7 मार्च 2011

टुकड़े


तुम्ही ने तो ग्रंथों में लिखी थी
देह के मिटटी होने की बात!
तुम्हीं ने तो रोंपी थी हमारे रक्त में,
पशु से अलग मनुष्य होने की
तुलनात्मक व्याख्या !
तुम्ही ने तो किये थे हिस्से हमारे
आधार बना कर्मों को?
तुम्ही ने तो ताज बना ‘दंभ’को,
पहन लिया था स्वयं के मस्तक पर?
और लाद दिए थे कुछ उसूल
हमारी पीठ  पर ?
तुम्हारे बनाये ‘’एक रक्त एक रूह’’के विरोधाभास
जीते रहे खुद को टुकड़ों में,
कभी वातानुकूलित डब्बों की सुविधाजनक
कोमल साँसों के बीच,और
कभी प्रकृति के संतापों को
ज्यूँ का त्यूं निर्वस्त्र भोगते देह से आत्मा तक?
क्यूँ एक हिस्सा नहीं चाहता खत्म होना जिंदगी का सिलसिला?
क्यूँ दूसरा मौत का इंतज़ार करता है?
क्यूँ एक की किताब में है सिर्फ परिभाषा जिंदगी की?
क्यूँ दूसरा मौत को ओढता बिछाता है?
कब तक धडकनों में पिघलता रहेगा फौलाद ?
कब तक जीवन को उबाते  रहेंगे वही प्रशन ?
कब तक सच इंधन - सा जलता रहेगा दिल में?
आखिर कब तक हौसले को  परीक्षा देनी होगी हमारे?
और कब तक चलता रहेगा सिलसिला
दूसरों की छवियों में  घटित होते चले जाने का?

4 टिप्‍पणियां:

  1. महिला दिवस की शुभकामनाओं के साथ
    वंदना शुक्ला

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  2. कब तक धडकनों में पिघलता रहेगा फौलाद ?
    कब तक जीवन को उबाते रहेंगे वही प्रशन ?
    कब तक सच इंधन - सा जलता रहेगा दिल में

    सार्थक प्रश्न ....अच्छी प्रस्तुति

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