27 सितंबर 2010

रिश्ते

कुछ रिश्ते नदी पर तैरती
कागज़ की नाव से लगे हैं, ,
जो पानी पर तैरे तो ताउम्र
पर गहरे उतर नहीं पाए
रिश्ते
न जले तो सुन्दर मोम की मूरत थे
परखा जरा सा तो पिघलते चले गए
रिश्ते
दो खुबसूरत फूल थे जैसे गुलशन में
तोडा ज़रा सा डाल से ,तो बिखरते चले गए
रिश्ते
मुठ्ठी भर रेत ,जों ठहरी थी फ़क़त मुठ्ठी में
खोली जरा सी हमने, तो फिसलते चले गए
रिश्तों का वुजूद तो है ,धागा महीन सा
जरा सी हवा चली खुद में सिमट गए !
आगाज़ जिस का बेहद संजीदगी का था
परवान ज्यूँ चढ़े तो आकाश हो गए!

2 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी पंक्तिया लिखी है ........

    जाने काशी के बारे में और अपने विचार दे :-
    काशी - हिन्दू तीर्थ या गहरी आस्था....
    अगर आपको कोई ब्लॉग पसंद आया हो तो कृपया उसे फॉलो करके उत्साह बढ़ाये

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  2. " मुठ्ठी भर रेत ,जों ठहरी थी फ़क़त मुठ्ठी में
    खोली जरा सी हमने, तो फिसलते चले गए "


    मालूम पड़ता है ये रिश्ते जीवन, जिसे हम कभी कभी संजीदगी से लेने की भूल कर बैठते हैं , की अभिव्यक्ति मात्र है .
    और, दोनों ही धूल हैं.

    बेहतरीन शब्द.
    बधाई.

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