24 सितंबर 2010

कुछ अलग सा... ...

जिंदगी क्या है क्यूँ हैं और कैसी है?कैसी है ये तो हम बता सकते हैं परन्तु क्या है और क्यूँ सदियाँ हो गई इन प्रश्नों के उत्तर में सर खपाते विद्वान् मनीषी दर्शन शाश्त्री भविष्यवक्ता साधू संतों न जाने कितने इस अबूझ पहेली को जाने बिना संसार से कूच कर गए!इन सारे आध्यात्मिक जटिलताओं के बीच एक बात तो स्पष्ट और सच है की ,जिंदगी की मूलभूत ज़रूरतों को पूरा करते हम ये भूल ही जाते हैं कि हम यहाँ क्यूँ आये हैं या हम आखिर चाहते क्या हैं?खुद अपने से, दूसरों से अपने लिए, या समाज देश से?
बस एक कठपुतली की तरह सुबह से शाम और शाम से सुबह करते करते पता ही नहीं चलता कि कब जिंदगी की शाम की दहलीज़ पर पहुंच गए ?कुछ सोभाग्यशाली लोग ये तो स्पष्ट कर लेते हैं कि हम क्या चाहते हैं जिंदगी से ,लेकिन अपने चाहने को असंख्य विवशताओं के चलते क्रियान्वित नहीं कर पाते हैं.उलझे रहते हैं अपनी नौकरी,व्यवसाय,कला,साहित्य,आदि के जाल में मकडी की तरह जो जाल तो बनाती है अपनी सुरक्षा के लिए दिन रात एक करके,लेकिन अंततः उसी में फंसकर प्राण त्याग देती है !
)कल मैंने एक शख्शियत की जीवनी पढी ,और पढ़कर अभीभूत हो गई!(यूँ भी मै सच को पसंद करती हूँ,और जीवनियों का ताल्लुक सच से होता है!)वो थी हॉलीवुड की नामी गिरामी अभिनेत्री ''ग्रेटा गार्बो""!उन्नीसवी शताब्दी के पूर्वार्ध में स्वीडन मे जन्मी इस अद्भुत अभिनेत्री की कर्मस्थली अमेरिका रही!वो बेहद खुबसुरत और मितभाषी महिला थीं!ख़ूबसूरती और प्रभावशाली व्यक्तित्व से नियति द्वरा नवाजी इस अभिनेत्री ने अनेक प्रसिध्ध फ़िल्में कीं!१९२५ से १९३५ तक फिल्मों में सक्रिय योगदान के बाद ,मात्र ३५ वर्ष की उम्र में ,जबकि उनका सितारा बुलंदी पर था,फिल्मों से सन्यास ले लिया और प्रशंषकों के लाख समझाने के बावजूद उन्होंने अपना निर्णय नहीं बदला ,और एकांत में अकेली रहना शुरू किया और अंत तक ८५ की उम्र तक एकांतवास किया!उनका कहना था की ''अपने शौक के लिए उन्होंने फिल्मों में काम किया,लेकिन शौक मेरी अपनी ज़िन्दगी पर हावी नहीं हो सकते लिहाज़ा मे अब अपने साथ रहना चाहती हूँ,,,आजकल ये सोच और अपने खुद के प्रति ईमानदारी निभाना असंभव सा लगता है!

7 टिप्‍पणियां:

  1. वंदना जी, ज़िंदगी की भाग दौड़ पे आपने जो लिखा है उसे पढ़ते हुए इतना प्रभावित हुआ कि खुद बखुद ही ये पंक्ति लिख गया

    मंजिल पे आ के हौसले तो जवान हो गए
    जाने क्यूं ज़िन्दगी पे झुर्रियां उतर गयीं

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  2. बहुत प्रेरक पोस्ट । जिंदगी में आप क्या करना चाहते हैं इसको कितने लोग महत्व देते हैं?

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  3. आदरणीय रत्नाकर जी
    खूबसूरत पंक्तियाँ लिखने के लिए हार्दिक धन्यवाद !आपकी टिप्पणी मेरे लिए मूल्यवान होती है हमेशा ही!जो चीज़ स्वयं शिद्दत से महसूस की जाती है,वह रचना खुद ब खुद
    चेतन्य हो जाती है...मुझे ऐसा लगता है....इस रचना के साथ भी शायद कुछ ऐसा ही हुआ
    .

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  4. एक अच्छीं सोच जताई है आपके पोस्ट ने.. अच्छा लगा..

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  5. अपवादों का जिक्र हमें क्रूर सच्चाईयों से राहत सा देता प्रतीत होता है। ज़िंदगी की सार्थकता शायद सामाजिक सक्रियता में है।

    आपके चिंतन की दिशा प्रभावित करती है।
    शुक्रिया।

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