27 जनवरी 2011

भीड़



देखा..
मजदूर को  
तेज रफ़्तार के नीचे-
दम तोड़ते तडपते,
बहते खून के अगल - बगल से
बचते बचाते 
निकल गई भीड़ .
देखा....
पीड़ित लडकी पर लांछनों  की 
बौछार करते आरोपी को 
कनखियों से सोखती ख़बरों को,
अन्याय पी गई भीड़ !
देखा,भूख के सीने पे  
 आत्महत्या  करते 
किसान और उसके- 
बिलखते परिवार को ,
अपने २ काम पे 
निकल गई भीड़ !
देखा ,
बेटी की चिता पर इज्ज़त दारों को,
शान से मूंछें मरोड़ते 
लाश को घेरे ,
मूक दर्शक  बन  गई भीड़ 
देखा सफेद पोशों को 
भूख के कन्धों पर चढ़ 
मुट्ठियाँ तानते भुखमरी के खिलाफ 
नारे लगते,.... 
जुलुस बन गई भीड़  
देखा.....
‘’देह’’का उसकी
तमाशा बनते
अलग अलग चेनलो पर
अलग अलग एंगल से
तमाशबीन   बन  गई भीड़ 
 और इस तरह समाज/देश  के प्रति 
अपनी अपनी जिम्मेदारियां निभा 
रात को ,रिश्तों से लिपट   
गहरी नींद में 
सो गई भीड़ 

8 टिप्‍पणियां:

  1. भीड़ के बीच मानवता की खोज अच्छी लगी।

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  2. एक बेहद संवेदनशील रचना आज के सच को उजागर करती है कि कैसे आज इंसान के दिल पत्थर हो गये हैं सिर्फ़ भीड का हिस्सा बन कर रह गये हैं कुछ असर नही होता सिर्फ़ एक खबर ही होती है जब तक कि खुद पर नही गुजरती।

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  3. आज के संवेदनहीन दुनिया का वास्‍तविक चित्रण करती प्रस्‍तुति !!

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  4. बहुत सही कहा है कि आज इंसान सभी संवेदनाओं को भूल कर सिर्फ़ एक भीड़ का हिस्सा बन गया है..बहुत संवेदनशील प्रस्तुति..बहुत सुन्दर

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  5. amanoj ji ,vandanaji ,sangeeta ji aur kailash ji apko bahut bahut shukriya ...apkee tippani mujhe protsaahit karteen hain nissandeh
    vandana

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  6. संवेदनहीन दुनिया का वास्‍तविक चित्रण करती प्रस्‍तुति|बहुत सुन्दर|

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  7. Achcha laga Vandana,tumhara lekhan,but aur behatar ho sakta hai.Abhi mene sirf "Bheed" hi padi hai.I think kisan vali lines me "apne 2 kaam pe nikal gayi bheed" ki jagah "apne 2 luch ki jugali me jut gayi bheed" hota, to....vaise orginal to original hi hota hai.
    Achchha prayas hai.
    mera blog bhi padhna http://madhukablog.blogspot.com/2010/09/blog-post.html

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