6 नवंबर 2012


प्रेम को नहीं चाहिए  
अपने होने के बीच 
कोई कविता ,शब्द  
 रंग , गीत या द्रश्य
 मौन प्रतीक्षा की
 प्रेम एक अद्रश्य ज़रूरत है
 एक नीली पारदर्शी नदी 
बहती रहती है जो चुपचाप  
कोमल विरलता में
आत्मा से आत्मा तक 

7 टिप्‍पणियां:

  1. आपको पहली बार पढ़ा बढ़िया लगा ...आप भी पधारो मेरे घर पता है ....
    http://pankajkrsah.blogspot.com
    आपका स्वागत है

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  2. वाह प्रेम का बहुत ही निस्वार्थ , निर्मल रूप ....सुन्दर !

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