6 अक्तूबर 2011

रेत का घर

किसी कहानी की पटकथा के, 
उबड खाबड रास्तों के बीच
कहीं अपनी पगडंडी तलाशने जैसा  ,
ख्वाब लगता है अब     
पहुँच पाना उस हिमालय तक
जिसकी चोटी पर खड़े हो,
वादा था अपने एकांत से 
मुट्ठी खोल देने का 
सपनों से भरी ,
रंग देना नीले आसमान को तितलियों से,
उड़ा देना हाथों से यादों के कुछ खूबसूरत कबूतर
और हो जाना मुक्त पिंजरों से
समुद्र के बाजू      
गीली रेत का वो ढेर , जिसमे पैर घुसा 
बना आये थे एक घर
नहीं जानते थे तब कि 
हर लौटने की तासीर होती है 
पथरीले पहाड़ों में बदल जाना 
तकलीफ देह होता है नियति की तलहटी से देखना
आस्मां को छेदते हुए उन हौसलों को
एंठी गर्दन को सहलाते
फिर फिर उछाल दिया जाना
आसमान में बार बार ...
डाल से गिरे सेब सा ,सेब की  
गुरुत्वाकर्षण शक्ति को
परखने की कुटिल मंशा लिये | ,
इससे तो बेहतर था 
किसी ऊब की तरह   
बिखर जाना ज़मीन पर  
गीली रेत पर पाँव रखते हुए ....| 

4 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर रचना सुन्दर अभिव्यक्ति ,बधाई

    कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारें .

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  2. सुन्दर अभिव्यक्ति ,बधाई..
    अभिव्यंजना मे आप का स्वागत है...

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  3. अनुपम अभिव्यक्ति कोमल भावों की...वाह...

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