28 अक्तूबर 2010

तलाश


अक्सर मैं 
ढूँढती  रही,हूँ 
खुद को कभी  
इंसानों की भीड़ में,
कभी रिश्तों के जं-जाल में,
कभी कंकरीट के घने 
जंगल में और कभी
विवशताओं के अथाह 
सागर में
जहाँ मै,
खो गई हूँ ऐसे
कि 
कभी भीड़ का कोई 
गैरज़रूरी सा हिस्सा  
बन गई लगती हूँ  , या कभी
ठोस मज़बूत  पुरानी ईंट
जो जड़  दी गई थी कभी 
प्राचीन ईमारत  की किसी
अँधेरी सी  दीवार में 
और कभी विवशताओं की
धुइली सी  राख,
जिसके अंगारों का ताप 
महसूसती हूँ आज भी 
संतृप्त मन की किसी
अनजाने से  कोने में! 
''सहारों '' का गणित 
या कहें ''दर्शन''
कभी समझ नहीं आया मुझे 
हाँ,पर खुद को खुद में
तलाशने का उपक्रम 
गाहे ब गाहे 
ज़रूर करती रही मै 
बदले में उसके पाती रही
''अंतर्मुखी''होने का आरोपण 
मिला है तो बस, 
बार बार यही दोहराव
वही अपेक्षाएं ,
वही म्रगत्रष्णा,
वही वादे
वही आशाएं 
और फिर....
वही पलायन... 
कभी खुद से कभी
ज़िन्दगी से 
पर अभी बाकी है
उम्मीद की एक
हलकी सी रौशनी 
एक हौसला 
कि पा लुंगी कभी
खुद को 
इस भीड़ से अलग
माना कि यह पगडण्डी नहीं जाती 
प्रसिध्धि की साफ़ सुथरी सड़क तक 
प्रशंसा  की महकती हवा तक भी  नहीं 
पर इतने भरे पूरे संसार की 
व्यस्त विडम्बनाओं की भूल भुलैया 
के बीच
खुद को खोज लेना
कम बड़ी उपलब्धि तो नहीं ! 

3 टिप्‍पणियां:

  1. खुद को खोज लेना
    कम बड़ी उपलब्धि तो नहीं

    खुद कि तलाश सच ही बहुत बड़ी उपलब्धि है ....वरना स्वयं का अस्तित्व रहता ही कहाँ है ...अच्छी प्रस्तुति

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  2. khud ke astitva ko talaash karne kee badhiya prastuti... har insaan bas isi talaash mei laga hai... badhai evam aabhaar...

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  3. sangeetaji,प्रोत्साहित करने के लिए सादर धन्यवाद..
    vandana

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