13 जून 2010

औरत

नारी, तुम नहीं अबला,
आजाद हो तुम अब ।
चीख-चीख कर कह रहे
तमाम चैनल,मंत्री,संतरी और स्वयं तुम
यही तो कह रही नारी दिवस पर,आयोजित वार्ताएं ।
टीवी स्क्रीन पर एक से एक ताजातरीन,
मुस्कराते चेहरे, चेहरों की नकल करते चेहरे
और चेहरे, और जिस्म
सच कहा तुमने,
अब औरत आजाद है
दौडो जहां तक दौड सकती हो,
खुला है आसमान, फैली है धरती
बगैर किसी नकेल के
सच कहा तुमने, अब आजाद है औरत
स्वयं को नग्नता की हद तक पेश करने के,
दारुखोर निकम्मे मर्दों और
आधे दर्जन बच्चों के निवाले के लिये,
हाड-मांस एक करती
पर जिंदा रहने की मोहलत के साथ
आजाद है औरत।
वेलेंटाइन डे के विरोधियों से, अपनी आजादी का दंभ भरती
हुंकारती,तर्क कुतर्क करने को, आजाद है औरत ।
जहरीली शराब पीकर मारे गए मजदूर की मौत के मौके पर
टीवी में दिखने, और मुआवजे की रकम पाने को
बिचैलियों के ठिकानों के बदस्तूर चक्कर लगाने को
आजाद है औरत ।
आतंकियों की गोली से भून दिये गये कांस्टेबल पति की
मरणेापरांत मैडल लेने को,या फिर
तपती दोपहर में दो की उगली थामे और
एक नोनिहाल को सूखे स्तन से चिपकाये,
नेताओं द्वारा दो जून का भोजन के वादे के साथ,
जुलूस में भीड बढाने को
आजाद है औरत ।
तथाकथित महातपस्वियों के, दानपुण्य के जलसों में
थाली लोटा लेने को बहराई,और भीड में कुचले जाने के लिये
आजाद है औरत ।
दमदार सास और दंुस्साहसी पति के बेढंगे आदशों को,
बेशर्मी से प्रस्तुत करते होड में भागते चैनल, और ये स्वीकारने कि
सीरियल तो प्रतिबिंब हैं समाज के
आजाद है औरत
और कितनी आजादी चाहिये तुम्हे?

9 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत शानदार कविता है । पोस्ट करने के लिये धन्यवाद

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  2. आपकी कविताओं को पढ़ने के लिए ना जाने क्यों बहुत हिम्मत बटोरनी पड़ रही है। बेहद तीखी अर्थवत्ता रखतीं हैं। कविताएँ ऐसी ही हों तो कुछ उम्मीद नज़र आती है।
    साधुवाद।

    प्रमोद ताम्बट
    भोपाल
    www.vyangya.blog.co.in
    http://vyangyalok.blogspot.com
    व्यंग्य और व्यंग्यलोक

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  3. वंदना बिटिया
    आशीर्वाद
    आपकी एक ही कविता पढ़ी बार बार पढ़ी
    भारत की स्त्री को जाग्रत करना है लिखो जाग्रत की कविता
    साथ दूँगी
    गुड्डोदादी चिकागो से

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  4. स्वयं को नग्नता की हद तक पेश करने के,
    दारुखोर निकम्मे मर्दों और
    आधे दर्जन बच्चों के निवाले के लिये,
    हाड-मांस एक करती
    पर जिंदा रहने की मोहलत के साथ
    आजाद है औरत।
    लगता है औरत आज़ादी का अर्थ दशा और दिशा भूल गयी है। बहुत सुन्दर कविता है। और आजकल की औरत और स्माज पर करारा कटाक्ष है। बधाई इस रचना के लिये।

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  5. एक गम्भीर अर्थ-बोध को समेटे सशक्त रचना वन्दबा जी।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com

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  6. आजादी का भ्रम फैलाये इस समाज के दोहरेपन का आक्रोश पालती कविता ...
    जबरदस्त ....!!

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  7. धन्यवाद मित्रों, जब वैचारिक सैलाब धैर्य की सीमा पार कर प्रश्ठों पर अंकित होने लगता है तो सीमा का लिहाज करना थोडा मुश्किल हो जाता है ।आप जैसे सुधी पाठकों के विचार मेरे लिये बहुत मूल्यवान हैं ।
    वंदना

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  8. waah naari jaati ka ahvahan karti jordaar rachna....bahut khoob...

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