7 जून 2010

अनुभूति 1

जब देह थी उर्जा से लबरेज,और भावनाओं का
समंदर मारता था हिलोरें कच्ची देह के भीतर
चेहरा साफ साफ,व नाक नक्श थे,ठिकानों पर
दुनियां थी मुटठी में,मां बाप रिश्ते नाते
सपनों से भरा था आसमान
उडते उडते थकी देह तलाशती
एकांत को,जो हो जाया करता
आधी रात का सूरज या फिर
बेटी के ब्याह की रात का चैन
सपनों अपनों से धिरी
ढूुढती सी खुद को
वो आधुनिकता का शेार,और फैशन का दौर
खूब भाता था मुझे
खेाजती थी सिरहाना सपनों भरी नींद का
सरल सुरक्षित और निहायत खूबसूरत थी दुनियां ।
फुरसत ही कहां थी पथ्वी के निरंतर धूमने का सत्य जानने की,
और ये कि परिवर्तन है इस लोक का नियम
अपने भीतर की पथ्वी को निरंतर धूमते महसूसते
उसके साथ ताल मे ताल मिलाते आ गई हूं सत्य के निकट
जानती थी पर असोचा था सब कुछ
चली थी कहीं से मैं,यहां पहुंच गई हूं
अब तिरपन साल की उम्र हर तरफ है धनधेार शांति
इतनी कि खैाफ खाने लगी हूं एकांत से,
क्योंकि एकांत जवानी की तरह अब बतियाता नहीं,
देह में रोमांच नहीं रिक्तता पैदा करता है
कहां गुम हो गए न जाने
अवसर,रिश्ते,स्वास्थ्य और व्यस्तता
तयशुदा था कि जिम्मेदारियों से मुक्त होते ही
मिलूंगी प्रकति से बहुत करीब से
समेटूंगी तिनके बिखरे रिश्तो के
अनभिज्ञ थी मैं इस सच से कि
संबंधेंा के भी युग हुआ करते हैं ।
अंतराल यहां प्रावधनरहित या औचित्यहीन है ।
जब अर्थ निरर्थक हुआ करते थे रिश्तों के मेरे लिये
तब धिरी रहती थी गैरों से भी
आज जब अपने भी हो गए है अप्रासांगिक
तो समझ पा रही हूं अर्थ रिश्तों के ।
जीने के तरह तरह के उपक्रम में
टीवी जो हमउम्रों के वक्त की लाठी बन जाया करता है अमूमन
भाग्यहीन कहूं कि मूर्ख खुद को
कि उसका तिलस्मी मायाजाल भी,सहन नही होता मुझसे
क्यों कि उन झूठों से नफरत है मुझेे
जो सपनों की शक्ल में रिझाया व बरगलाया करते हैं
और मूक बनाम मूर्ख दर्शक बनना मुझे मंजूर नहीं,शुद व निखालिस चीजें पसंद हैं मुझे,जैसे
सत्य के पडौस की कथाएं,दिल को स्पर्श करती कविताएं
अपने आसपास के नाटक और खूबसूरत मुशायरे,
संधिप्रकाश की बेला में ,पक्षियों के कलरव और,मंद सुगंधित हवाओं के साथ बहती
हरिप्रसाद चौरसिया की बांसुरी या सुदूर किसी टापू से आता
झीना सा स्वर किसी सूफी गायक का इसी आभामंडल की गिरफत में गुमना सोचा है
तुम कहोगे मेरे बच्चों कि बुढिया गई ही मां तुम
पर मै कहूंगी,कि तिलस्म से बाहर आ गई हूं

1 टिप्पणी:

  1. bas yahi hai wo jo madad karega aapki is sab ko khud se mukt karne main. jise dhundti hai aap bahar wah asal main hai to aapke andar hi, jo khubsurti aapne ab tak bahar dekhi thi thi wah aapke hi bheetar hai ek tarah se kahiye to wo aap hi hai, jo dur jate dikhte hai wo nadan hai jaante nahi hai aapko agar samajhte hote to paas hote aapke.

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