10 दिसंबर 2010

विवशता

सपनों का वो अंतिम छोर
जहाँ खत्म होती हैं संभावनाएं
शुरू होता है वहीँ से
प्रकृति का मौन सत्य!
न बहस,न दलीलें,न विवाद
न अच्छा कहने की मोहलत
ना बुरा मानने  का रोष
न इच्छाओं-सा
कुछ सार्थक
न जीवन-सा कुछ ,
निरर्थक!
न वांछित
न अवांछित!
बस होना एक
होने की तरह जैसे
सूर्य का होना
उगकर
अस्त होकर !
जैसे
एक सधे नियम सा
रात के बाद दिन
और रात का पुनः आ जाना !
वनस्पति,हवा,रौशनी ,बादल
ज़न्म-म्रत्यु
एक अटल सत्य की तरह!
अवश विवशता
''होने ''में तिरोहन की
और फिर इस ''होने
 के बीच
थमते जाना शोर
एक इतिहास का !

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही गहन और चिन्तनयोग्य रचना विवशता को उभारती है।

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  2. सपनों का वो अंतिम छोर
    जहाँ खत्म होती हैं संभावनाएं
    शुरू होता है वहीँ से
    प्रकृति का मौन सत्य!

    बहुत सुंदरता से जीवन दर्शन की बात की ...अच्छी प्रस्तुति

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  3. गहन अभिव्यक्ति जो मन की विवशता और होने की क्रिया को स्थिरता देती है.

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  4. बहुत सुंदर !
    कविता को एक नए अंदाज़ में परिभाषित किया है आप ने !

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