21 सितंबर 2010

कतरनें

आज बहुत कुछ कहने को मन कर रहा है अपने आप से!... गुफ्तगू ...मेरे और वुजूद के बीच की.....खुद के रूबरू होकर देखती हूँ जब अपनी शख्शियत को तो पाती हूँ कि ज़िन्दगी ने ने परखा तो शायद दिया भी बहुत....पर ज़िन्दगी मैं एक अच्छे दोस्त की कमी अखरती रही....दोस्त ...एक इमानदार अपेक्षारहित दोस्त.....जिसके सामने अपने विचारों ,अपनी चिंता ख़ुशी....प्यार सब शेयर कर सकूँ...इसी तरह उसकी चिंताओं ख़ुशी फिक्र सबमे हिस्सेदार बन सकूँ....दरअसल,रिश्तों की कशिश ,गरिमा या कह लें एक तरह का ""फ्लेवर''हर तथाकथित रिश्तों की अलग अलग पहचान और जरुरत होती है मसलन ..संतानों से,माता पिता से,भाई बहन से पति से पत्नी से सबसे अलग अलग अपेक्षाएं और रिश्ते होते हैं...लेकिन दोस्ती का रिश्ता एक ऐसा रिश्ता होता है,जो निस्वार्थ और अपेक्षारहित होने पर भी एक खास खुशबू से भरा होता हैं!इसकी खूबी इसकी निस्वार्थ प्रकृति ही है!अब सवाल ये था , कि दोस्ती को न तो खरीदा जा सकता था.न माँगा जा सकता था .ये एक नाज़ुक मामला होता है रिश्तों का तो फिर किताबों से दोस्ती की जो आज तक गतिमान है!बस वाही थोडा शेयर करना चाहती हूँ .......
छोटी थी तो ऐसी कहानियों और फिल्मों से बहुत आकर्षित होती t..ज्ञातत्व है(जिसे मैं बाकायदा त्रासदी के रूप मे ग्रहण करती थी और हूँ ) कि फिल्मों की प्रवृत्ति ही अतिवादी रही है और कई बार वास्तविकता से बहुत दूर चली जाती है ,लेकिन जब बड़ी हुई तो महापुरुषों की जीवनियों ने मुझे ''आकर्षित किया...इसमे डा हरिवंशराय बच्चन,अज्ञेय,महादेवी वर्मा महात्मा गाँधी आदि की जीवनियाँ पढना मुझे बेहद अच्छा लगता था..इस क्रम मे मे याद करना चाहूंगी उस जीवनी का जिसे मैंने मूलरूप मैं तो पढने का अवसर नहीं मिला पर उसकी व्याख्या पढ़ी...वो थी ''हिटलर की जीवनी''जिसे उनके पी ऐ ने लिखा था..बहुत रोमांचक लगी थी मुझे वो!.मुझे याद है अज्ञेय (जो मेरे प्रिय लेखकों मे से एक है )की ""शेखर एक जीवनी''मै आज तक नहीं भुला पाई!ये बात है तब की जब मै हिंदी स्नातकोत्तर की परीक्षा की छात्रा , थी और जब ''उपन्यास''पेपर मैं पता पड़ा की ''शेखर एक जीवनी''कोर्स मैं है तो पाठ्यक्रम मैं होने के कारन खरीद तो ली लेकिन जब पढने बैठी तो सब ऊपर से जा रहा था,सच एक बार तो अपने एम् ऐ करने के निर्णय को ही बदलने का विचार आया पर जैसे जब पहली बार तैरना सीखते हैं तो डर भी लगता है और ""रहने दें""ये विचार भी आता है ,लेकिन जब सीख जाते हैं तो इच्छा होती है की तैरते ही रहें बस यही ''शेखर एक जीवनी''पढने के दौरान हुआ...सात आठ बार पढने और समझने की चेष्टा करते करते जब वास्तविक मर्म समझ मै आया तो वो एक अजीब सी मह्सुसियत थी एक चमत्कार कह सकते हैं.....मनोविज्ञान की छात्रा होने के बावजूद कई कई बार पढने के बाद समझ मे आई....और जब समझ मे आया तो...वो अनुभव अकल्पनीय था...इतना खुबसूरत....अभूतपूर्व ...अकल्पनीय !दूसरी,विष्णु प्रभाकर की ''आवारा मसीहा'''जो उन्होंने महान लेखक ''शरत चंद''के जीवन पर लिखी... कोई कवी या लेखक सच्चाई को अपनी लेखनी मैं लाने के लिए कितने कष्ट और दुःख झेल सकता है कि वास्तविकता के निकट पहुँच सके....आज के उपन्यास (जितने भी गिने चुने लिखे जा रहे हैं,.कुछ को छोड़कर .)उनके सामने बहुत बौने लगते हैं.या हो सकता है कि ये बदलते हुए युग और परिवेश कि मांग हो?या जो लेखक विवादों का रसास्वादन करने के उद्देश्य से उपन्यासों कि रचना करते हैं !
कुछ बायोग्राफी बेहद दिलचस्प और रोचक तरीके से लिखी गई है जिसमे मुझे भीष्म सहनी (जिन्होंने महान,, कलाकार बलराज सहनी पर इंग्लिश बायोग्राफी भी लिखी थी)उनके नाटक जिनमे ''कबीरा खड़ा बाज़ार मैं ''और''तमस'' देखने का अवसर प्राप्त हुआ इसके अतिरिक्र कमला दस,(विवादस्पद जीवनी),आर.पी.नरोना कि ''अ टेल टोल्ड बाई एन इडियट'',रबिन्द्र नाथ टेगोर,और प्रेमचंद.!हलाकि विषयांतर होगा लेकिन बात चली है तो प्रेमचंद्र कि कहानियों और उपन्यास के बारे मे न लिखना हिमाकत ही होगी.!मुझ जैसे हिंदी के आम पाठक के लिए प्रेमचंद का साहित्य एक पवित्र गंगा की तरह ही है साहित्य कि गंगा ...जिसमे डुबकी न ली तो क्या किया...!सच है प्रेमचंद का तो कोई सानी नहीं...तब भी और आज भी....! प्रासंगिक...तब भी आज भी !ये एक बड़ी बात होती है किसी भी साहित्य या विधा के लिए कि रचना युगों का अंतर मिटा दे तब जबकि सामाजिक मूल्य .राजनीतिक स्थितियां सोच सब निरंतर परिवर्तन शील हों.!
मैंने गोदान पहला उपन्यास था वो भी मेरे पाठ्यक्रम मे था जिसे सबसे जल्दी पढ़ा था उसके बाद भोपाल मैं उसका नाटक जो रबिन्द्र भवन मैं खेला गया जिसे आकाशवाणी के श्री इकबाल माजिद साहब ने निर्देशित किया था और अभी कुछ दिन पहले दूरदर्शन पर देखा जिसमे मुख्या किरदार पंकज कपूर ने निभाया था.देखा!लाज़वाब...जितने बार और जिस रूप मैं देखो अद्वितीय...!जितनी महारत उपन्यास मैं उतनी ही छोटी कहानियों मे जिसमे मुझे ''बूढी काकी''बेहद पसंद है जिसका नात्यारुपंतर और निर्देशित करने का मौका भी मुझे मिला !दिल को छु लेने वाली कहानी.
इसके अतिरिक्त ऐतिहासिक उपन्यास भी मुझे खासे आकर्षित करते रहे जिनमे मृगनयनी.,मोहम्मद तुगलक,(गिरीश कर्नाड ),''दिल्ली तेरी बात निराली ""(प्रेमचंद कश्यप ''सोज़'')आदि रहे!मेरा सौभाग्य था की मोहम्मद तुगलक और दिल्ली तेरी बात निराली मेरा चयन मुख्य भूमिकाओं के लिए किया गया ,! जिसे दिल्ली नाट्य विद्यालय(एन एस डी )के तत्कालीन निर्देशक श्री बी एम् शाह ने निर्देशित किया !दिल्ली.....मैं मुझे संगीत देने का अवसर भी प्राप्त हुआ !दिल्ली..... का प्रसारण दिल्ली दूरदर्शन पर भी हुआ !
चलिए ...आज बहुत सी बातें आपके साथ तरोताजा कीं !बहुत अच्छा लगा.....आगे फिर कभी ....!

