11 जून 2015

कहानी ' और 'कहानी '' में फर्क .......


संभवतः अच्छी और बुरी कहानी की परिभाषा एक ही पंक्ति में है ‘’जो कहानी जितनी देर तक मन और दिमाग को घेरे रहे ‘’| जो कहानियाँ मन पर गहरा असर छोडती हैं मस्तिष्क को इतनी रियायत होनी चाहिए कि उन्हें स्मृति में कम से कम एक दिन या उससे अधिक समय तक सहेजकर रख सके |उसे ज़ेहन में टहलने विचरने व घुमड़ने दे |उन पर अन्य किसी रचना का प्रभाव न पड़े |जैसे किसी लज़ीज़ मिठाई के बाद कोई अति साधारण भोज्य पदार्थ मिठाई के स्वाद को घटा देता है ठीक वैसे ही | ऐसी कहानियाँ कम होती हैं |अरसे बाद एक बार फिर जापानी कहानीकार रोयूनोसुके अकूतागावा की कहानी राशोमन ,काप्पा (लघु उपन्यास )और केसा मारितो पढ़े |राशोमन पर आधारित नाट्यालेख का हिन्दी अनुवाद सुप्रसिद्ध लेखक रमेश दवे ने किया है | ये एक विचित्र और अद्भुत कथा है | एक हत्‍या के अलग अलग चश्‍मदीद अपने ढंग से उसकी व्‍याख्‍या करते हैं और उसमें असली हत्‍यारे को तलाशना चुनौती बन गया है।साधारण विषय को अपनी शैली और द्र्शांकन से कैसे अद्भुत बनाया जाता है ये कहानी इस हुनर की गवाह है | जापान के प्रसिद्द फिल्मकार अकीरा कुरोसावा जो अपने समय के सबसे आधुनिक और प्रयोगशील सिनेमा के लिए जाने जाते हैं उन्होंने राशोमन फिल्म भी बनाई जिसे वेनिस के 12 वें अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टीवल में ‘’बेस्ट फिल्म’’ से नवाज़ा गया| मोपांसा की तरह रियूनोसुके अकुतागावा की म्रत्यु भी 35 वें साल में हो गयी थी | और एक इत्तफाक ये भी है कि अकूतागावा की फिल्म को विश्वव्यापी ख्याति दिलाने वाले फिल्मकार अकीरा कुरोसावा ने भी एक बेहद संभावनाशील फिल्म के फ्लॉप हो जाने के अवसाद में चालीसवें बरस में आत्महत्या की कोशिश की थी लेकिन वो बच गए थे |उसके बाद उन्होंने जो फ़िल्में बनाईं (राशोमोंन सहित) वे विश्वख्यात हुईं अकूतागावा की उक्त तीनों रचनाएं शैली और कथ्य में एक दूसरे से बिलकुल भिन्न हैं |काप्पा उपन्यास पढ़ते हुए जैसे पाठक एक अनुचर की तरह लेखक के पीछे पीछे चलता जाता है और लेखक कहानी सुनाते हुए अँधेरे में दीपक लेकर एक रास्ता बनाता चलता है जिसपर न जाने कितने भाव ,अनुभूतियाँ और अचेतन जगत की व्याख्याएं (रहस्य) बिखरी पडी हैं |कप्पा एक सत्य कथा है (जिसके अंत में लेखक उसकी सत्यता को सिद्ध करने के लिए उस स्थान का पता भी बताता है जहाँ वो घटती है या घटी ) |ये एक पागलखाने में रह रहे पागल नंबर 23की कहानी है जो अपने कमरे में आने वाले हर ब्यक्ति से बेहद सभ्यता और प्रेम से पेश आता है और फिर अपनी कहानी सुनाना शुरू करता है और अंत तक आते २ ....|पूरी कहानी एक फिल्म की तरह चलती है जिसके अंत में पाठक हतप्रभ रह जाता है |उनकी कहानियों की ये विशेषता है कि उनमे ध्वन्यात्मकता,संवाद व् द्रश्यांकन इतने सजीव है कि लगता है हम कोई रचना पढ़ नहीं बल्कि फिल्म देख रहे हैं |कहानी के अंत में पाठक एक अजीब तरह की बैचेनी महसूस करता है |संसार की क्रूरता और जीवन के इस (अति) यथार्थ वाद की सच्चाई |इसे पढ़ते हुए मार्खेज़ के उपन्यास वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड का एक प्रसंग याद आता है जब ह्त्या होने के बाद खून गलियाँ ,सडक, गलियीरे पार करता हुआ उस आदमी के घर की दहलीज़ पर पहुंचता है जिसकी हत्या हुई थी |उसका इंतज़ार करती माँ को बताता है कि उसका बेटा अब नहीं रहा |’’उपन्यास ‘’काप्पा’’ पढ़ते हुए मुझे चेखव का नाटक वार्ड नंबर सिक्स याद आता रहा |वॉर्ड नंबर सिक्स में अवसाद में घिरे मरीजों का इलाज करते हुए डॉक्टर वास्तविकताओं,षड्यंत्रों आदि से साक्षातकार करते हुए स्वयं अवसादग्रस्त हो जाता है और उसे उसी अस्पताल में पागलों के साथ भरती कर लिया जाता है जबकि कप्पा का नायक स्वयं एक विक्षिप्त मरीज़ है |दौनों ही रचनाओं में कथा के माध्यम से समाज में फ़ैली सड़ी गली मान्यताओं,भ्रष्टाचार ,अन्याय आदि को उजागर किया गया है | बहुत सी असमानताओं के बावजूद दौनों नाटकों की त्रासदी कमोवेश एक ही है |कहीं
कहीं कप्पा उपन्यास का परिवेश और कुछ घटनाएं मार्खेज़ के लीफ स्टॉर्म से भी मिलती जुलती लगती हैं विशेष तौर पर मकोंदो शहर जिसे मार्खेज़ ने अपनी कल्पना से तैयार किया था और उपन्यास में वो खासा जीवंत हो उठा था |यही मकोन्दो बाद में वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड
का सबसे लोकप्रिय कस्बा या शहर बन गया। राशोमन और कप्पा का कस्बा लीफ स्टॉर्म के मकोंदो की तरह एक ढहता हुआ उजाड़ कस्बा है |राशोमन का अर्थ ही जापान की राजधानी क्योटो का विशालतम गेट है जो क्योटो के उजड़ने के साथ ही खँडहर में बदलता गया |कथ्य व परिस्थितियों के बरक्स बिना किसी ''सौन्दर्य और उदारता '' के स्थितियों को नितांत अपने उसी खुरदुरेपन के साथ वर्णित करने वाली कहानियों को रेख्नाकित किया जाए तो इन कहानियों की श्रंखला में प्रियम्बद जी की कहानी ''बूढ़े का उत्सव'' और मनोज रूपड़ा जी की कुछ कहानियाँ याद आती हैं |कहानियाँ सिर्फ मौजूदा हालातों का लेखाजोखा ही नहीं बल्कि ये एतिहासिक दस्तावेज़ भी होती हैं |अकूतागावा सहित तमाम कालजयी लेखकों की कहानियाँ /उपन्यास इसी ज़िंदा इतिहास के साक्ष्य है |मानव की तमाम अच्छाइयों,कमजोरियों,त्रासदियों ,विडम्बनाओं का एक विहंगम परिद्रश्य |

3 टिप्‍पणियां:

  1. बेह्तरीन अभिव्यक्ति !सुन्दर व सार्थक रचना ,शुभकामनायें
    कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.मेरे ब्लॉग पर आपका इंतजार...

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