरे को भीजी ऑंखें |
 बेवा दादी तो दो नहीं कई हिस्सों में बट गईं
मन तन और विश्वास के 
जगह की तरह सिकुड़ते अहसास नहीं कर पाया
बर्दाश्त वो नीम का पेड़
एक दिन उसने देखा बगलगीर दीवार पर चढती
दीमकों का हुजूम |
बादल,बारिश,धूप,मौसम,सुबह ,ओस
सब थे चकित
ये सोचकर कि
आखिर क्यूँ की होगी आत्महत्या
उस सौ साल के बुज़ुर्ग ने ......?

9 जुलाई 2012

भ्रम


                    
दीवारें आजकल हो गई हैं इतनी पारदर्शी कि
देख लो उसमे किसी के दिल के आर पार
इतनी तरल कि छू लो
किसी के ज़ज्बात
इतनी रहस्यमयी कि इसमें घुस
ढूंढते फिरो निकलने के रास्ते
और गुम जाओं अपने ही भीतर  
और इस कदर निर्मम कि
चाहो जब तक छूना तुम किसी के अहसास
बदल दें वो अपना पृष्ठ
और खड़े दिखो किसी
दूसरे के आंगन की अनजान दीवारों के बीच|
नए युग के नए नवेले घर में ,
लिखना चाहों यदि अपनी ही दीवार पर अपना नाम
बहुत मुमकिन है कि
ऊपर किसी और के नाम की तख्ती टंगी पाओ
ये हमारा स्वयं का चुना हुआ भ्रम है