4 टिप्‍पणियां:

  1. ये पोस्ट पढ़ के तो एक बात साफ़ है.
    दोस्तों के मामले में, आप काफी अमीर रहीं हैं. किताबें कई लोगों की पसंदीदा दोस्त होतीं हैं, पर यहाँ लिखें सारे नाम बेहतरीन और उम्दा जायके वाले हैं.

    इन सब के बाद किसी दोस्त की कमी खलना, जिंदा दोस्त वालों पे व्यंग्य कसने के सामान है :)
    (वैसे मैं गोर्की सरीखे लेखक भी ढूंढ रहा था, पर ख़ुशी हुई की अज्ञेय जैसे नाम यहाँ उनकी कमी पूरी कर रहे हैं)

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  2. इशान जी
    सच कहा अपने !अब सचमुच दोस्ती की कमी नहीं खलती,गोर्की और चेखव भी पढ़े हैं मैंने कुछ उपन्यास और कहानियां जिनमे कुछ तो बेहद अच्छी हैं,,,माफ़ी चाहती हूँ उनका ज़िक्र नहीं कर पाई...चेखव की एक कहानी ''बैरी''(हिंदी नाट्य रूपांतरण)मैं मैंने अभिनय भी किया है...खैर कुछ लेखक और भी हैं जो मील के पत्थर हैं...पर ज़िक्र नहीं हो सका उनका
    बेहतरीन टिपण्णी के लिए धन्यवाद्

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  3. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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