17 जून 2010

एक सच

समस्त विश्व जूझ रहा,आतंक से उद्वेगों के,अव्यवस्था जनित कुंठाओं से
उफनती,उबलती,वेदनाओं संवेदनाओं व
मन-मस्तिष्क को लाने,सही सही ठिकाने पर
"सकारात्मक सोच'' खुश है ज्ञानियों की गोद में बैठकर
''नियंत्रित श्वसन का नियंत्रण ठोके पीठ योगियों की
नई नई वैज्ञानिक तकनीकों से उपजा शक
मनोचिकित्सकों के प्रयास को
बिठाए सर माथे पर ,परन्तु क्या
वे सफल हैं?
परिस्थितियां,राजनीती के गंदे दांव पेच
सामाजिक विसंगतियां समूचे अर्जित ज्ञान संसार और
तमाम संस्कारवान कोशिशों के बावजूद
विरोधी ताकतों के चलते क्या
ज्ञान ,विचार शुन्य देह को
मनोचिकित्सकों के भरोसे छोड़
अथवा जीवन को समाप्त कर देने की
बद हवासियत की वो शक्लें ,जो
कभी विवश किसान या फिर किसी
बलात शिकार औरत के रूप मैं
रोक सके ये ग्यानी,ध्यानी या चिकित्सक?
या अलस्सुबह विभिन्न धार्मिक चैनलों पर स्थापित
प्रवचन कर्ताओं के वो गोल मटोल तंदरुस्त चहरे?
....वे रोज़ सुबह उपदेश दे गर्वित और
चैनल टी रार पी के फेर मैं
जनता ..कभी मुग्ध कभी छुब्ध
नहीं होगा कुछ
जड़ रहित पौधे को सींचते चले जाने सेया फिर
दूध पी रही बिल्ली की तरह
ऑंखें बंद कर लेने से

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