6 मार्च 2011

खुशियाँ




मुझ जैसे बेसब्र लोग,
बड़ी खुशियों की ,छोटी संभावनाओं को
बर्दाश्त ज़रा कम कर पाते हैं,
लिहाजा, बेवजह सी घटनाओं में
 खुश रहने कि वज़हें ,
खोज लेते हैं  ,सो....
खुश हो जाती हूँ मैं ....
अपंग भिखारी के हाथ पर सिक्का रखकर,!
कूड़े के ढेर में खाध्य पदार्थ खखोरते,
भुखमरे बच्चों को ,कुछ भोजन अंश मिल जाने पर,!
, एक संघर्ष शील योद्धा की तरह ,
महिला दिवस का पर्व मना,तमाम दोष
पुरुषों के सर मढकर
 ‘’हिंदी दिवस ‘’पर हिंदी के कसीदे और ‘’वेलेंटाइन डे ‘’पर
प्रेम का इज़हार करके के!
 वॉशिंग मशीन के साथ एक साबुन कि बट्टी फ्री पाकर,!
,किसी ‘’पुरूस्कार’’का विरोध और ‘’पुरूस्कार ठुकराने ‘’वाले को
महान घोषित करके ...
,किसी गीत या फिल्म पर अश्लीलता का आरोप मढ़कर
अब तो मत कहो कि खुशियाँ कम हैं जिंदगी में...!

9 टिप्‍पणियां:

  1. वाह क्या व्यंग साधा है ...ऐसी खुशियाँ कुछ सुकून दे सकें तो फिर गम ही क्या है :):)

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  2. बेहतरीन व्यंग्य्…………शानदार प्रस्तुति।

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  3. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 08-03 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.uchcharan.com/

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  4. is tarah ki khushiyon men sharik hone par hamari bhi TRP! badhti hai...bahut hi achchi aur saargarbhit rachna ! badhai evm shubhkamnaen !

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  5. कोमल भावों और अह्साओं से युक्त सुन्दर रचना..

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